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Last Updated : शनिवार, 9 मई 2026 (11:38 IST)

गंगा दशहरा 2026 कब है? जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और स्नान का सही समय

When is Ganga Dussehra in 2026
गंगा दशहरा का महापर्व इस वर्ष 25 मई 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। यह पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां गंगा के धरती पर अवतरण के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यहाँ पर्व से जुड़ी तिथियां और पूजा के शुभ मुहूर्त की विस्तृत जानकारी दी गई है।
 

गंगा दशहरा 2026: तिथि और मुहूर्त

दशमी तिथि आरंभ: 25 मई, 2026 को सुबह 04:30 बजे से
दशमी तिथि समाप्त: 26 मई, 2026 को सुबह 05:10 बजे तक
 

गंगा दशहरा 2026: शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त (स्नान के लिए): सुबह 04:04 बजे से 04:45 बजे तक।
अभिजीत मुहूर्त (पूजा के लिए): दिन में 11:51 बजे से 12:46 बजे तक।
 

पूजा का विशेष महत्व और योग

गंगा दशहरा: इस वर्ष गंगा दशहरा पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जो इस दिन की महत्ता को और बढ़ा देते हैं।
हस्त नक्षत्र: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण हस्त नक्षत्र में हुआ था। 2026 में हस्त नक्षत्र 26 मई की सुबह से शुरू हो रहा है, लेकिन उदयातिथि के अनुसार मुख्य पर्व 25 मई को ही मनाया जाएगा।
रवि योग और व्यतिपात योग: इस दिन इन विशेष योगों का होना साधना और दान-पुण्य के लिए अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।
 

कैसे करें पूजा?

पवित्र स्नान: यदि संभव हो तो गंगा नदी में स्नान करें। यदि नहीं, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर 'ओम् नमः शिवाय' और 'गंगे च यमुने चैव...' मंत्र का जप करते हुए स्नान करें।
दान का महत्व: इस दिन 10 की संख्या में दान देने का विधान है (जैसे 10 फल, 10 पंखे, 10 ब्राह्मणों को भोजन आदि)।
गंगा आरती: संध्या काल में मां गंगा की आरती करें और दीप दान करें।
 
विशेष टिप: ऐसी मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन गंगा में 10 डुबकी लगाने से मनुष्य के 10 प्रकार के पाप (3 कायिक, 4 वाचिक और 3 मानसिक) धुल जाते हैं।

गंगा माता की कैसे करें पूजा:

1. स्नान और पवित्रता

गंगा दशहरा पर स्नान का सबसे अधिक महत्व है, जो तन और मन की शुद्धि के लिए किया जाता है।
ब्रह्म मुहूर्त स्नान: प्रातः सूर्योदय से पूर्व गंगा स्नान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
पाप मुक्ति: श्रद्धालु पवित्र गंगा में डुबकी लगाते हैं ताकि उनके पाप नष्ट हों और वे निरोग रहें।
प्रमुख स्थान: हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयागराज (इलाहाबाद) और वाराणसी में स्नान का विशेष महत्व है।
 

2. पूजन विधि और कलश स्थापना

पूजा के दौरान कलश को केंद्र में रखकर देवताओं का आवाहन किया जाता है।
कलश पूजन: कलश में गंगाजल, पान के पत्ते, आम्रपत्र, केसर, अक्षत, कुमकुम, दुर्वा-कुश, सुपारी, पुष्प, सूत, नारियल और अनाज का उपयोग किया जाता है।
कलश का महत्व: इसे सुख-समृद्धि, वैभव और पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है, जिसमें सभी देवताओं का वास होता है।
आरती और पाठ: माँ गंगा का पूजन कर उनकी आरती की जाती है। इस दिन गंगा चालीसा, गंगा स्तोत्र और कथा का पाठ करना शुभ होता है।
 

3. व्रत और संकल्प

यह व्रत केवल माँ गंगा ही नहीं, बल्कि भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए भी किया जाता है।
निर्जला व्रत: कई श्रद्धालु इस दिन जल का त्याग करके व्रत रखते हैं।
व्रत का समापन: जल से भरा पात्र (घट) दान करने के बाद स्वयं जल पीकर व्रत पूर्ण किया जाता है।
विष्णु पूजा: इस दिन श्रीहरि की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
 

4. दान-पुण्य और तर्पण

गंगा दशहरा पर दान का फल अनंत गुना मिलता है।
पितृ तर्पण: इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया जाता है।
दान सामग्री: दान में मुख्य रूप से ठंडा फल (केला, नारियल, अनार, खरबूजा, आम), जल से भरी सुराही, सुपारी और हाथ का पंखा दिया जाता है।
 

5. विशेष मंत्र

पूजा और स्नान के समय इस मंत्र का जाप करना अनिवार्य माना गया है:
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु।।
 
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वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
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