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‘मिर्जापुर द मूवी’ रिव्यू: गद्दी की जंग में फिर लौटा वही देसी स्वैग

‘मिर्जापुर द मूवी’ रिव्यू: कालीन भैया, गुड्डू और मुन्ना की दुनिया में नया खेल, रवि किशन ने बढ़ाया रोमांच
देसी गैंगस्टरों, अपराध, राजनीति और सत्ता की ऐसी दुनिया, जहां रिश्तों से ज्यादा मायने गद्दी के होते हैं, ‘मिर्जापुर’ वेबसीरीज ने इस माहौल को भारतीय दर्शकों के बीच एक अलग पहचान दिलाई। कालीन भैया, गुड्डू, मुन्ना, बीना, बबलू, बाउजी जैसे ‍किरदारों की लोकप्रियता इतनी फैल गई कि संवाद, अंदाज और सीन सोशल मीडिया पर मीम्स और वायरल क्लिप्स के रूप में खूब नजर आए। ऐसे में इन लोकप्रिय किरदारों को बड़े पर्दे पर लाने का फैसला निर्माता फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी के लिए स्वाभाविक भी था। ‘मिर्जापुर द मूवी’ इसी लोकप्रिय दुनिया को सिनेमाघर तक लेकर आती है।
 
सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म वेबसीरीज की लोकप्रियता को सिर्फ भुनाने की कोशिश नहीं करती। किरदार वही हैं, माहौल वही है और प्रस्तुतिकरण में वही देसी खुरदुरापन है, लेकिन कहानी नई है। इसलिए फिल्म की पहली फ्रेम से ही दर्शक उस दुनिया में सहज महसूस करने लगता है, जिससे वह पहले से परिचित है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मिर्जापुर की गद्दी की लड़ाई बड़े पर्दे पर है।
 
फिल्म की शुरुआत एक बेहद अर्थपूर्ण संवाद से होती है, जीवन और मृत्यु के बीच सिर्फ वर्चस्व होता है और यह वर्चस्व उस गद्दी से आता है, जिसे बाहुबल के दम पर हासिल किया जाता है। यही विचार पूरी कहानी की धुरी बन जाता है। गैरकानूनी धंधे, अपराध और राजनीति का गठजोड़, सत्ता की भूख, गद्दी पर कब्जे की चाह, विश्वासघात और षड्यंत्र, ‘मिर्जापुर’ की पहचान रहे ये सभी तत्व फिल्म में भी मौजूद हैं।
 
मिर्जापुर की गद्दी पर कई निगाहें टिकी हैं। इसमें अपराधी भी हैं और नेता भी। अखंडानंद ‘कालीन’ त्रिपाठी के खिलाफ साजिश का जाल बुना जा रहा है। खास बात यह है कि इस साजिश में कुछ चेहरे उसके अपने हैं, जबकि कुछ बाहर से आए हैं। यानी खतरा सिर्फ सामने से नहीं, भीतर से भी है।
 
दूसरी तरफ मुन्ना का अपना संघर्ष है। उसके भीतर यह कसक है कि उसके पिता उसे उतना बेहतर नहीं मानते, जितना गुड्डू को। गुड्डू और मुन्ना के बीच तनाव भी कहानी को आगे बढ़ाता है। इसी बीच बब्बन यादव के रूप में रवि किशन की एंट्री होती है। उनका किरदार मिर्जापुर की पहले से उलझी हुई दुनिया को और पेचीदा बना देता है, क्योंकि उसके इरादे साफ तौर पर नेक नहीं हैं।
 
पुनीत कृष्णा की कहानी में कुछ ऐसे हिस्से हैं, जो पूरी तरह संतुष्ट नहीं करते। कुछ लूपहोल्स भी नजर आते हैं। मसलन, कालीन भैया का एक अनजान व्यापारी पर भरोसा करना और उसके लिए जैसलमेर तक जाना कहानी में पूरी तरह जस्टिफाई नहीं हो पाता। ऐसे प्रसंग सवाल जरूर खड़े करते हैं।
 
लेकिन यहां फिल्म का स्क्रीनप्ले कहानी की इन कमियों की भरपाई काफी हद तक कर देता है। घटनाओं को जिस अंदाज में पिरोया गया है, उसमें वही ‘मिर्जापुर’ वाला फ्लेवर बरकरार रहता है। जोरदार संवाद, कलाकारों का स्वैग और मनोरंजक सीन लगातार फिल्म को आगे धकेलते हैं।
 
कभी-कभी कहानी में ठहराव महसूस होता है और कुछ हिस्से थोड़े खिंचे हुए लगते हैं। लेकिन तभी कोई हाईलाइट सीन सामने आ जाता है और फिल्म का ग्राफ अचानक ऊपर उठ जाता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। स्क्रीनप्ले ने मनोरंजन को प्राथमिकता दी है और दर्शक को लंबे समय तक बांधे रखने की कोशिश लगातार दिखाई देती है।
 
निर्देशक गुरमीत सिंह ने कहानी की कुछ बारीकियों पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना दिया जा सकता था। कुछ घटनाओं को और बेहतर तरीके से स्थापित किया जाता तो फिल्म ज्यादा प्रभावशाली हो सकती थी। खासकर क्लाइमैक्स को और धारदार बनाया जा सकता था।
 
