कविता : पर्वतराज हिमालय

Himalaya mountain
वह अटल खड़ा है उत्तर में,
शिखरों पर उसके, हिम किरीट।
साक्षी, विनाश निर्माणों का,
उसने सब देखी, हार-जीत।

उसके सन्मुख जाने कितने,
इतिहास यहां पर रचे गए।
जाने कितने, आगे आए,
कितने अतीत में चले गए।

उसके उर की विशालता से,
निकलती है।
जो शस्य-श्यामला धरती में,
ऊर्जा, नव-जीवन भरती है।
इसकी उपत्यकाएं सुंदर,
फूलों से लदी घाटियां हैं।
औ‍षधियों की होती खेती,
केशर से भरी क्यारियां हैं।

कंचनजंघा, कैलाश शिखर,
देवत्व यहां पर, रहा बिखर।
ऋषियों-मुनियों का आलय है,
यह पर्वतराज है।



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