हिंदू धर्म के पुनरुद्धारक आदि शंकराचार्य के जन्म समय को लेकर इतिहासकारों और आध्यात्मिक मठों के बीच दो भिन्न मत रहे हैं। प्रचलित पाश्चात्य इतिहासकार उन्हें 8वीं शताब्दी का बताते हैं, लेकिन भारतीय गणना, मठों के रिकॉर्ड और प्राचीन संवत कुछ और ही प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। चलिए जानते हैं विस्तार से।
1. काल गणना और प्रमुख संवत (वर्तमान परिप्रेक्ष्य)
वर्तमान समय (2025-26) की गणना इस प्रकार है:
अंग्रेजी वर्ष: 2025-26
विक्रम संवत: 2082 (अंग्रेजी वर्ष से 57 वर्ष पूर्व प्रारंभ)
कलि संवत: 5126
युधिष्ठिर संवत: 5165 (कलि संवत से 36-38 वर्ष पूर्व प्रारंभ)
2. 'आदि' और 'अभिनव' शंकराचार्य के बीच अंतर
इतिहासकारों ने दो अलग-अलग विभूतियों को एक ही मान लिया, जिससे काल निर्धारण में भ्रम पैदा हुआ:
आदि शंकराचार्य (मूल):
जन्म: 508 ईसा पूर्व (वैशाख शुक्ल पंचमी)।
स्थान: कालड़ी (केरल), नम्बूद्री ब्राह्मण परिवार।
आयु: 32-34 वर्ष की अल्पायु में देह त्याग (474 ईसा पूर्व)।
अभिनव शंकराचार्य:
जन्म: 788 ईस्वी (चिदंबरम)।
मृत्यु: 820 ईस्वी।
आयु: 32 वर्ष की अल्पायु में देहत्याग।
भ्रम का कारण: इनकी वेशभूषा, जीवन और मठ के आचार्य होने के कारण इतिहासकारों ने इन्हें ही 'आदि शंकराचार्य' समझ लिया।
3. ऐतिहासिक और साहित्यिक प्रमाण
मठों के रिकॉर्ड और प्राचीन पांडुलिपियाँ:
द्वारका शारदा मठ: यहाँ के श्लोक के अनुसार, आदि शंकर का जन्म 2631 युधिष्ठिर संवत में हुआ था।
बृहतशंकर विजय: आदि शंकर के सहपाठी चित्तसुखाचार्या द्वारा रचित इस पुस्तक के श्लोक भी 2631 युधिष्ठिर संवत की पुष्टि करते हैं।
सत्यार्थ प्रकाश: महर्षि दयानंद सरस्वती के अनुसार शंकराचार्य का काल लगभग 2200 वर्ष पूर्व का है।
विभिन्न पीठों के अनुसार जन्मतिथि:
कांचीपुरम पीठ: 509 ईसा पूर्व (कलि 2593)
द्वारका पीठ: 491 ईसा पूर्व
ज्योतिर्मठ: 485 ईसा पूर्व
जगन्नाथ पुरी पीठ: 484 ईसा पूर्व
4. चार पीठों की स्थापना (युधिष्ठिर संवत में)
आदि शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में धर्म की रक्षा हेतु पीठों की स्थापना की:
मठ का नाम- दिशा- स्थान- स्थापना काल (युधिष्ठिर संवत)
ज्योतिर्मठ: उत्तर- बद्रिकाश्रम- 2641 - 2645
शारदा मठ: पश्चिम- द्वारका- 2648
शृंगेरी मठ: दक्षिण- शृंगेरी- 2648
गोवर्धन मठ: पूर्व- जगन्नाथ पुरी- 2655
नोट: कुल युधिष्ठिर संवत: 3139+2026 = 5165
शंकराचार्य ने पश्चिम दिशा में 2648 में जो शारदा मठ बनाया गया था उसके इतिहास की किताबों में एक श्लोक लिखा है।
युधिष्ठिरशके 2631 वैशाखशुक्लापंचमी श्री मच्छशंकरावतार:।
तदुन 2663 कार्तिकशुक्लपूर्णिमायां....श्रीमच्छंशंकराभगवत्।
पूज्यपाद....निजदेहेनैव......निजधाम प्रविशन्निति।
अर्थात 2631 युधिष्ठिर संवत में वैशाख शुक्ल पंचमी को आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था। यदि हम उपरोक्त के मान से आदि शंकराचार्य के जन्म और मृत्यु को मानते हैं तो भगवान बुद्ध के 100 वर्षों के बाद आदि शंकराचार्य हुए।
5. दशनामी संप्रदाय और अखाड़ा परंपरा
आदि शंकराचार्य ने हिंदुओं को संगठित करने के लिए दशनामी संप्रदाय बनाया।
10 संप्रदाय: गिरि, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम।
तर्क: कुंभ के अखाड़ों में सबसे पुराना आह्वान अखाड़ा है, जिसकी स्थापना 547 ईस्वी में हुई थी। यदि आदि शंकर का जन्म 788 ईस्वी (8वीं शताब्दी) में होता, तो उनके द्वारा स्थापित परंपरा के अखाड़े उनसे 200 साल पहले कैसे अस्तित्व में आ सकते थे?
