छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे महान और प्रेरणादायक व्यक्तित्व पर फिल्म बनाना किसी भी फिल्ममेकर के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। यह सिर्फ एक ऐतिहासिक कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे नायक की गाथा है, जिसने “स्वराज्य” का सपना देखा और उसे साकार भी किया। राजा शिवाजी इसी भावना के साथ बनाई गई है, लेकिन फिल्म बार-बार यह एहसास कराती है कि इसकी सोच जितनी बड़ी है, उसकी प्रस्तुति उतनी प्रभावशाली नहीं बन पाई।
रितेश देशमुख ने इस फिल्म में अभिनय के साथ-साथ निर्देशन की कमान भी संभाली है। यह निर्णय साहसी जरूर है, लेकिन फिल्म देखते वक्त यह भी महसूस होता है कि दोनों जिम्मेदारियों के बीच संतुलन पूरी तरह साधा नहीं जा सका। फिल्म का ट्रीटमेंट कई जगह सीमित नजर आता है और यह एक पैन-इंडिया अपील बनाने से चूक जाती है। शिवाजी जैसे विशाल व्यक्तित्व को जिस स्केल और भव्यता के साथ पेश किया जाना चाहिए था, वह यहां पूरी तरह नहीं दिखता।
फिल्म की शुरुआत एक बड़े कैनवास पर होती है, जहां शिवाजी के जन्म से पहले की राजनीतिक परिस्थितियों को दिखाया गया है। उनके पिता शाहजी भोंसले के संघर्ष, दक्कन की सत्ता की उठापटक और उस दौर की जटिल राजनीति को जल्दी-जल्दी समेटने की कोशिश की गई है। हालांकि, यही जल्दबाजी फिल्म के शुरुआती हिस्से को थोड़ा भारी और उलझा हुआ बना देती है। कई किरदार, किले और घटनाएं इतनी तेजी से सामने आती हैं कि दर्शक उनसे जुड़ने का समय ही नहीं पा पाते।
जैसे-जैसे कहानी युवा शिवाजी की ओर बढ़ती है, फिल्म अपनी लय पकड़ती है। पुरंदर, कोंधना और चाकन जैसे किलों पर कब्जा, जावली घाटी की रणनीतिक जीत, ये सभी घटनाएं फिल्म को ऊर्जा देती हैं। यहां शिवाजी के अंदर का नेतृत्व और दूरदर्शिता झलकती है। लेकिन निर्देशक का झुकाव इस हिस्से में एक्शन की ओर ज्यादा नजर आता है। कई एक्शन सीक्वेंस जरूरत से ज्यादा स्टाइलाइज्ड लगते हैं, जो कहानी की गंभीरता को थोड़ा हल्का कर देते हैं।
फिल्म का सबसे मजबूत और दिलचस्प हिस्सा अफजल खान के साथ टकराव है। संजय दत्त ने इस किरदार में अपनी मौजूदगी से जान डाल दी है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस और खौफ, दोनों ही प्रभाव छोड़ते हैं। शिवाजी और अफजल खान की मुलाकात का सीन फिल्म का हाई पॉइंट बन जाता है, जहां कहानी में थ्रिल, रणनीति और भावनात्मक गहराई तीनों एक साथ नजर आते हैं। यही वह हिस्सा है, जहां फिल्म वास्तव में अपने उद्देश्य के करीब पहुंचती दिखती है।
हालांकि, फिल्म में ऐसे प्रभावशाली और प्रेरणादायक दृश्यों की संख्या सीमित है। शिवाजी महाराज का जीवन ऐसे अनगिनत क्षणों से भरा पड़ा है, जो दर्शकों के भीतर जोश और गर्व भर सकते थे। लेकिन फिल्म उन पलों को पूरी ताकत के साथ सामने नहीं ला पाती। संवाद भी कई जगह साधारण रह जाते हैं। याद रह जाने वाली या दर्शकों को रोमांचित कर देने वाली लाइनें कम ही सुनाई देती हैं।
अभिनय की बात करें तो रितेश देशमुख शिवाजी के किरदार में ईमानदार प्रयास करते नजर आते हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक चरित्र के लिए जिस करिश्मे, गहराई और ग्रेस की जरूरत थी, वह पूरी तरह उभर कर नहीं आ पाती। जेनेलिया डिसूजा का प्रदर्शन औसत है, जबकि अभिषेक बच्चन को सीमित स्क्रीन टाइम मिला है। दूसरी ओर, विद्या बालन ने कुटिल बेगम के किरदार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और प्रभाव छोड़ा है। फरदीन खान भी ठीक-ठाक नजर आते हैं। मराठी फिल्म दुनिया के कई कलाकार छोटे-छोटे रोल में नजर आते हैं।
तकनीकी पहलुओं पर नजर डालें तो फिल्म एक मिश्रित अनुभव देती है। सिनेमैटोग्राफी कई जगह शानदार फ्रेम्स पेश करती है, जो ऐतिहासिक माहौल को कैद करने में सफल रहती है। लेकिन प्रोडक्शन डिजाइन और विजुअल इफेक्ट्स उतने विश्वसनीय नहीं लगते। कई सीन नकली से महसूस होते हैं, जिससे फिल्म की भव्यता प्रभावित होती है। संगीत और गाने ज्यादा असर नहीं छोड़ते, जबकि बैकग्राउंड स्कोर कुछ जगहों पर जरूरत से ज्यादा लाउड हो जाता है।
अंत में, राजा शिवाजी एक ऐसी फिल्म है, जो अपने बड़े इरादों के बावजूद पूरी तरह से उन्हें साकार नहीं कर पाती। फिल्म की कमियां बार-बार उभरती हैं, लेकिन इसकी सबसे बड़ी जीत यही है कि यह शिवाजी की कहानी को परदे पर लाने की कोशिश करती है। अगर इसे बहुत ज्यादा उम्मीदों के साथ नहीं देखा जाए, तो यह फिल्म एक ठीक-ठाक सिनेमाई अनुभव दे सकती है, जो आपको जोड़ती है, लेकिन पूरी तरह से प्रभावित नहीं कर पाती।\
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RAJA SHIVAJI (2026)
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निर्देशक: रितेश देशमुख
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संगीत: अजय अतुल कलाकार: रितेश देशमुख, जेनेलिया देशमुख, संजय दत्त, विद्या बालन, अभिषेक बच्चन, फरदीन खान, भाग्यश्री, सचिन खेड़ेकर, अमोल गुप्ते, बोमन ईरानी
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* 3 घंटे 7 मिनट
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रेटिंग : 3/5