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वेलकम टू द जंगल रिव्यू: कॉमेडी के नाम पर दर्शकों की बुद्धिमत्ता का अपमान
भाई साहब, अहमद खान... आखिर आपने यह क्या बना दिया?
फिल्म शुरू होने के मुश्किल से दस मिनट बाद ही दिमाग में कई सवाल एक साथ कौंधने लगते हैं। अक्षय कुमार जैसे स्टार, जिनके पास फिल्मों की कोई कमी नहीं है, आखिर ऐसी फिल्म करने के लिए क्यों तैयार हुए? निर्माताओं ने किस भरोसे इस प्रोजेक्ट पर करोड़ों रुपये झोंक दिए? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या किसी ने रिलीज से पहले इस फिल्म को बैठकर पूरा देखा भी था?
इन सवालों के जवाब शायद किसी के पास नहीं होंगे, लेकिन इतना तय है कि दर्शकों को लगभग पौने तीन घंटे तक जिस अनुभव से गुजरना पड़ता है, वह किसी सजा से कम नहीं है।
फिल्म की शुरुआत में ही जॉनी लीवर बताते हैं कि यह वेलकम सीरीज की तीसरी कड़ी है। यानी वेलकम, वेलकम बैक और अब वेलकम टू द जंगल। लेकिन यह घोषणा जितनी स्पष्ट है, फिल्म की पहचान उतनी ही धुंधली। शीर्षक में जंगल शब्द जरूर जोड़ा गया है, लेकिन फिल्म का जंगल से कोई वास्तविक संबंध नहीं बनता। यह सिर्फ नाम का विस्तार है, कंटेंट का नहीं।
सबसे दिलचस्प बात इसकी कहानी है। कहानी का मूल विचार नीरज वोरा के नाम से जुड़ा है, जिनका निधन वर्षों पहले हो चुका है। संभव है कि उन्होंने कोई शुरुआती आइडिया छोड़ा हो, जिसे बाद में विकसित किया गया। लेकिन पर्दे पर जो कुछ नजर आता है, उसे देखकर लगता है कि विकास की प्रक्रिया कहीं रास्ते में ही दम तोड़ गई।
फिल्म में एक अमीर व्यक्ति टैक्स बचाने के लिए ऐसा व्यवसाय तलाशता है जिसमें वह भारी नुकसान दिखा सके। इसके लिए वह एक फ्लॉप निर्देशक को फिल्म बनाने का जिम्मा देता है और एक फ्लॉप अभिनेता को लेकर फिल्म शुरू कर देता है। यहीं से एक अजीब संदेह पैदा होता है कि क्या वेलकम टू द जंगल के निर्माता भी कहीं यही प्रयोग तो नहीं कर बैठे? क्योंकि इसके बाद जो कुछ स्क्रीन पर घटता है, वह किसी संगठित फिल्म से ज्यादा बेतरतीब घटनाओं का ढेर लगता है। 50 हजार रुपये मांगने वाले अभिनेता को 200 करोड़ रुपये में साइन किया जाता है और फिर बेतुकापन लगातार बढ़ता जाता है।
कॉमेडी की हालत और भी चिंताजनक है। फिल्म हंसी पैदा करने के लिए तोतलेपन, मोटापे, कम कद, शारीरिक कमियों और बोलने की अक्षमता का मजाक उड़ाती है। महिलाओं को कम बुद्धिमान दिखाने वाले प्रसंग हैं, भाषा का उपहास है और जब इन सब से बात नहीं बनती तो फूहड़ संवादों और अश्लील चुटकुलों का सहारा ले लिया जाता है। सवाल यह है कि क्या 2026 में भी हिंदी सिनेमा की कॉमेडी का स्तर यही रह गया है?
हां, दो-तीन दृश्य ऐसे आते हैं जहां हल्की मुस्कान चेहरे पर आ सकती है, लेकिन वह फिल्म की उपलब्धि नहीं, बल्कि दर्शक की मजबूरी है। जब कोई व्यक्ति कॉमेडी फिल्म देखने टिकट खरीदकर आता है, तो वह हंसने की कोशिश तो करेगा ही।
ऐसी फिल्मों के बचाव में अक्सर एक तर्क दिया जाता है- "लॉजिक मत ढूंढिए, यह मास एंटरटेनर है।" लेकिन क्या मास एंटरटेनर होने का मतलब यह है कि कहानी, पटकथा और सामान्य समझ को पूरी तरह खिड़की से बाहर फेंक दिया जाए? क्या आम दर्शकों को इतना कम समझदार मान लिया गया है कि उन्हें कुछ भी परोस दिया जाए और उम्मीद की जाए कि वे ताली बजाएंगे?
