पुरुषोत्तम मास चल रहा है जिसे अधिकमास भी कहते हैं। इस माह में श्रीहरि विष्णुजी के पुरुषोत्तम स्वरूप की पूजा विधिवत, खासकर षोडशोपचार पूजन करना बहुत ही पुण्यदायक माना जाता है। चलिए जानते हैं कि षोडशोपचार पूजा कैसे करते हैं और क्या है इस पूजा की सामग्री।
1.पूजा के मुख्यत: 5 प्रकार है-
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अभिगमन, उपादान, योग, स्वाध्याय और इज्या।
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इसमें उपादान पूजा के 3 प्रकार होते है।
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पंचोपचार, दशोपचार और सोलह उपचार।
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सलोहर उपचार को ही षोडशोपचार कहते हैं।
1. पांच उपचार : गंध, पुष्प, धूप, दीप और नेवैद्य।
2. दस उपचार : पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र निवेदन, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नेवैद्य।
3. सोलह उपचार : पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नेवैद्य, आचमन, ताम्बुल, स्तवपाठ, तर्पण और नमस्कार। पूजन के अंत में सांगता सिद्धि के लिए दक्षिणा भी चढ़ाना चाहिए। षोडशोपचार यानी विधिवत 16 क्रियाओं से पूजा संपन्न करना।
2.षोडशोपचार पूजन क्या है:
सोलह प्रकार की चीजों को मिलाकर तरीकों से पूजाकर करना षोडशोपचार पूजन है। इसमें- 1.ध्यान-प्रार्थना, 2.आसन, 3.पाद्य, 4.अर्ध्य, 5.आचमन, 6.स्नान, 7.वस्त्र, 8.यज्ञोपवीत, 9.गंधाक्षत, 10.पुष्प, 11.धूप, 12.दीप, 13.नैवेद्य, 14.ताम्बूल, दक्षिणा, जल आरती, 15.मंत्र पुष्पांजलि, 16.प्रदक्षिणा-नमस्कार एवं स्तुति।
3. विष्णु पूजा की मुख्य सामग्री:
मुख्य देव और वेदी के लिए:-
भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर: (यदि मां लक्ष्मी के साथ संयुक्त तस्वीर हो तो अति उत्तम)।
चौकी या पटरा: जिस पर भगवान को विराजमान किया जा सके।
पीला कपड़ा: चौकी पर बिछाने के लिए (विष्णु जी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है)।
अभिषेक और स्नान सामग्री:-
तांबे या पीतल का पात्र: (मूर्ति स्नान के लिए)।
गंगाजल और शुद्ध जल
पंचामृत: (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का मिश्रण)।
पूजन और श्रृंगार सामग्री:-
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पीला चंदन या गोपी चंदन
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अक्षत: (ध्यान रहे, विष्णु जी की पूजा में अक्षत यानी चावल साबुत होने चाहिए, टूटे हुए नहीं। कई लोग विष्णु पूजा में अक्षत की जगह तिल का प्रयोग करते हैं, जो ज्यादा शुभ माना जाता है)।
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रोली या कुमकुम
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हल्दी या अष्टगंध
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जनेऊ: (भगवान को अर्पित करने के लिए सूती सूत)।
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मौली (कलावा): रक्षासूत्र के रूप में।
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पीले फूल और माला: (गेंदे या पीले गुलाब के फूल)।
धूप, दीप और सुगंध:-
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गाय का शुद्ध घी
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दीपक: (मिट्टी, पीतल या तांबे का)।
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रुई की बत्ती
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धूपबत्ती और अगरबत्ती
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कपूर: (आरती के लिए)।
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माचिस
नैवेद्य (भोग) और प्रसाद:-
तुलसी पत्र (तुलसी के पत्ते): (इसके बिना पूजा अधूरी है। ध्यान रखें, एकादशी, रविवार या सूर्यास्त के बाद तुलसी न तोड़ें, इसे पहले से तोड़कर रख लें)।
पीली मिठाइयां: (बेसन के लड्डू, पेड़े, या केसरिया हलवा/खीर)।
ऋतु फल: (विशेषकर केला, क्योंकि केले के वृक्ष में विष्णु जी का वास माना जाता है)।
पंचमेवा: (काजू, बादाम, किशमिश, मखाना, छुआरा)।
नारियल: (पानी वाला जटा युक्त नारियल)।
पान के पत्ते और सुपारी
लौंग और छोटी इलायची
4. षोडशोपचार पूजा संक्षिप्त विधि:
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ध्यान, आवाह्न, आचमन, पाद्य, नैवेद्य, पुष्पांजलि आदि सभी के मंत्र याद होना चाहिए या इसकी एक पुस्तक ले आएं फिर पूजा प्रारंभ करें।
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प्रात:काल स्नान-ध्यान से निवृत हो माता का स्मरण करते हुए व्रत एवं पूजा का संपल्प लें।
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घर पर पूजा कर रहे हैं तो एक पाट पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर घट एवं कलश की स्थापना करें।
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इसके बाद एक बड़ी सी थाली में शालिग्राम या विष्णुमूर्ति को स्थापित करके उस थाल को पाट पर स्थापित करें।
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अब धूप दीप को प्रज्वलित करें। इसके बाद कलश की पूजा करें।
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कलश पूजा के बाद शालिग्राम या विष्णुमूर्ति को जल से स्नान कराएं।
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फिर पंचामृत से स्नान कराएं। पंचामृत के बाद पुन: जलाभिषेक करें।
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फिर शालिग्राम या विष्णुमूर्ति के मस्तक पर चंदन या हल्दी कंकू लगाएं और फिर उन्हें हार और फूल चढ़ाकर माला पहनाएं।
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पूजन में अनामिका अंगुली (छोटी उंगली के पास वाली यानी रिंग फिंगर) से इत्र, गंध, चंदन आदि लगाना चाहिए।
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इसके बाद 16 प्रकार की संपूर्ण सामग्री एक एक करके अर्पित करें। सभी को अर्पित करते हुए मंत्र बोलते जाएं।
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पूजा करने के बाद प्रसाद या नैवेद्य (भोग) चढ़ाएं और प्रसाद अर्पित करें।
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ध्यान रखें कि नमक, मिर्च और तेल का प्रयोग नैवेद्य में नहीं किया जाता है।
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नैवेद्य अर्पित करने के बाद अंत में शिवजी की आरती करें।
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आरती के बाद सभी को प्रसाद वितरित करें।
5.पूजा के नियम:-
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माता के पूजन में शुद्धता व सात्विकता का विशेष महत्व है।
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पूजा के समय हमारा मुंह ईशान, पूर्व या उत्तर में होना चाहिए।
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घर के ईशान कोण में ही पूजा करें।
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पूजा का उचित मुहूर्त देखें या दोपहर 12 से शाम 4, रात्रि 12 से प्रात: 3 बजे के बीच का समय छोड़कर पूजा करें।
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पूजन के समय पंचदेव की स्थापना जरूर करें। सूर्यदेव, श्रीगणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु को पंचदेव कहा गया है।
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पूजा के समय सभी एकत्रित होकर पूजा करें। पूजा के दौरान किसी भी प्रकार शोर न करें।
भगवान विष्णु की पूजा में कभी भी भैरव जी की पूजा की चीजें (जैसे राई या बहुत तीखी चीजें) और तुलसी की सूखी पत्तियां अर्पित न करें (केवल ताजी या सूखी पत्तियां जो पहले से चढ़ी न हों, साफ करके चढ़ाई जा सकती हैं)। इसके अलावा, विष्णु जी को कभी भी अगस्त्य के फूल नहीं चढ़ाए जाते।