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है जवानी तो इश्क होना है रिव्यू: हंसी की तलाश में भटकती कॉमेडी
एक दौर था जब डेविड धवन का नाम सुनते ही दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। उनकी फिल्मों का मतलब होता था बिना ज्यादा दिमाग लगाए भरपूर मनोरंजन। लेकिन समय बदल गया है और कॉमेडी भी। आज के दौर में दर्शक सिर्फ शोर-शराबे, गलतफहमियों और भागदौड़ को कॉमेडी मानने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि हाल के वर्षों में आई कई तथाकथित कॉमेडी फिल्में हंसी से ज्यादा निराशा दे गईं। दुर्भाग्य से है जवानी तो इश्क होना है भी उसी कतार में खड़ी नजर आती है। यह न केवल डेविड धवन की हालिया फिल्मों में बल्कि उनके पूरे करियर की सबसे कमजोर फिल्मों में गिनी जा सकती है।
युनूस सेजवाल जैसे सफल लेखक और मसाला मनोरंजन के उस्ताद माने जाने वाले डेविड धवन का साथ सुनने में बेहद रोमांचक लगता है। उम्मीद थी कि यह जोड़ी बड़े पर्दे पर धमाका करेगी, लेकिन नतीजा इसके बिल्कुल उलट निकलता है। खूबसूरत विदेशी लोकेशन, रंगीन फ्रेम और सजे-धजे सितारों के बावजूद फिल्म में ऐसा बहुत कम है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद याद रह जाए। करीब सवा दो घंटे की यह फिल्म कई जगह इतनी लंबी और थकाऊ महसूस होती है कि समय रुकता हुआ प्रतीत होने लगता है।
कहानी जस (वरुण धवन) और बानी (मृणाल ठाकुर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक-दूसरे से बेहद प्यार करते हैं और शादी के पांच साल पूरे कर चुके हैं। समस्या सिर्फ इतनी है कि जस पिता बनना चाहता है जबकि बानी अभी मां बनने के लिए तैयार नहीं है। यह मतभेद इतना बढ़ जाता है कि मामला अदालत तक पहुंच जाता है। जज दोनों को छह महीने का समय देता है और वे अलग रहने का फैसला कर लेते हैं। इसके बाद जस लंदन पहुंच जाता है, जहां उसकी मुलाकात प्रीत (पूजा हेगड़े) से होती है और दोनों के बीच प्रेम कहानी शुरू हो जाती है। स्थिति तब उलझती है जब प्रीत गर्भवती हो जाती है और उसी दौरान बानी भी लंदन पहुंचकर खुद के गर्भवती होने की खबर देती है। इसके बाद शुरू होता है झूठ, भ्रम और छिपाव का सिलसिला, जिसे फिल्म हास्य के रूप में पेश करना चाहती है।
समस्या यहीं से शुरू होती है। फिल्म की पूरी बुनियाद ही बेहद कमजोर और अविश्वसनीय लगती है। जस और बानी के रिश्ते को जिस तरह गहरे प्रेम से भरा दिखाया गया है, उसके बाद उनका तलाक की कगार तक पहुंच जाना सहज नहीं लगता। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जस अचानक लंदन क्यों पहुंचता है? फिल्म इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं देती। शादीशुदा होने के बावजूद उसका प्रीत के साथ प्रेम संबंध बनाना भी चरित्र के अनुरूप नहीं लगता क्योंकि फिल्म लगातार उसे भोला, मासूम और नेकदिल साबित करने की कोशिश करती रहती है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जस अपने किसी भी फैसले या गलती को