वेलकम टू द जंगल देखते हुए महसूस होता है कि फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में किसी ने किसी को रोका ही नहीं। लेखक ने जो मन में आया लिख दिया। निर्देशक ने जो सूझा शूट कर लिया। कलाकारों ने जैसे चाहा वैसे दृश्य निभा दिए। जहां मन किया गाना डाल दिया गया, जहां जगह मिली वहां एक्शन सीन घुसा दिया गया। बीच-बीच में घटिया संवादबाजी भी जोड़ दी गई। और फिर यह मान लिया गया कि फिल्म तैयार है।
सबसे ज्यादा हैरानी उन लोगों पर होती है जिन्होंने इस प्रोजेक्ट में पैसा लगाया। आखिर किस विश्वास के साथ? उससे भी ज्यादा आश्चर्य उन कलाकारों पर होता है जो इंटरव्यू और पॉडकास्ट में अपने किरदारों, स्क्रिप्ट चयन और सिनेमा की गंभीरता पर लंबी-लंबी बातें करते हैं, लेकिन ऐसी फिल्मों का हिस्सा बनने में उन्हें कोई समस्या नहीं होती। तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वे इंटरव्यू में अभिनय कर रहे होते हैं या फिल्मों में?
और अहमद खान? यह शायद इस फिल्म का सबसे रहस्यमय पहलू है। लगातार कमजोर फिल्में देने के बावजूद उन्हें बड़े बजट और बड़े सितारों वाली फिल्में मिलती रहती हैं, जबकि कई प्रतिभाशाली निर्देशक एक मौका पाने के लिए वर्षों संघर्ष करते रहते हैं।
तकनीकी स्तर पर भी फिल्म निराश करती है। निर्देशन पूरी तरह बिखरा हुआ है। एडिटिंग में कसाव नहीं है। सिनेमाटोग्राफी साधारण है और कई दृश्य ऐसे लगते हैं मानो उन्हें जल्दबाजी में शूट कर जोड़ दिया गया हो।
अभिनय की बात करें तो अक्षय कुमार को सबसे ज्यादा स्क्रीन टाइम मिला है और कुछ दृश्यों में वे अकेले फिल्म में ऊर्जा भरने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। रवीना टंडन असर छोड़ती है। किरण कुमार और फरीदा जलाल की एक जैसी कॉमेडी बार-बार दिखाई गई है। परेश रावल और राजपाल यादव को छोड़ दिया जाए तो बाकी कलाकारों की स्थिति तो एक्स्ट्रा कलाकारों से भी बदतर है। कई कलाकारों को गिनती के संवाद मिले हैं और कई सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर रह गए हैं।
दिशा पाटनी और जैकलीन फर्नांडिस का उपयोग तो और भी हैरान करता है। एक दृश्य में सवाल पूछा जाता है कि उन्हें फिल्म में क्यों रखा गया है और जवाब मिलता है कि ग्लैमर बढ़ाने के लिए। विडंबना यह है कि फिल्म उन्हें इतना स्क्रीन टाइम भी नहीं देती कि वे उस कथित ग्लैमर को पर्दे पर साबित कर सकें।
आखिर में वेलकम टू द जंगल के बारे में सिर्फ एक बात कही जा सकती है कि यह फिल्म दर्शकों की बुद्धिमत्ता का अपमान है। यह सिर्फ एक खराब फिल्म नहीं है, बल्कि उस सोच का उदाहरण है जिसमें माना जाता है कि बड़ा स्टारकास्ट, ऊंचा बजट और शोर-शराबा ही मनोरंजन का पर्याय है।
हैरानी की बात यह नहीं कि वेलकम टू द जंगल खराब फिल्म है। असली हैरानी यह है कि 2026 में भी ऐसी फिल्में बन रही हैं और यह उम्मीद की जा रही है कि दर्शक उन्हें स्वीकार कर लेंगे।
- WELCOME TO THE JUNGLE (2026)
- निर्देशक: अहमद खान
- गीतकार: मेघा बाली, तलविंदर, अभिनव शेखर, आनंद राज आनंद, शब्बीर अहमद
- संगीतकार: विक्रम मांतरोस, तलविंदर, एनडीएस, आनंद राज आनंद, साजिद-वाजिद
- कलाकार: अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, दिशा पाटनी, जैकलीन फर्नांडिस, अरशद वारसी, जैकी श्रॉफ, परेश रावल, रवीना टंडन, लारा दत्ता, फरीदा जलाल, जॉनी लीवर, श्रेयस तलपदे, तुषार कपूर, राजपाल यादव, कृष्णा अभिषेक, कीकू शारदा, दलेर मेहंदी, आफताब शिवदासानी, मुकेश तिवारी, यशपाल शर्मा, किरण कुमार, ज़ाकिर हुसैन, विंदू दारा सिंह, उर्वशी रौटेला निर्माता: फिरोज ए नाडियाडवाला, राकेश डंग, वेदांत विकास बाली
- सेंसर सर्टिफिकेट: यूए * 2 घंटे 44 मिनट 50 सेकंड
- रेटिंग : 0.5/5