6. राजनीतिक साक्ष्य: राजा सुधनवा का ताम्रपत्र
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आदि शंकराचार्य के समकालीन जैन राजा सुधनवा थे।
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राजा सुधनवा ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ के बाद वैदिक धर्म अपनाया था।
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उनका ऐतिहासिक ताम्रपत्र आज भी उपलब्ध है, जो आदि शंकराचार्य के देह त्यागने से ठीक एक महीने पहले लिखा गया था।
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शंकराचार्य के सहपाठी चित्तसुखाचार्या थे। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम है बृहतशंकर विजय। हालांकि वह पुस्तक आज उसके मूल रूप में उपलब्ध नहीं हैं लेकिन उसके दो श्लोक है। उस श्लोक में आदि शंकराचार्य के जन्म का उल्लेख मिलता है जिसमें उन्होंने 2631 युधिष्ठिर संवत में आदि शंकराचार्य के जन्म की बात कही है। गुरुरत्न मालिका में उनके देह त्याग का उल्लेख मिलता है।
आदि शंकराचार्य का जन्म स्थान: कालड़ी (एर्नाकुलम)
कालड़ी: केरल के एर्नाकुलम जिले में स्थित जिस वेल्याडु गांव को वर्तमान में कालड़ी (Kalady) के नाम से जाना जाता है। यह पेरियार नदी (जिसे पूर्ण नदी भी कहा जाता है) के तट पर स्थित है।
आदि शंकराचार्य निलयम: आदि शंकराचार्य का पैतृक घर 'मेलपज़हुर मना' के नाम से जाना जाता था। यह स्थान चिन्मय मिशन (Chinmaya Mission) की एक शाखा, 'चिन्मय अंतर्राष्ट्रीय फाउंडेशन' (CIF) के अधीन है। उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्याम्बा था। कहा जाता है कि शिवगुरु और आर्याम्बा ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की कठिन तपस्या की थी, जिसके बाद स्वयं महादेव ने उनके पुत्र के रूप में जन्म लिया।
संरक्षण: इस फाउंडेशन ने घर की प्राचीन वास्तुकला को बहुत सहेज कर रखा है। यहाँ उस काल की पारंपरिक केरल शैली की झलक आज भी देखी जा सकती है। यह स्थान अब केवल एक घर नहीं, बल्कि संस्कृत और वेदांत के अध्ययन का एक बड़ा केंद्र बन चुका है।
सही समय: आदि शंकराचार्य आज से 2534 वर्ष पहले हुए थे। उनका जन्म शाख मास, शुक्ल पक्ष, पंचमी तिथि के दिन हुआ था। माना जाता है कि उनका जन्म पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था। द्वारका, पुरी और कांची जैसे मठों की वंशावली के अनुसार, आदि शंकराचार्य का जन्म ईसा पूर्व (BC) में हुआ था। इसके अनुसार उनका काल लगभग 508-476 ईसा पूर्व माना जाता है।
निष्कर्ष: साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि आदि शंकराचार्य का समय भगवान बुद्ध के लगभग 100 वर्ष बाद यानी 508 ईसा पूर्व का है। 788 ईस्वी में हुए महापुरुष 'अभिनव शंकराचार्य' थे। केदारनाथ में स्थित समाधि और मठों की प्राचीन गुरु-परंपरा इसी सनातन सत्य की पुष्टि करती है।