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Oh My Dog Movie Review: इंसान और कुत्ते के अनोखे रिश्ते की कहानी, ऑस्कर और मोमो सब पर भारी

Oh My Dog review in Hindi
फिल्मों में जानवरों की मौजूदगी हमेशा सिर्फ मनोरंजन भर नहीं रही। कई बार उन्होंने बड़े-बड़े सितारों की चमक भी फीकी कर दी। 'हाथी मेरे साथी' में हाथी के सामने सुपरस्टार राजेश खन्ना भी पीछे छूट गए थे। 'तेरी मेहरबानियां' में दर्शकों को जैकी श्रॉफ से ज्यादा उस वफादार कुत्ते की याद रही, जिसने पूरी कहानी को अपनी मासूमियत और वफादारी से जीवंत बना दिया। बाद में 'एंटरटेनमेंट' में भी अक्षय कुमार के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। इन फिल्मों ने साबित किया कि जब किसी जानवर का किरदार मजबूत लिखा जाए तो वह पर्दे पर मौजूद किसी भी स्टार से ज्यादा असर छोड़ सकता है। निर्देशक अमित राय की 'ओह माय डॉग' इसी परंपरा में एक नया और संवेदनशील अध्याय जोड़ती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कुत्ता सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है।
 
'ओह माय गॉड 2' के बाद अमित राय ने एक बार फिर ऐसी कहानी चुनी है, जिसमें मनोरंजन के साथ सामाजिक सरोकार भी हैं। यह फिल्म बच्चों के लिए एक रोमांचक एडवेंचर है, डॉग लवर्स के लिए भावनाओं का समंदर और बड़ों के लिए इंसानियत पर एक गंभीर सवाल। यही वजह है कि फिल्म एक साथ कई स्तरों पर संवाद करती है। कहीं यह दोस्ती की कहानी लगती है, कहीं थ्रिलर बन जाती है और कहीं समाज के उस अंधेरे चेहरे को सामने लाती है, जहां लालच रिश्तों और संवेदनाओं पर भारी पड़ जाता है।
 
फिल्म दो राज्यों, असम और बिहार, की दो समानांतर कहानियों को जोड़ती है। असम में रहने वाला तकनीक का शौकीन बच्चा अप्पू अपने प्यारे डॉग मोमो के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहा है। दूसरी ओर बिहार का बाल मजदूर प्रिंस है, जिसकी दुनिया उसके वफादार साथी ऑस्कर के इर्द-गिर्द घूमती है। एक दिन मोमो अचानक गायब हो जाता है और लगभग उसी समय प्रिंस का अपहरण कर लिया जाता है। पुलिस दोनों मामलों में औपचारिकता निभाती नजर आती है, लेकिन एक बच्चा अपने दोस्त की तलाश में निकल पड़ता है और दूसरी तरफ एक बेजुबान कुत्ता अपने मालिक को खोजने के लिए हर खतरा मोल ले लेता है।
 
यहीं से फिल्म भावनात्मक ड्रामा से निकलकर एक सस्पेंस थ्रिलर का रूप लेती है। धीरे-धीरे कहानी डॉग मीट रैकेट, पशु तस्करी, बाल मजदूरी, अंग तस्करी और गरीबी के उस भयावह संसार में पहुंचती है, जहां इंसान और जानवर दोनों ही बाजार की वस्तु बन चुके हैं। अमित राय इन मुद्दों को सनसनीखेज अंदाज में नहीं, बल्कि कहानी के स्वाभाविक हिस्से के रूप में पेश करते हैं और यही बात फिल्म को अलग बनाती है।
 
अमित राय की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने इस फिल्म को सिर्फ बच्चों की फिल्म बनने नहीं दिया। वह जानते हैं कि कुत्ते के इर्द-गिर्द बनी कहानी दर्शकों को आसानी से भावुक कर सकती है, लेकिन उन्होंने सिर्फ आंसू बटोरने का रास्ता नहीं चुना। उनकी कोशिश एक ऐसी फिल्म बनाने की है, जो मनोरंजन के साथ सोचने पर भी मजबूर करे।
 
फिल्म बार-बार यह सवाल पूछती है कि आखिर ज्यादा इंसान कौन है, वह बेजुबान जानवर जो आखिरी सांस तक अपने मालिक का साथ नहीं छोड़ता, या वह इंसान जो पैसों के लिए अपने ही जैसे इंसानों और जानवरों का सौदा कर देता है। यही विचार फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है।
 
हालांकि कई बार निर्देशक की महत्वाकांक्षा फिल्म पर भारी भी पड़ती है। पशु तस्करी, बाल मजदूरी, अंग तस्करी, पारिवारिक रिश्ते, दोस्ती, महाभारत के प्रतीक और सामाजिक संदेश, इतने सारे विषय एक साथ समेटने की कोशिश में कहानी कुछ जगह बिखरती हुई महसूस होती है। अगर फिल्म सिर्फ इंसान और कुत्ते के रिश्ते पर थोड़ा ज्यादा केंद्रित रहती तो उसका भावनात्मक प्रभाव शायद और गहरा होता।
 
