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दृश्यम द कन्क्लूजन रिव्यू: अजय देवगन की खामोशी के सामने पुलिस और कानून का चक्रव्यूह

दृश्यम द कन्क्लूजन रिव्यू: अजय देवगन की खामोशी के सामने पुलिस और कानून का चक्रव्यूह
कुछ फिल्में खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं होतीं। उनके किरदार, संवाद और चालें दर्शक के दिमाग में चलती रहती हैं। दृश्यम इसी श्रेणी की फ्रेंचाइजी है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि अपराध और थ्रिलर की जमीन पर खड़ी होने के बावजूद यह मूल रूप से परिवार की कहानी है।
 
एक आदमी अपने परिवार को बचाने के लिए अपराध करता है और फिर उसी अपराध से परिवार को बचाने के लिए कानून से आंख-मिचौली खेलता है। दिलचस्प बात यह है कि दर्शक जानते हुए भी उसके साथ खड़ा रहता है। यही विरोधाभास दृश्यम को सामान्य क्राइम थ्रिलर से अलग करता है।
 
दृश्यम द कन्क्लूजन इसी खेल का अगला और अंतिम पड़ाव है। इस बार विजय सालगांवकर के सामने सिर्फ पुलिस नहीं है। उसके सामने राजवीर सिंह तोमर जैसा अधिकारी है, जो पुराने केस की एक-एक परत उधेड़ने में जुटा है और अदालत में इंद्रजीत शेट्टी जैसा वकील है, जो उसकी बनाई दुनिया में दरार तलाश रहा है। यानी इस बार विजय का चक्रव्यूह पहले से बड़ा है।
 
मीरा देशमुख अपने बेटे की मौत का गम भूल नहीं पाई है। उससे ज्यादा उसे यह बात खाए जा रही है कि उसे यकीन है कि अपराधी विजय सालगांवकर उसके सामने खड़ा है, लेकिन सबूतों के अभाव में वह कुछ नहीं कर पा रही। गम अब बदले में बदल चुका है।
 
एसपी राजवीर सिंह तोमर को केस दोबारा खोलने की जिम्मेदारी मिलती है। पेचीदा मामलों में दिलचस्पी रखने वाला तोमर विजय के परिवार के पीछे पड़ता है और पुराने घटनाक्रम को नए नजरिए से देखता है। उसे कुछ ऐसी कमियां मिलती हैं, जो विजय के लिए परेशानी खड़ी कर सकती हैं।
 
यहां फिल्म का सस्पेंस साफ है, अपराधी कौन है, यह रहस्य नहीं। सवाल सिर्फ इतना है कि इस बार विजय पुलिस से कितने कदम आगे है।
 
तोमर को फिल्म ने काफी प्रभावी तरीके से स्थापित किया है। वह अपना काम गंभीरता से करता है, लेकिन प्रस्तुति ऐसी है कि दर्शक उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है।
 
विजय की बड़ी बेटी की शादी की बात चल रही है। लड़के वाले घर आए हैं और इसी दौरान तोमर पहुंच जाता है। एक अधिकारी के तौर पर वह अपना काम कर रहा है, लेकिन परिवार के लिए वह पल किसी दुश्मन के हमले से कम नहीं। यहीं फिल्म दर्शक की भावनाओं के साथ खेलती है। कानून की नजर में तोमर सही है, लेकिन दृश्यम की दुनिया में सही होना और पसंद किया जाना दो अलग बातें हैं।
 
तोमर विजय के लिए खतरा जरूर बनता है, लेकिन इंटरवल के बाद कहानी में एक और बड़ा खिलाड़ी उतरता है। इंद्रजीत शेट्टी की एंट्री के साथ फिल्म कोर्टरूम ड्रामा में बदल जाती है। प्रकाश राज का किरदार ऐसा वकील है जो केस जीतने के लिए हर कानूनी हथियार का इस्तेमाल करता है।
 
तोमर जांच से जो कमियां निकालता है, शेट्टी उन्हें अदालत में हथियार बना देता है। पुराने पुलिस अधिकारी गायतोंडे भी विजय के खिलाफ खड़ा है। कुछ देर के लिए लगता है कि इस बार विजय की बनाई पूरी इमारत ढह सकती है। लेकिन यहीं दृश्यम अपनी असली चाल चलती है।
 
फिल्म धीरे-धीरे विजय की तरफ लौटती है और उन परतों को खोलती है, जिनके पीछे उसकी प्लानिंग छिपी है। कोर्टरूम सीक्वेंस में यह दिखाने की कोशिश अच्छी है कि एक घटना के पीछे कितनी तैयारी और कितनी सोच काम कर सकती है।
 
