ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जब लहराया था परचम

जंग-ए-आजादी की प्रमुख घटनाओं पर एक नजर

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हम भारत की आजादी की 60वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। पूरा देश उल्‍लास में नहाया हुआ है। लेकिन हमें यह आजादी एक कठिन राह से गुजरकर और बहुत-सी कुर्बानियाँ देकर हासिल हुई है। इस आजादी की कीमत हमने शहीदों के खून और देशवासियों के बलिदान से चुकाई है। यदि गुजरे इतिहास के पन्‍नों को खँगालें तो उन बलिदानों पर से परदा उठता है और उन दिनों की स्‍मृतियाँ ताजा हो उठती हैं।

अँग्रेजों से पहले भारत पर मुगलों का शासन था और उन्होंने अपने राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए हमारी धरती का उपयोग किया। सन् 1600 में जब अँग्रेजों ने व्यापार के उद्देश्य से भारत में प्रवेश किया था तो मुगल सम्राट को इसका अंदेशा भी नहीं था कि ये अँग्रेज व्यापार के बहाने उन्हें उनके राज्य से बेदखल कर देंगे। व्यापार की आड़ में देश पर अपना अधिकार जमाने की रणनीति धीरे-धीरे कारगर हुई

जब चालाक मुगल शासक अँग्रेजों की कुटिल रणनीति को नहीं समझ पातो भला भोले-भाले लोग उस खतरे को कैसे भाँप पाते कि यह व्यापार उनका सर्वस्व लूटने के लिए किया जा रहा है। अत्याचार और लूट-खसोट का यह सिलसिला दो सदियों तक चला और अंतत: एक लंबी लड़ाई के बाद हमें ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति मिली और भारत आजाद हो गया।

आजादी की लड़ाई की प्रमुख घटनाओं का एक लेखा जोख

ईस्‍ट इंडिया कंपनी का भारत आगमन:सन् 1600 में ब्रिटेन की रानी ने ईस्‍ट इंडिया कंपनी को भारत में व्‍यापार करने की अनुमति दे दी और इस तरह हिंदुस्‍तान में ईस्‍ट इंडिया कंपनी का आगमन हुआ

मुगल साम्राज्य का पतन :
1852 में बहादुरशाह जफर की मृत्‍यु के बाद मुगल शासन का अंत हो गया। आखिरी मुगल बादशाह की मौत के बाद पूरी सत्ता अँग्रेजों के हाथ में आ गई थी

1857 की क्रांति-आजादी की पहली अँगड़ाई :
भारतीय इतिहास में इसे सैनिक विद्रोह की संज्ञा दी जाती है, लेकिन वास्तव में यह उत्तर से लेकर मध्य और मध्य भारत से लेकर पश्चिम
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क्षेत्र में फैले व्‍यापक जन-असंतोष का परिणाम था। उस जन-असंतोष का कारण धार्मिक भी था, सैनिक भी और आर्थिक भी। विद्रोह को तो कुचल दिया गया, लेकिन भारतीय इतिहास में 1857 को प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम माना जाता है

खूब लड़ी मर्दानी :
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17 जून, 1858 कझाँसी की रानी लक्ष्मीबाई अँग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं।

सत्‍ता की बागडोर कंपनी के हाथों में :
1859 को ब्रिटिश कानून के तहत शासन की पूरी बागडोर ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में चली गई।

भीषण अकाल :
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1860-61 में उड़ीसा, बिहार, मद्रास और बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें करीब 20 लाख लोगों की जानें गईं। अकेले उड़ीसा में ही 10 लाख लोग मारे गए।



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