हालांकि किरदारों को निखारने में उन्होंने काफी मेहनत की है। छोटे-बड़े सभी किरदार अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। किसी को ज्यादा स्क्रीन टाइम मिला है तो किसी को कम, लेकिन कोई किरदार पूरी तरह बेअसर नहीं जाता।
 
फिल्म राजनीति, अफसरशाही और अपराध की दुनिया के उस गठजोड़ की तरफ भी इशारा करती है, जो सत्ता के खेल को भीतर से प्रभावित करता है। इस गंभीर पहलू को फिल्म पूरी तरह विस्तार नहीं देती, लेकिन संकेत जरूर देती है। साथ ही निर्देशक यह भी सुनिश्चित करते हैं कि फिल्म सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी बनकर न रह जाए और मनोरंजन का सिलसिला चलता रहे।
 
‘मिर्जापुर द मूवी’ का सबसे मजबूत पक्ष इसका अभिनय है। लगभग सभी कलाकार अपने किरदारों में पूरी तरह रचे-बसे नजर आते हैं। अली फजल और दिव्येंदु ने गुड्डू और मुन्ना के किरदारों को एक बार फिर अपना अलग रंग दिया है। दोनों कलाकार अपने-अपने किरदारों को सिर्फ निभाते नहीं, बल्कि उन्हें पूरी तरह जीते हुए दिखाई देते हैं।
 
पंकज त्रिपाठी पूरी फिल्म में एक मजबूत स्तंभ की तरह नजर आते हैं। कालीन भैया के किरदार में उनका ठहराव और अंदाज अब इस फ्रेंचाइजी की पहचान बन चुका है।
 
रवि किशन की एंट्री फिल्म के अहम आकर्षणों में से एक है। बब्बन यादव के किरदार में उनकी एक्टिंग बेहद नैसर्गिक है। वह बिना जरूरत के ओवरड्रामैटिक हुए अपने किरदार में खतरनाक धार पैदा करते हैं। रसिका दुग्गल भी अपने अभिनय से फिल्म को एक अलग रंग देती हैं।
 
अभिषेक बनर्जी, राजेश तेलंग, कुलभूषण खरबंदा और जितेंद्र कुमार जैसे कलाकार भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। इन कलाकारों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे फिल्म में सिर्फ चेहरा बनकर नहीं आते, बल्कि अपने किरदार की छाप छोड़ते हैं।
 
‘मिर्जापुर’ की सबसे बड़ी पहचान उसके संवाद रहे हैं और फिल्म इस विरासत को कमजोर नहीं पड़ने देती। संवादों में देसीपन है, लेकिन उनके भीतर गंभीर बातें भी हैं। खास बात यह है कि कई गंभीर स्थितियों को मजाकिया और चुटीले अंदाज में पेश किया गया है।
 
कई जगह संवाद ही सीन को ऊंचा उठा देते हैं। कलाकारों के चेहरे के भाव, उनका अंदाज और संवाद बोलने की शैली मिलकर ऐसे पल बनाते हैं, जिन्हें दर्शक सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी याद रख सकता है।
 
फिल्म के गाने इसकी गति को कई जगह प्रभावित करते हैं। इस तरह की कहानी में संगीत का इस्तेमाल सीमित रखा जाता तो बेहतर होता। कुछ गाने कहानी के लिए जरूरी महसूस नहीं होते और अनावश्यक रूप से फिल्म की लंबाई बढ़ाते हैं। ‘मिर्जापुर’ की दुनिया जिस रफ्तार और तनाव पर चलती है, उसमें कम गाने फिल्म के पक्ष में जाते।
 
तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत है। बड़े पर्दे के हिसाब से इसके विजुअल्स, एक्शन और प्रस्तुति में पर्याप्त दम है। फिल्म का ट्रीटमेंट उसकी दुनिया को सिनेमाई विस्तार देता है, हालांकि कहानी के स्तर पर कुछ और कसावट इसे और प्रभावी बना सकती थी।
 
कुल मिलाकर ‘मिर्जापुर द मूवी’ की नींव तीन मजबूत खंभों पर टिकी है, जबरदस्त किरदार, दमदार कलाकार और जोरदार संवाद। यह फिल्म उन दर्शकों के लिए खास तौर पर बनाई गई महसूस होती है, जो ‘मिर्जापुर’ की दुनिया से पहले ही रिश्ता बना चुके हैं। नए दर्शकों के लिए यह अपराध, राजनीति और सत्ता की एक देसी कहानी है, जबकि पुराने प्रशंसकों के लिए यह अपने पसंदीदा किरदारों से बड़े पर्दे पर दोबारा मिलने का मौका है।
 
  • MIRZAPUR: THE MOVIE (2026)
  • निर्देशक: गुरमीत सिंह
  • गीतकार: कुमार, तेजपाल सिंह रावत, गिन्नी दीवान, ढांडा न्योलीवाल
  • संगीतकार: रे, जुनैद कुमार, आनंद भास्कर, ढांडा न्योलीवाल
  • कलाकार: पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु, जीतेन्द्र कुमार, रवि किशन, रसिका दुग्गल, अभिषेक बनर्जी, श्वेता त्रिपाठी, कुलभूषण खरबंदा
  • सेंसर सर्टिफिकेट: ए (केवल वयस्कों के लिए) * 3 घंटे 17 मिनट 19 सेकंड 
  • रेटिंग : 3/5
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें
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