लेकर वास्तव में अपराधबोध महसूस करता दिखाई नहीं देता। उल्टा पटकथा इस तरह लिखी गई है कि दर्शक उसकी गलतियों पर सवाल उठाने के बजाय उस पर तरस खाने लगें कि बेचारा दो महिलाओं को खुश रखने के लिए कितनी मुश्किलें झेल रहा है। यह दृष्टिकोण न केवल सतही लगता है बल्कि पूरी कहानी को नैतिक और भावनात्मक स्तर पर खोखला भी बना देता है। फिल्म का क्लाइमैक्स इस कमजोरी को और उजागर करता है, जहां जस अपनी जिम्मेदारियों से बचते हुए लगभग सभी को गलत ठहरा देता है।
स्क्रीनप्ले की दूसरी बड़ी समस्या यह है कि पूरी दुनिया में केवल जस ही बुद्धिमान दिखाई देता है। बानी, प्रीत, प्रीत का भाई और लगभग बाकी सभी किरदार इतने भोले या मूर्ख दिखाए गए हैं कि वे जस की किसी भी कहानी पर बिना सोचे-समझे विश्वास कर लेते हैं। कॉमेडी फिल्मों में अतिशयोक्ति स्वीकार की जा सकती है, लेकिन यहां यह अतिशयोक्ति हास्य नहीं बल्कि झुंझलाहट पैदा करती है। दर्शक हंसने के बजाय बार-बार सोचता है कि आखिर कोई पात्र इतना अविश्वसनीय व्यवहार कैसे कर सकता है।
हास्य दृश्य भी फिल्म की सबसे बड़ी निराशाओं में शामिल हैं। अधिकांश कॉमिक सिचुएशन लंबी खिंचती हैं और उनमें हास्य का प्रभाव लगभग नदारद है। कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे वे सिर्फ समय भरने के लिए जोड़े गए हों। हंसी पैदा करने के लिए संवाद, परिस्थितियां और किरदारों की प्रतिक्रिया, तीनों का मजबूत होना जरूरी है, लेकिन यहां तीनों स्तरों पर लेखन कमजोर पड़ जाता है।
लेखक युनूस सेजवाल का काम स्तरहीन है। कॉमेडी के नाम पर कई जगह बेहद आसान और पुराने ढर्रे के चुटकुलों का सहारा लिया गया है। यहां तक कि मोटे लोगों का मजाक उड़ाने जैसी पुरानी और अप्रासंगिक शैली भी अपनाई गई है। फरहाद सामजी के संवाद भी याद रखने योग्य नहीं हैं। एक कॉमेडी फिल्म में संवाद ही सबसे बड़ा हथियार होते हैं, लेकिन यहां वे शायद ही कभी मुस्कान पैदा कर पाते हैं।
निर्देशक के रूप में डेविड धवन भी पूरी तरह निराश करते हैं। ऐसा लगता है मानो वे अपने ही पुराने दौर को दोहराने की कोशिश कर रहे हों। पुराने गीतों का इस्तेमाल, पुरानी फिल्मों के संदर्भ और वही परिचित फार्मूला बार-बार नजर आता है, लेकिन उस जादू की पूरी तरह कमी है जिसने कभी उनकी फिल्मों को लोकप्रिय बनाया था। निर्देशन बेहद सतही और जल्दबाजी में किया गया प्रतीत होता है।
फिल्म का एक दृश्य इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। पूजा हेगड़े का किरदार नदी में डूबता हुआ दिखाया जाता है, लेकिन दृश्य इतना बनावटी है कि उसमें किसी तरह का रोमांच या खतरा महसूस ही नहीं होता। वह नदी किनारे से कुछ मीटर दूर खड़ी होकर हाथ हिलाती रहती है और तुरंत वरुण धवन उसे बचा लेते हैं। सवाल उठता है कि ऐसे दृश्य को अंतिम रूप देने से पहले किसी ने इसकी विश्वसनीयता पर विचार क्यों नहीं किया? ऐसा लगता है कि फिल्म को यह भरोसा था कि तेज रफ्तार बैकग्राउंड म्यूजिक, लगातार भागदौड़ और अचानक आने वाले गाने उसकी कमियों को छिपा देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाता।
