ढाका/नई दिल्ली: 17 साल के लंबे इंतजार और निर्वासन के बाद तारीक़ रहमान ने मंगलवार को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। ढाका के जातीय संसद भवन में हुए इस ऐतिहासिक समारोह ने न केवल बांग्लादेश की सत्ता बदली, बल्कि दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक (Geopolitical) समीकरणों को भी हिला दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारीक़ रहमान को जीत की बधाई दी और शपथ ग्रहण में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को भेजकर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। लेकिन, कूटनीतिक गर्मजोशी के पीछे दिल्ली के लिए तीन ऐसी बड़ी चिंताएं हैं, जो आने वाले समय में भारत की रातों की नींद उड़ा सकती हैं।
1. सुरक्षा और उग्रवाद: 'चिकन नेक' पर खतरा?
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा को लेकर है। 2001-2006 के बीच जब बीएनपी सत्ता में थी, तब बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी समूहों (जैसे ULFA) द्वारा किया जाता था।
चुनौती: क्या नई सरकार फिर से इन समूहों को पनाह देगी?
प्रभाव: सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक), जो भारत को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है, उसकी सुक्षा भारत के लिए 'रेड लाइन' है।
2. चीन और पाकिस्तान का बढ़ता दखल : तारीक़ रहमान की पार्टी बीएनपी का झुकाव ऐतिहासिक रूप से चीन और पाकिस्तान की ओर रहा है। शेख हसीना के दौर में भारत ने कई बड़े प्रोजेक्ट्स हासिल किए थे।
चिंता: विशेषज्ञों का मानना है कि नई सरकार चीनी निवेश को प्राथमिकता दे सकती है और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत रणनीतिक प्रोजेक्ट्स चीन को सौंप सकती है। इससे बंगाल की खाड़ी में भारत का प्रभाव कम हो सकता है।
3. अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और शरणार्थी संकट
2024 के विद्रोह के बाद से बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों की खबरें आती रही हैं।
खतरा: यदि नई सरकार के तहत कट्टरपंथी ताकतों (जैसे जमात-ए-इस्लामी) का प्रभाव बढ़ा, तो अल्पसंख्यकों का पलायन शुरू हो सकता है।
असर: इससे भारत के सीमावर्ती राज्यों (पश्चिम बंगाल और असम) में भारी शरणार्थी संकट और जनसांख्यिकीय अस्थिरता पैदा हो सकती है।
क्या 'मास्टर्स नहीं, मित्र' का फॉर्मूला काम करेगा?
तारीक़ रहमान ने अपने चुनावी घोषणापत्र में "Friends, yes; Masters, no" का नारा दिया था। यह सीधा इशारा भारत की ओर था कि वे संबंधों में बराबरी चाहते हैं, प्रभुत्व नहीं।
एक्सपर्ट व्यू: स्क्रॉल के शोएब दानियाल का मानना है कि भारत अब "हसीना-ओनली" नीति की विफलता को स्वीकार कर चुका है। अब दिल्ली की मजबूरी है कि वह तारीक़ रहमान के साथ एक 'व्यावहारिक' (Pragmatic) रिश्ता बनाए, भले ही इसके लिए उसे अपनी पुरानी सहयोगी शेख हसीना की नाराजगी झेलनी पड़े। तारीक़ रहमान का प्रधानमंत्री बनना भारत के लिए एक 'हाई-स्टेक' गेम की तरह है। दिल्ली ने अपना रुख लचीला तो कर लिया है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब सीमा सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर ढाका का रुख सामने आएगा।
Edited By: Naveen R Rangiyal