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गांधारी रिव्यू: मां का दर्द, गुस्सा और संघर्ष के बावजूद फिल्म नहीं छोड़ पाती असर

Gandhari Movie Review
एक मां के लिए उसकी संतान से बढ़कर कुछ नहीं होता। अगर बच्चा उससे छिन जाए तो वह मां क्या कर सकती है, इसका जवाब फिल्म ‘गांधारी’ देती है, जो हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई है। तापसी पन्नू की यह फिल्म एक ऐसी मां की कहानी है, जो अपनी बेटी को बचाने के लिए एक खतरनाक गिरोह से भिड़ जाती है जबकि उसकी आंखों की रोशनी भी चली जाती है। कहानी का मुद्दा गंभीर है और तापसी पूरी ताकत के साथ अपने किरदार को निभाती हैं, लेकिन फिल्म देखते हुए कई बार लगता है कि ऐसी कहानी हम पहले भी देख चुके हैं।
 
कहानी की शुरुआत ट्रेन के सफर से होती है। बानी (तापसी पन्नू), उसका पति गोकुल (इशवाक सिंह) और उनकी छोटी बेटी साथ हैं। सब कुछ सामान्य है, लेकिन जॉयपुरा स्टेशन पर उनकी बेटी अचानक गायब हो जाती है। माता-पिता के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। पुलिस से मदद की उम्मीद भी पूरी नहीं होती।
 
बानी और गोकुल अपनी बेटी की तलाश शुरू करते हैं। इसी दौरान पता चलता है कि बच्ची किसी ऐसे गिरोह के हाथ लगी है, जो बच्चों की तस्करी करता है। सिर्फ उनकी बेटी ही नहीं, कई दूसरे बच्चे भी इस गिरोह के कब्जे में हैं।
 
यहीं से फिल्म की कहानी एक मां की निजी लड़ाई से आगे बढ़ जाती है। बानी अपनी बेटी को वापस लाना चाहती है, लेकिन जब उसे दूसरे बच्चों के बारे में पता चलता है तो वह उन्हें भी बचाने का फैसला करती है।
 
फिल्म का यह हिस्सा अच्छा है। बानी के सामने एक तरफ अपनी बेटी है और दूसरी तरफ वे बच्चे हैं, जिनका कोई सहारा नहीं है। गोकुल का मानना है कि पहले अपनी बेटी को बचाना जरूरी है। बानी इससे सहमत नहीं होती। दोनों के बीच का यह मतभेद फिल्म में एक अहम सवाल खड़ा करता है कि क्या एक मां सिर्फ अपने बच्चे के लिए लड़े या उन बच्चों के लिए भी खड़ी हो, जिन्हें कोई बचाने वाला नहीं है?
 
कनिका ढिल्लों की कहानी का विषय मजबूत है, लेकिन इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो नया नहीं लगता। बच्चों की तस्करी पर पहले भी फिल्में और सीरीज बन चुकी हैं। ‘गांधारी’ भी कई जगह उसी तरह की कहानी और किरदारों के साथ आगे बढ़ती है। कुछ जगह कहानी पहले से ही अंदाजा लगाने का मौका दे देती है कि आगे क्या होने वाला है।
 
फिर भी फिल्म की रफ्तार अच्छी है। कहानी ज्यादा देर तक एक ही जगह नहीं रुकती। हां, कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां फिल्म का असर उतना नहीं होता, जितना होना चाहिए था।
 
तापसी पन्नू फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। बानी के किरदार में वह एक परेशान मां से लेकर गुस्से से भरी महिला तक का सफर बहुत अच्छे से तय करती हैं। बेटी को खोजने की बेचैनी उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती है। बाद में जब वह अपराधियों से भिड़ती हैं तो उनका गुस्सा और मजबूत नजर आता है।
 
खास बात यह है कि तापसी सिर्फ जोरदार डायलॉग बोलकर किरदार को मजबूत नहीं बनातीं। उनके चेहरे के भाव और शरीर की भाषा भी बहुत कुछ कहती है। बेटी के लिए परेशान मां और फिर उसे बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने वाली महिला, दोनों रूपों में वह अच्छी लगती हैं।
 
इशवाक सिंह ने गोकुल की भूमिका ठीक तरह से निभाई है। वह अपनी बेटी को बचाना चाहता है और उसकी बेचैनी समझ में आती है। छाया कदम, मीता वशिष्ठ, स्वास्तिका मुखर्जी, जतिन सरना, प्रशांत नारायणन और चंदन रॉय जैसे कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।
 
बतौर निर्देशक देवाशीष मखीजा कुछ नया नहीं दे पाए हैं। उन्होंने माहौल बहुत अवसाद भरा रखा है। थोड़े हल्के-फुल्के क्षण भी होने चाहिए थे। वे फिल्म को बहुत प्रभावशाली और विश्वसनीय नहीं बना पाए। हालांकि फिल्म बच्चों की तस्करी जैसे गंभीर मुद्दे को हल्के में नहीं लेती लेकिन कोई नई बात भी नहीं पेश करती। कुछ जगह कहानी को ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए लोककथाओं, देवी-देवताओं और रहस्यमय माहौल का सहारा लिया गया है। ये हिस्से फिल्म को अलग बनाने की कोशिश तो करते हैं, लेकिन हर जगह असर नहीं छोड़ते।
 
फिल्म का तकनीकी पक्ष अच्छा है। कैमरा वर्क कहानी के माहौल के साथ चलता है। बैकग्राउंड म्यूजिक तनाव पैदा करता है और एक्शन सीन भी अच्छे हैं। एडिटिंग की वजह से फिल्म की रफ्तार बनी रहती है।
 
कुल मिलाकर ‘गांधारी’ एक गंभीर मुद्दे पर बनी फिल्म है। तापसी पन्नू ने इसे अपने दमदार अभिनय से काफी संभाला है। लेकिन परेशानी यह है कि जिस कहानी को फिल्म नए अंदाज में बताना चाहती है, वह कई जगह जानी-पहचानी लगती है। मां का दर्द और उसका गुस्सा आपको जरूर महसूस होता है, लेकिन फिल्म असर नहीं छोड़ पाती।
 
  • GANDHARI (2026) 
  • निर्देशक: देवाशीष माखीजा
  • गीतकार: कौसर मुनीर
  • संगीतकार: शोर पोलिस, क्लिंटन सेरेजो, बिनाका गोम्स 
  • कलाकार: तापसी पन्नू, इशवाक सिंह, छाया कदम, स्वास्तिका मुखर्जी, मीता वशिष्ठ 
  • ओटीटी प्लेटफॉर्म : नेटफ्लिक्स
  • रेटिंग : 1.5/5 
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें
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