कायदे से धुरंधर मूवी का असली रिव्यू अब जाकर पूरा होता है, क्योंकि पहले भाग में कहानी अधूरी छोड़ी गई थी, एक ऐसा अधूरापन जो दर्शकों को बेचैन करता रहा। धुरंधर: द रिवेंज उसी अधूरे वादे का जवाब है और सिर्फ जवाब ही नहीं, बल्कि एक ऐसा सिनेमाई विस्फोट भी है जो दर्शक को शुरुआत से अंत तक अपनी गिरफ्त में ले लेता है। दोनों भागों को मिलाकर करीब साढ़े सात घंटे की यह फिल्म किसी बिंज वॉच थ्रिलर जैसी लगती है। एक बार शुरू करो तो खत्म किए बिना चैन नहीं आता।
धुरंधर की ऐतिहासिक सफलता के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या दूसरा भाग वही जादू दोहरा पाएगा? पहले भाग में दर्शक कहानी और किरदारों से परिचित हो रहे थे, जबकि दूसरे भाग में उसी सफर को आगे बढ़ाना था और यहां जोखिम ज्यादा था। लेकिन निर्देशक आदित्य धर इस चुनौती को बखूबी समझते हैं और बहुत ही होशियारी से फिल्म की शुरुआत उस हिस्से से करते हैं, जिसे पहले भाग में जानबूझकर अधूरा रखा गया था।
फिल्म का शुरुआती हिस्सा जसकीरत सिंह रांगी के अतीत को सामने लाता है, वही जसकीरत, जो आगे चलकर हमज़ा अली मज़ारी बनता है। यह ट्रांजिशन सिर्फ एक नाम बदलने की कहानी नहीं, बल्कि एक इंसान के भीतर टूटने, बिखरने और फिर एक खतरनाक रूप में ढलने की प्रक्रिया है। जसकीरत और उसके परिवार के साथ जो ज्यादती होती है वो दर्शकों को झकझोर देती है। खासकर वह सीन, जहां जसकीरत अपनी बंधक बहन को छुड़ाने जाता है और उसका सामना उससे होता है, बिना संवाद का यह दृश्य दर्शकों को भीतर तक हिला देता है। यहां सन्नाटा भी चीखता हुआ महसूस होता है।
इसके बाद फिल्म सीधे लियारी की जमीन पर उतरती है, जहां कहानी अपने असली रंग में आती है। यहां हमज़ा को मेजर इकबाल, चौधरी असलम, खनानी ब्रदर्स जैसे किरदारों से हिसाब चुकता करना है और साथ ही उन ताकतों से भी, जो भारत के खिलाफ साजिशों में शामिल हैं या थे। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, उसकी रफ्तार तेज होती जाती है, इतनी तेज कि दर्शक को सांस लेने का भी मौका नहीं मिलता।
हमज़ा का किरदार धीरे-धीरे एक तूफान में बदलता है। वह लियारी का किंग बनता है, सत्ता के गलियारों में अपनी जगह बनाता है और हर चुनौती का सामना अपनी चालाकी और क्रूरता के मिश्रण से करता है। कई बार वह शक के दायरे में भी आता है, उसकी सफलता दूसरों को खटकती है, उसके राज खुलने लगते हैं, लेकिन हर बार वह हालात को अपने पक्ष में मोड़ लेता है। यही उसका असली खेल है।
फिल्म का स्क्रीनप्ले इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरता है। यह इतना विस्तृत है कि कई बड़े सामाजिक और राजनीतिक घटनाक्रम इसमें शामिल हो जाते हैं। नोटबंदी, पंजाब की ड्रग समस्या और यहां तक कि अतीफ अहमद जैसे मामलों के पीछे की परतों को भी छूने की कोशिश की गई है। नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद हमज़ा को मिले “फ्रीहैंड” को जिस तरह कहानी में बुना गया है, वह इसे एक अलग ही आयाम देता है। हमज़ा धीरे-धीरे उन आतंकियों का खात्मा कर देता है जो भारत विरोधी घटनाओं में शामिल थे।
