Shatila Ekadashi: माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार षटतिला एकादशी के दिन गाय को तिल-गुड़ या इससे बने लड्डू तथा घास खिलाने के बाद पानी पिलाने का बहुत महत्व है। इससे पितृगण प्रसन्न होकर जीवन के समस्त सुखों का आशीर्वाद देते हैं। षटतिला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन 'तिल' का छह विशिष्ट तरीकों से उपयोग करने के कारण इसे 'षटतिला' कहा जाता है। यहाँ षटतिला एकादशी का अर्थ, पूजा विधि, लाभ और आरती का विस्तृत विवरण दिया गया है।
1. षटतिला एकादशी का अर्थ
'षट' का अर्थ है छह और 'तिला' का अर्थ है तिल। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन तिल का छह प्रकार से उपयोग करने का विधान है:
1. तिल मिश्रित जल से स्नान।
2. तिल का उबटन लगाना।
3. तिल से हवन करना।
4. तिल मिश्रित जल से तर्पण।
5. तिल का दान।
6. तिल का सेवन।
2. षटतिला एकादशी की पूजा विधि
ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: सुबह जल्दी उठकर पानी में तिल डालकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
भगवान विष्णु की स्थापना: चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
पंचामृत अभिषेक: भगवान को तिल मिश्रित पंचामृत से स्नान कराएं।
षोडशोपचार पूजा: भगवान को पीले फूल, पीले फल, धूप, दीप, गंध और नैवेद्य अर्पित करें। विशेष रूप से तिल के लड्डू का भोग लगाएं।
पाठ और कीर्तन: विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें।
रात्रि जागरण: एकादशी की रात को जागरण करना और भगवान का भजन करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
पारण: द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को तिल का दान और भोजन कराकर स्वयं व्रत खोलें।
3. षटतिला एकादशी की आरती-lyrics
एकादशी की आरती :
ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।
तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।
मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।
पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।
नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।
विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।
चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।
शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।
योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।
कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।
अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।
पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।
देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।
परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।
जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।
4. षटतिला एकादशी के लाभ
पापों का नाश: यह व्रत जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों को नष्ट कर देता है।
सुख-समृद्धि: घर में सुख, शांति और वैभव का आगमन होता है।
आरोग्य की प्राप्ति: तिल के प्रयोग से शारीरिक शुद्धि होती है और स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
मोक्ष की प्राप्ति: मान्यता है कि जो व्यक्ति विधि-विधान से यह व्रत करता है, उसे मृत्यु के बाद बैकुंठ धाम (विष्णु लोक) की प्राप्ति होती है।
दरिद्रता दूर होना: तिल का दान करने से कई जन्मों की दरिद्रता दूर हो जाती है।
5. षटतिला एकादशी व्रत की कथा:
प्राचीन काल में एक ब्राह्मणी भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी और कठिन व्रत करती थी। व्रत के प्रभाव से उसका शरीर तो शुद्ध हो गया, लेकिन उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था। उसकी परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु स्वयं भिक्षुक बनकर गए, तो ब्राह्मणी ने उनके पात्र में अन्न के बजाय मिट्टी का एक ढेला डाल दिया।
देह त्यागने के बाद ब्राह्मणी को स्वर्ग में महल तो मिला, लेकिन अन्न-धन की कमी के कारण वह महल खाली था। तब भगवान ने उसे बताया कि अन्न दान न करने के कारण ऐसा हुआ है। भगवान के निर्देशानुसार, उसने देवस्त्रियों से षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना और विधि-विधान से यह व्रत किया।
6. षटतिला एकादशी पर पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs
प्रश्न 1. क्या षटतिला एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
उत्तर: शास्त्रानुसार, किसी भी एकादशी पर चावल का सेवन वर्जित माना गया है। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन चावल में 'महर्षि मेधा' का अंश होता है, इसलिए व्रत रखने वाले और व्रत न रखने वाले, दोनों को ही चावल से परहेज करना चाहिए।
प्रश्न 2. यदि मकर संक्रांति और एकादशी एक ही दिन हो, तो क्या करें?
उत्तर: यह बहुत ही शुभ संयोग है। ऐसे में आपको सुबह सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए और फिर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। दान में तिल और खिचड़ी (चावल-दाल) का दान करें, लेकिन स्वयं फलाहार ही ग्रहण करें।
प्रश्न 3. क्या इस दिन केवल तिल खाकर व्रत रखा जा सकता है?
उत्तर: हाँ, षटतिला एकादशी पर तिल का बहुत महत्व है। यदि आप पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, तो तिल और फलों का सेवन करके (फलाहारी व्रत) रह सकते हैं। तिल का सेवन इस दिन शारीरिक शुद्धि और पुण्य प्राप्ति के लिए अनिवार्य माना गया है।
प्रश्न 4. षटतिला एकादशी का पारण (व्रत खोलना) कब करना चाहिए?
उत्तर: एकादशी व्रत का पारण हमेशा अगले दिन यानी 'द्वादशी' तिथि को सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने पर किया जाता है। पारण के समय सबसे पहले तुलसी पत्र या तिल ग्रहण करना शुभ होता है।
प्रश्न 5. क्या इस दिन तुलसी में जल चढ़ाना चाहिए?
उत्तर: एकादशी के दिन तुलसी माता भगवान विष्णु के लिए व्रत रखती हैं, इसलिए इस दिन तुलसी के पौधे को जल नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही उनके पत्ते तोड़ने चाहिए। आप शाम को तुलसी के पास घी का दीपक जला सकते हैं।
प्रश्न 6. इस दिन किन वस्तुओं का दान सबसे श्रेष्ठ है?
उत्तर: इस दिन छह प्रकार के तिल के कार्यों के अलावा काले तिल, गुड़, गर्म कपड़े (कंबल), जूता-चप्पल और अन्न का दान महादान माना जाता है। स्वर्ण दान का फल भी तिल दान के बराबर ही माना गया है।
प्रश्न 7. षटतिला एकादशी पर कौन से मंत्र का जाप करना चाहिए?
उत्तर: भगवान विष्णु के सबसे प्रभावी मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप करना चाहिए। इसके अलावा 'विष्णु सहस्रनाम' या 'गजेन्द्र मोक्ष' का पाठ करना भी बहुत लाभकारी होता है।
प्रश्न 8. क्या बीमार या बुजुर्ग व्यक्ति यह व्रत रख सकते हैं?
उत्तर: शास्त्रों में बीमार, बुजुर्ग और बच्चों के लिए छूट दी गई है। वे पूर्ण उपवास के बजाय एक समय फलाहार लेकर या केवल दूध-फल का सेवन कर मानसिक व्रत रख सकते हैं। भक्ति में भाव प्रधान होता है, शरीर की कष्टमय तपस्या अनिवार्य नहीं है।