Satluj Review: पंजाब की उपजाऊ जमीन में दबी लाशों की वो खौफनाक कहानी, जिसे देख कांप जाएगी रूह!
1980 और 90 के दशक का पंजाब, एक ऐसा दौर जिसकी यादें आज भी अपनों को खोने वालों के दिलों में घाव बनकर हरी हैं। निर्देशक हनी त्रेहान की लंबे समय से अटकी फिल्म ज़ी5 (ZEE5) पर बिना किसी कट के 'सतलुज' (Satluj) नाम से रिलीज हुई, जिसे बाद में अचानक हटा दिया गया। इसके बाद यह चर्चा में आ गई। यूट्यूब सहित विभिन्न प्लेटफॉर्म पर आ गई और लोग इसे लगातार डाउनलोड कर रहे हैं। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि पंजाब की उस उपजाऊ जमीन का वो दर्दनाक सच है, जिसके नीचे न जाने कितनी बेनाम लाशें और अनकहे आंसू दफन हैं।
अगर आप सिनेमा में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि झकझोर देने वाला सच देखने का माद्दा रखते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है।
सतलुज की कहानी मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा (जिन्हें दिलजीत दोसांझ ने जीवंत किया है) के संघर्ष पर आधारित है। 1980 के दशक में जब पंजाब आतंकवाद (खाड़कू आंदोलन) और पुलिस के बीच की हिंसक जंग में झुलस रहा था, तब एक बेहद खौफनाक खेल चल रहा था। पुलिस और चरमपंथियों की इस आपसी लड़ाई में बलि सिर्फ और सिर्फ आम आदमी की चढ़ रही थी।
जसवंत सिंह खालड़ा, जो कि पेशे से एक बैंक मैनेजर थे, उन्हें अचानक म्युनिसिपल और श्मशान घाटों के रिकॉर्ड में एक ऐसा पैटर्न दिखता है जो किसी भी संवेदनशील इंसान की नींद उड़ा दे। पुलिस द्वारा हजारों 'लावारिस' बताकर जलाए गए शव असल में उन बेकसूर नौजवानों के थे, जो रातों-रात अपने घरों से गायब कर दिए गए थे। जसवंत इन 25,000 से अधिक गायब हुए युवाओं को न्याय दिलाने की जिद्द पर अड़ जाते हैं, लेकिन अंजाम? 1995 में वह खुद भी इसी सिस्टम के हाथों हमेशा के लिए 'गायब' कर दिए जाते हैं।
फिल्म के 3 सबसे मजबूत पहलू
1. दिलजीत दोसांझ का ऐसा रूप पहले नहीं देखा होगा
चुलबुले और कॉमिक किरदारों में नजर आने वाले दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा के किरदार में जान फूंक दी है। बिना किसी लाउड ड्रामे या चीख-पुकार के, सिर्फ अपनी आंखों और शांत लहजे से दिलजीत ने जो गुस्सा और लाचारी दिखाई है, वह सीधे दर्शकों के दिल में उतरती है। यह उनके करियर का अब तक का सबसे बेहतरीन अभिनय है।
2. पुलिसिया बर्बरता का बिना फिल्टर वाला सच
यह फिल्म किसी भी पक्ष का महिमामंडन नहीं करती। सुविंदर विक्की (Suvinder Vicky) ने एसएसपी सुग्गा (SSP Sugga) के रूप में एक ऐसे क्रूर पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया है, जो सिस्टम में प्रमोशन पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। फिल्म दिखाती है कि कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आम नागरिकों के मानवाधिकारों को कुचल दिया गया।
3. रोंगटे खड़े कर देने वाला डायरेक्शन और सिनेमैटोग्राफी
के.यू. मोहनन की सिनेमैटोग्राफी पंजाब के खेतों को हरा-भरा नहीं, बल्कि एक ठंडी, उदास और खौफनाक कब्रगाह की तरह दिखाती है। फिल्म का स्क्रीनप्ले 160 मिनट से ज्यादा लंबा होने के बावजूद आपको स्क्रीन से नजरें हटाने नहीं देता। यह एक कल्ट फिल्म 'माचिस' की याद दिलाती है, लेकिन एक अलग और अधिक कड़वे नजरिए से।
कड़वा सच: लड़ाई किसी की भी हो, पिसता आम आदमी ही है
"जब दो हाथी लड़ते हैं, तो कुचली हमेशा घास ही जाती है।"
'सतलुज' यही बात चीख-चीख कर कहती है। एक तरफ चरमपंथियों का आतंक था, तो दूसरी तरफ कानून के रखवालों की अंधी ताकत। बसों, ट्रेनों और बाजारों में मारे जाने वाले भी आम लोग थे, और पुलिस एनकाउंटर के नाम पर गायब किए जाने वाले भी आम घरों के लड़के थे। यह फिल्म उस मां के दर्द को दिखाती है जो दशकों तक अपने बेटे की राह तकते-तकते पागल हो गई, और उस पत्नी की कहानी है जिसने अकेले पूरे सिस्टम के खिलाफ कानूनी जंग लड़ी।
अंतिम फैसला: देखें या छोड़ दें?
'सतलुज' कोई आसान घड़ी नहीं है। इसे देखते हुए आपका दिल भारी होगा, गुस्सा आएगा और शायद आंखों में आंसू भी आ जाएं। लेकिन यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगी क्योंकि यह उस सच को दिखाने का साहस करती है जिसे दबाने की सालों कोशिश की गई।
- निर्देशक: हनी त्रेहान
- कलाकार: दिलजीत दोसांझ, अर्जुन रामपाल, कंवलजीत सिंह, सुरिंदर विक्की, सौरभ सचदेवा
- रेटिंग: 4/5