इतने फैलाव के बावजूद फिल्म कहीं भी बिखरती नहीं। हर सीन कुछ कहता है, हर किरदार कुछ जोड़ता है और हर घटना कहानी को आगे बढ़ाती है। यह दुर्लभ संतुलन ही फिल्म को खास बनाता है।
फिल्म में कई ऐसे सीक्वेंस हैं जो लंबे समय तक याद रहते हैं, जैसे हमज़ा का उज़ैर को साइडलाइन करने के लिए जाल बुनना, चौधरी असलम को ठिकाने लगाना, यालिना के सामने उसका राज खुलना और पंजाब के पुराने साथी से उसका आमना-सामना होना। ये सारे सीन न सिर्फ रोमांच पैदा करते हैं, बल्कि दर्शकों के भीतर एक बेचैनी भी बनाए रखते हैं कि आगे क्या होगा।
क्लाइमैक्स फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज पैकेज है। कई बार ऐसा लगता है कि अब कहानी खत्म हो गई, लेकिन हर बार एक नया ट्विस्ट सामने आता है। यह लगातार चौंकाने की रणनीति फिल्म को एक अलग स्तर पर ले जाती है।
निर्देशक आदित्य धर का टोन इस बार पहले से ज्यादा तीखा नजर आता है। फिल्म में पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामकता साफ झलकती है, हालांकि हीरो खुद यह कहता है कि उसकी लड़ाई किसी देश से नहीं, बल्कि आतंकवाद से है। फिल्म का टोन इस बार ज्यादा हिंसक भी है। कई दृश्य इतने रॉ हैं कि दर्शक नजरें फेरने पर मजबूर हो सकते हैं। लेकिन इन दृश्यों के पीछे ठोस कारण भी दिए गए हैं, जिससे वे सिर्फ दिखावे के लिए नहीं लगते।
बतौर निर्देशक आदित्य धर ने फिल्म को एक लार्जर देन लाइफ अनुभव में बदल दिया है। बिना संवाद वाले दृश्यों में पुराने हिट गानों का इस्तेमाल, स्लो-मोशन शॉट्स और शानदार विजुअल ट्रीटमेंट, ये सब मिलकर फिल्म को एक अलग ही ऊंचाई देते हैं। एक्शन और ड्रामा के बीच संतुलन उनकी सबसे बड़ी सफलता है।
आदित्य ने कई हिट फिल्मों से प्रेरणा लेकर फिल्म लिखी और निर्देशित की है जिसे समझदार दर्शक पकड़ लेते हैं, लेकिन उन्होंने चिर-परिचित मसालों को मिलाकर इतने बढ़िया तरीके से परोसा है कि स्वाद के आगे दर्शक सब बातों को भूला देते हैं। बतौर निर्देशक आदित्य ने ड्रामे को बहुत मजबूती और त्रीवता के साथ पेश किया है।
तकनीक के मामले में वे उस्ताद हैं और उनका शॉट कम्पोजिशन जबरदस्त है। फिल्म के हीरो को उन्होंने कम संवाद दिए हैं और उसकी खामोशी को जबरदस्त तरीके से उभारा है। उसका एंग्रीयंग मैन रूप और लावे जैसी उबलती भावनाओं को बिना संवादों के उन्होंने बेहतरीन तरीके से दर्शाया है। पहले पार्ट की तुलना में दूसरे पार्ट में सिनेमैटिक लिबर्टी का ज्यादा इस्तेमाल हुआ है, लेकिन फिल्म इतनी तेज गति से भागती है कि दर्शक इन बातों की ओर ध्यान नहीं देते। कलाकारों से लेकर तकनीशियनों तक से उन्होंने अच्छा काम लिया है। आज के दौर में जहां दर्शकों को दस सेकंड तक के लिए भी बांधा नहीं जा सकता वहां चार घंटे तक उन्हें बिठाए रखना ही उनकी सफलता की कहानी कहती है।