अभिनय की बात करें तो वरुण धवन अपनी सहज कॉमिक टाइमिंग के दम पर कुछ दृश्यों को संभालने की कोशिश करते हैं। हालांकि कमजोर पटकथा उनके प्रदर्शन को भी सीमित कर देती है। पूजा हेगड़े को फिल्म में मुख्य रूप से ग्लैमरस उपस्थिति के लिए इस्तेमाल किया गया है और उन्होंने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई है। जो भी दृश्य उन्हें मिले, उनमें वे प्रभाव छोड़ती हैं और कई मौकों पर मृणाल ठाकुर से बेहतर नजर आती हैं। मृणाल का अभिनय कई जगह जरूरत से ज्यादा ऊंचे सुर में जाता है, जिससे उनका किरदार स्वाभाविक नहीं लग पाता।
सहायक कलाकारों में चंकी पांडे लगातार झुंझलाहट पैदा करते हैं। जिमी शेरगिल को ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे वे प्रभाव छोड़ सकें। मनीष पाल का उपयोग बेहद सीमित और निराशाजनक है। मौनी रॉय का किरदार कहानी में लगभग हास्यास्पद स्तर तक अनावश्यक महसूस होता है। राजपाल यादव, जॉनी लीवर और राकेश बेदी जैसे अनुभवी कलाकार छोटे-छोटे रोल में नजर आते हैं, लेकिन पटकथा उन्हें चमकने का अवसर ही नहीं देती।
संगीत भी फिल्म की मदद नहीं कर पाता। कई गीतकारों और संगीतकारों की मौजूदगी के बावजूद गानों का स्तर औसत है। ज्यादातर गाने कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय ब्रेक का काम करते हैं। फिल्म का एकमात्र लगातार सकारात्मक पक्ष अयानंका बोस की सिनेमाटोग्राफी है। उनकी कैमरा दृष्टि हर फ्रेम को आकर्षक बनाती है। विदेशी लोकेशन खूबसूरती से कैद की गई हैं और कई बार लगता है कि कैमरा कहानी से कहीं ज्यादा दिलचस्प काम कर रहा है।
आखिरकार है जवानी तो इश्क होना है उस बुनियादी कसौटी पर ही असफल हो जाती है जिस पर किसी भी कॉमेडी फिल्म को परखा जाता है और वो है मनोरंजन। दर्शक टिकट खरीदकर हंसने, हल्का महसूस करने और अच्छा समय बिताने की उम्मीद से थिएटर पहुंचता है, लेकिन फिल्म उसे न हंसी दे पाती है, न भावनात्मक जुड़ाव और न ही कोई यादगार सिनेमाई अनुभव। खूबसूरत लोकेशन, स्टारकास्ट और रंगीन पैकेजिंग के बावजूद भीतर से यह फिल्म खाली महसूस होती है। डेविड धवन की फिल्म से जिस बेफिक्र मनोरंजन की उम्मीद की जाती है, वह यहां कहीं नजर नहीं आता। नतीजतन, है जवानी तो इश्क होना है एक ऐसी कॉमेडी बनकर रह जाती है, जिसमें हंसी सबसे दुर्लभ चीज साबित होती है।
- HA JAWANI TOH ISHQ HONA HAI (2026)
- निर्देशक: डेविड धवन
- गीतकार: वायु, जयराज, मोहसिन शेख, रॉनी अंजली एंड गिल मैक्करी, आईपी सिंह
- संगीत: व्हाइट नॉइज़ कलेक्टिव्स, तनिष्क बागची, रॉनी अंजली, गिल मैक्करी, जावेद-मोहसिन, अक्षय एंड आईपी
- कलाकार: वरुण धवन, मृणाल ठाकुर, पूजा हेगड़े, मनीष पाल, चंकी पांडे, जिम्मी शेरगिल, मौनी रॉय, राकेश बेदी, राजपाल यादव, जॉनी लीवर
- निर्माता: रमेश तौरानी
- सेंसर सर्टिफिकेट : यूए (16 वर्ष प्लस)* 2 घंटे 16 मिनट 40 सेकंड
- रेटिंग : 1/5