हालांकि यहां फिल्म की एक कमजोरी भी सामने आती है। इतने बड़े टकराव के बावजूद रोमांचक और थ्रिलिंग क्षण उम्मीद से कम हैं। कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे हैं और कई जगह कहानी उस तेजी से आगे नहीं बढ़ती, जिसकी उम्मीद इस फ्रेंचाइजी से की जाती है।
 
राजवीर सिंह तोमर का किरदार जिस मजबूती से तैयार किया गया है, उसका पूरा फायदा फिल्म बाद में नहीं उठा पाती। शुरुआत में वह विजय के लिए सबसे बड़ा खतरा दिखाई देता है, लेकिन आगे चलकर उसका प्रभाव कम हो जाता है।
 
विजय भी ज्यादातर समय खामोश रहता है। यह उसके किरदार की पहचान है, लेकिन कुछ जगह यही खामोशी कहानी की रफ्तार को धीमा करती है।
 
निर्देशक अभिषेक पाठक की उपलब्धि यह है कि वह इन कमियों को प्रस्तुति से काफी हद तक ढक देते हैं। जटिल घटनाओं को वह सहज तरीके से रखते हैं और विजय की प्लानिंग को जरूरत से ज्यादा उलझाते नहीं हैं। दृश्यम में रोमांच यह नहीं कि आगे क्या होगा; रोमांच यह है कि विजय ने उसके लिए पहले से क्या सोच रखा है।
 
अजय देवगन विजय सालगांवकर के किरदार को पूरी तरह पकड़ चुके हैं। उनका अभिनय शोर नहीं करता। कम संवाद, नियंत्रित भाव और चेहरे पर हमेशा कुछ छिपाए रखने की कोशिश, विजय के चरित्र की यही बारीकियां अजय के अभिनय में दिखाई देती हैं।
 
श्रिया सरन को ज्यादा अवसर नहीं मिला। तब्बू और रजत कपूर भी सीमित दायरे में हैं। प्रकाश राज कोर्टरूम वाले हिस्से में अपना असर छोड़ते हैं।
 
लेकिन फिल्म का सबसे प्रभावशाली अभिनय जयदीप अहलावत का है। राजवीर सिंह तोमर के किरदार में वह सिर्फ संवाद नहीं बोलते, बल्कि अपनी बॉडी लैंग्वेज और हावभाव से पुलिस अधिकारी की बेचैनी और जिद दोनों सामने रखते हैं। अजय देवगन जहां चुप रहकर खेल खेलते हैं, जयदीप अहलावत उस खेल को लगातार चुनौती देते हैं।
 
सुधीर के. चौधरी की सिनेमाटोग्राफी फिल्म के तनावपूर्ण माहौल को मजबूती देती है। अमर मोहिले का बैकग्राउंड म्यूजिक जरूरी जगहों पर प्रभाव पैदा करता है। संदीप फ्रांसिस की एडिटिंग साफ है और जटिल घटनाक्रम को समझने में दिक्कत नहीं होने देती।
 
दृश्यम द कन्क्लूजन में अपनी पिछली फिल्मों जैसा लगातार धड़कता रोमांच नहीं है। कुछ हिस्से लंबे हैं और कुछ मजबूत किरदारों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया। लेकिन कहानी की पकड़, कलाकारों का प्रदर्शन और अभिषेक पाठक का प्रस्तुतीकरण फिल्म को संभाल लेते हैं।
 
सबसे बड़ी बात, यह फिल्म उस मूल सवाल को नहीं छोड़ती जिसने दृश्यम को खास बनाया कि परिवार को बचाने के लिए एक आदमी कानून से कितनी दूर जा सकता है?
 
विजय के सामने इस बार पुलिस भी है, वकील भी और उसकी अपनी पुरानी गलतियां भी। फिर भी वह खामोश है। क्योंकि दृश्यम में असली सवाल यह नहीं होता कि अपराध किसने किया। सवाल यह होता है कि कहानी किसने लिखी।
 
  • DRISHYAM: THE CONCLUSION (2026)
  • निर्देशक: अभिषेक पाठक
  • गीतकार: मनोज मुंत‍शिर, आमिल कीयान खान, कर्मा
  • संगीतकार: रवि बसरुर, कर्मा, रोचक कोहली 
  • कलाकार: अजय देवगन, श्रिया सरन, तब्बू, जयदीप अहलावत, प्रकाश राज, रजत कपूर, इशिता दत्ता, मृणाल जाधव, कमलेश सावंत 
  • सेंसर सर्टिफिकेट: यूए (16 प्लस) * 2 घंटे 30 मिनट 
  • रेटिंग : 3.5/5 
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें
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