तकनीकी रूप से फिल्म बेहद प्रभावशाली है। सिनेमैटोग्राफी सिर्फ सुंदर दृश्य नहीं दिखाती, बल्कि माहौल भी रचती है। खास तौर पर कुत्ते के नजरिए से फिल्माए गए दृश्य दर्शकों को कहानी के भीतर खींच लेते हैं और चेज सीक्वेंस को नया आयाम देते हैं।
 
बैकग्राउंड स्कोर कहानी की भावनाओं और सस्पेंस दोनों को मजबूती देता है। हालांकि गाने उतनी देर तक याद नहीं रहते और फिल्म खत्म होने के बाद उनका कोई खास प्रभाव नहीं बचता।
 
माही राय पूरी फिल्म की भावनात्मक धुरी हैं। उनकी मासूमियत, जिद और अपने डॉग के लिए तड़प पूरी तरह विश्वसनीय लगती है। पहली ही फिल्म में उन्होंने ऐसा आत्मविश्वास दिखाया है, जो भविष्य के लिए उम्मीद जगाता है।
 
पंकज त्रिपाठी हमेशा की तरह सहज हैं, लेकिन उनका किरदार जितना प्रभाव छोड़ सकता था, पटकथा उसे उतनी जगह नहीं देती। पवन मल्होत्रा अपनी एंट्री के साथ कहानी में नई ऊर्जा लेकर आते हैं। राजेश कुमार, विजय मिश्रा और गीता अग्रवाल अपने-अपने हिस्से का काम ईमानदारी से निभाते हैं।
 
लेकिन फिल्म का असली स्टार कोई इंसानी कलाकार नहीं, बल्कि ऑस्कर और मोमो हैं। दोनों डॉग्स का प्रशिक्षण और कैमरे के सामने उनकी सहजता कमाल की है। कई दृश्यों में उनके चेहरे के भाव शब्दों से ज्यादा असर छोड़ते हैं। शायद यही वजह है कि थिएटर से बाहर निकलने के बाद सबसे पहले इन्हीं दोनों की याद आती है।
 
'ओह माय डॉग' की सबसे बड़ी दुश्मन इसकी लंबाई है। पहले हिस्से में कहानी अच्छी गति से आगे बढ़ती है, लेकिन इंटरवल के बाद कई दृश्य दोहराव का शिकार हो जाते हैं। चेज सीक्वेंस जरूरत से ज्यादा लंबे हैं और कुछ भावनात्मक दृश्य भी अपेक्षा से अधिक खिंचते हैं। अगर एडिटिंग टेबल पर 20-25 मिनट कम किए जाते तो फिल्म कहीं ज्यादा प्रभावशाली बन सकती थी।
 
फिल्म की दूसरी कमजोरी इसकी पटकथा है। कई घटनाएं सुविधाजनक तरीके से घटती हैं और पुलिस जांच कई जगह सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने का माध्यम बनकर रह जाती है। कुछ किरदारों की पृष्ठभूमि अधूरी लगती है, जिससे उनके फैसलों का असर पूरी तरह नहीं बन पाता।
 
महाभारत के संदर्भ रोचक जरूर हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल पूरी तरह स्वाभाविक नहीं लगता। कई बार ऐसा महसूस होता है कि उन्हें कहानी में गहराई देने के लिए जोड़ा गया है, जबकि उनके बिना भी फिल्म अपना संदेश उतनी ही मजबूती से कह सकती थी।
 
विरोधी किरदारों को भी और मजबूत बनाया जा सकता था। पशु तस्करी और अंग तस्करी जैसे गंभीर अपराधों के पीछे काम करने वाले नेटवर्क की भयावहता को फिल्म छूती तो है, लेकिन पूरी तरह खोलकर सामने नहीं रखती। अगर इस हिस्से पर थोड़ा और काम होता तो थ्रिल का स्तर और ऊपर जा सकता था।
 
'ओह माय डॉग' सिर्फ एक कुत्ते और उसके मालिक की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की कहानी है जहां इंसान का लालच लगातार बढ़ रहा है और इंसानियत सिकुड़ती जा रही है। ऐसे समय में फिल्म यह याद दिलाती है कि वफादारी, प्रेम और समर्पण का सबसे बड़ा सबक अक्सर वही जीव सिखाते हैं, जिन्हें हम "बेजुबान" कहते हैं।
 
कमियां हैं, लंबाई, कुछ ढीली एडिटिंग, पटकथा की भटकन और कुछ गैर-जरूरी प्रतीकात्मक दृश्य। लेकिन फिल्म की ईमानदार नीयत, भावनात्मक ताकत और दोनों डॉग्स की शानदार परफॉर्मेंस इन कमजोरियों पर काफी हद तक भारी पड़ती है। अगर आपके घर में कभी कोई पालतू जानवर रहा है, तो आप इस मूवी को ज्यादा पसंद करेंगे। 
 
 
  • OH MY DOG (2026)
  • निर्देशक: अमित राय 
  • गीतकार: गुरु ठाकुर, अखिल तिवारी 
  • संगीतकार: अमन पंत  
  • कलाकार: माही राज, पंकज त्रिपाठी, पवन मल्होत्रा, ऑस्कर, मोमो 
  • रेटिंग : 2.5/5 
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें
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