दिल्ली चुनावों के संकेत पर निगाह

उमेश चतुर्वेदी|
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केंद्र शासित प्रदेशों में दो ही जगहें ऐसी हैं, जहां बाकायदा विधानसभा है और वहां चुनावों के जरिए मुख्यमंत्री और उसकी सरकार का निर्णय होता है, लेकिन चर्चा अगर ज्यादा दिल्ली के चुनावों की हो रही है तो उसकी अहम वजह सिर्फ यही नहीं है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है। 
 
नरेंद्र मोदी की अगुआई में मई 2014 से भाजपा का हरावल दस्ता राज्य दर राज्य अपनी विजयी पताका उत्तर भारत के इलाके में फहरा रहा है, उसी उत्तर भारत में दिल्ली भी है। जाहिर है कि हरावल दस्ते की यहां एक बार फिर परीक्षा होनी है। जुलाई 2013 में मोदी को भारतीय जनता पार्टी का प्रधानमंत्री प्रत्याशी बनाए जाने के बाद से ही जिस तरह के की चर्चा मीडिया करता रहा है, उसे भी की कसौटी पर कसा जाना है। 
 
लोकसभा चुनावों में बेशक अरविंद केजरीवाल का दमखम मोदी मैजिक के सामने अपनी ताकत नहीं दिखा पाया था, लेकिन दिल्ली के चुनावों में जिस तरह के संकेत मिल रहे है, उससे साफ है कि केजरीवाल का जादू मोदी के बरक्स पूरी ताकत से चुनौती पेश कर रहा है। खुद भाजपा भी चुनावी नतीजों को लेकर आश्वस्त नहीं है। ऐस चुनावों से ठीक दो दिन पहले केंद्र के ताकतवर मंत्रियों में शुमार वेंकैया नायडू का बयान आना कि दिल्ली के चुनाव मोदी के कामकाज का जनमत संग्रह नहीं होंगे- बीजेपी के आशंकित डर को ही साबित करता है।
 
वेंकैया का यह कहना कि दिल्ली में चुनाव पीएम के लिए नहीं हो रहा है, बल्कि सीएम के लिए हो रहा है। ध्यान देने की बात यह है कि हाल के दिनों में हुए महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा के चुनावों में बीजेपी के नेता मोदी की ही लोकप्रियता और उसके नाम पर जीत हासिल करने का दावा करते रहे। ऐसे में सवाल यह जरूर उठेगा कि उस दिल्ली में मोदी की लोकप्रियता का क्या हुआ, जहां उसी मोदी की अगुआई में केंद्र की सरकार चल रही है। 
 
दिल्ली में फिलहाल आंकड़े बीजेपी के साथ हैं। पिछले आम चुनाव में उसे आम आदमी पार्टी के मुकाबले 14 प्रतिशत ज्यादा वोट हासिल हुआ था। यह बड़ा अंतर है। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 2013 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने उस कांग्रेस का पूरा वोट बैंक ही हड़प लिया था, जिसकी पंद्रह साल से सरकार चल रही थी। दिल्ली में निश्चित तौर पर बीजेपी के कैडर का बड़ा हिस्सा किरण बेदी की उम्मीदवारी से नाराज है। जिसकी तस्दीक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखपत्र ऑर्गनाइजर भी कर चुका है।
 
दूसरी बात यह है कि मोदी सरकार की अति ईमानदार छवि से बीजेपी कार्यकर्ताओं का वह तबका निराश होता जा रहा है, जिसने अपने लिए अच्छे दिन आने की उम्मीद पाल रखी थी। हो सकता है कि उनकी उम्मीदें अतिवाद से प्रेरित हों, लेकिन ऐसी सोच वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग दिल्ली चुनाव में बीजेपी को फायदा होते नहीं देखना चाहता है। दूसरी बात यह है कि कैडर के बड़े लोग यह भी सवाल पूछने से नही हिचक रहे कि संगठन में बीस-तीस साल खपाने वालों की जगह सत्ता उस शख्सियत को क्यों दी जा रही है, जिसे राजनीति का चार दिन से ज्यादा अनुभव नहीं है। बेशक इस नाराजगी को दूर करने के लिए पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भरपूर कोशिश कर रहा है। लेकिन उसकी कोशिश कितनी कामयाब हुई, यह 10 फरवरी को ही पता चल पाएगा।
 
दिल्ली में 19 विधानसभा सीटों पर पूर्वांचल यानी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले वोटरों का दबदबा है। इसलिए बीजेपी के पूर्वांचली कार्यकर्ताओं ने उम्मीद पाल रखी थी कि दिल्ली में कम से 10 से 12 सीटों पर पूर्वांचली कार्यकर्ताओं को भाग्य आजमाने का मौका मिलेगा। लेकिन उन्हें सिर्फ तीन सीटें ही दी गईं। इससे नाराज बीजेपी के कई पूर्वांचली कार्यकर्ता अब उचित वोट देने की अपील कर रहे हैं। दिल्ली की राजनीति में पंजाबी और बनिया के साथ ही ग्रामीण इलाकों के जाट और गूजर समुदाय का दबदबा रहा है। यह बात और है कि आम आदमी पार्टी ने इस दबदबे से निकलने की कोशिश की है, जबकि बीजेपी में ऐसी कोशिश नजर नहीं आई। पार्टी को अगर इसका भी नुकसान उठाना पड़े तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
 
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को मुसलमान वोटरों का थोक समर्थन मिल रहा है। चार मुस्लिम बहुल सीटों, जहां कांग्रेस के कद्दावर नेता उम्मीदवार छोड़ दें- तो हर जगह यही हाल है। लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस की तरफ वोटरों के एक वर्ग का रुझान पिछले दो चुनावों की बनिस्बत बढ़ता नजर आ रहा है। ऐसे में बीजेपी की कोशिश रही कि कांग्रेस को ज्यादा फायदा हो। क्योंकि माना जा रहा है कि इससे आम आदमी पार्टी का खासकर ऑटो वालों और झुग्गियों के वोटरों में बंटवारा होगा।
 
माना यह भी जा रहा है कि आम आदमी पार्टी और बीजेपी के मध्यवर्गीय वोटरों में बड़ा फेरबदल होने से रहा। इसलिए कांग्रेस जितनी ताकतवर होगी, आम आदमी का उतना ही नुकसान होगा और इसका फायदा बीजेपी को होगा। बेशक मोदी की रैलियों ने सिर्फ अपने लिए जीने वाले मध्यवर्ग को कन्फ्यूज जरूर किया है। वह केजरीवाल और बीजेपी में से किसी एक को चुनने को लेकर दुविधा में नजर आ रहा है, लेकिन यह सच है कि एक बार फिर यह मध्यवर्ग और झुग्गियों के साथ ही पूर्वांचली मतदाता दिल्ली ही नहीं, यहां सक्रिय राजनीतिक दलों की किस्मत तय करेंगे।
 
लेकिन, यह तय है कि अगर बीजेपी की दिल्ली में हार होती है तो विपक्ष में खड़ा होने की कोशिश कर रहा जनता परिवार एक हो या न हो, केजरीवाल विपक्षी राजनीति की धुरी जरूर बन जाएंगे। उनके पास विपक्ष को समझाने के लिए तर्क होगा कि उन्होंने ही मोदी के अश्वमेध के घोड़े को रोक लिया। लिहाजा सबको उनका साथ देना चाहिए। बहरहाल इसके लिए हमें पहले सात फरवरी को वोटिंग और 10 फरवरी को उसके नतीजों का इंतजार करना होगा। (लेखक टेलीविजन पत्रकार हैं)



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