रणवीर सिंह ने बाजीराव मस्तानी, 83, गोलियों की रासलीला, पद्मावत जैसी फिल्मों में अभिनय के जौहर दिखाए हैं, लेकिन उनका यह एक्शन अवतार पहली बार देखने को मिला है। कम संवादों के जरिए अभिनय करना आसान नहीं होता, लेकिन उन्होंने अपनी आंखों, चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज से इसे जीवंत बना दिया है। उनका एंग्री यंग मैन अवतार और भीतर सुलगता गुस्सा हर फ्रेम में महसूस होता है। हालांकि कुछ जगह लगता है कि उन्हें और संवाद दिए जाते तो असर और गहरा हो सकता था, खासतौर पर क्लाइमैक्स में।
संजय दत्त एक दमदार विलेन के रूप में अपनी छाप छोड़ते हैं, जबकि अर्जुन रामपाल इस बार ज्यादा खतरनाक और प्रभावी नजर आते हैं। आर माधवन अपने सीमित सीन में भी तालियां बटोर लेते हैं। बाकी कलाकार भी छोटी-छोटी भूमिकाओं में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।
राकेश बेदी के हिस्से में इस बार कम फुटेज आए हैं, लेकिन जब भी वे स्क्रीन पर आते हैं दर्शकों में मुस्कराहट फैल जाती है और अंत में वे चौंका देते हैं। सारा अर्जुन को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए कुछ सीन मिले हैं जिसमें वे असर छोड़ने में कामयाब रही हैं।
फिल्म का एक्शन और बैकग्राउंड स्कोर इसके बड़े प्लस पॉइंट हैं। एक्शन सीक्वेंस बेहद रॉ और इंटेंस हैं, जिनमें खून-खराबा भरपूर है। शाश्वत सचदेव का बैकग्राउंड म्यूजिक हर सीन की तीव्रता को बढ़ा देता है, जबकि पुराने हिट गानों का इस्तेमाल फिल्म को एक खास स्टाइल देता है। त्रिदेव, थानेदार से लेकर बोनी एम तक के गाने सुनने को मिलते हैं। आरी आरी, मैं और तू उम्दा बन पड़े हैं।
विकास नौलखा की सिनेमाटोग्राफी फिल्म को विजुअली शानदार बनाती है। एक्स्ट्रीम क्लोजअप और नए एंगल्स का इस्तेमाल फिल्म को एक अलग पहचान देता है। एडिटिंग इतनी चुस्त है कि चार घंटे की लंबाई भी भारी नहीं लगती, यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।
फिल्म में कुछ कमजोरियां भी हैं, हिंसा का स्तर कई दर्शकों को असहज कर सकता है और कुछ जगह सिनेमैटिक लिबर्टी ज्यादा महसूस होती है। लेकिन फिल्म की तेज रफ्तार और एंगेजिंग नैरेटिव इन कमियों को ज्यादा देर टिकने नहीं देते।
देशप्रेम, जासूसी, रॉ एक्शन, वास्तविक घटनाओं के संकेत और एक काल्पनिक लेकिन दमदार किरदार इन सबका कॉम्बिनेशन धुरंधर: द रिवेंज को एक ऐसा सिनेमाई अनुभव बनाता है, जो लंबे समय तक याद रहता है। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक इंटेंस सिनेमाई सफर है।
-
DHURANDHAR: THE REVENGE (2026)
-
निर्देशक: आदित्य धर
-
गीत: इरशाद कामिल, बॉम्बे रॉकर्स, रेबल, टोकन, जस्मिन सैंडल्स, नुसरत फतेह अली खान, सतिंदर सरताज
-
संगीत: शाश्वत सचदेव
-
कलाकार: रणवीर सिंह, सारा अर्जुन, अर्जुन रामपाल, संजय दत्त, आर माधवन, राकेश बेदी, मानव गोहिल, गौरव गेरा, दानिश पेंडोर, राज जुत्शी, यामी गौतम (मेहमान कलाकार)
-
सेंसर सर्टिफिकट : A (केवल वयस्कों के लिए) * 3 घंटे 49 मिनट 6 सेकंड
-
रेटिंग : 4/5