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कॉकटेल 2 मूवी रिव्यू: खूबसूरत पैकेजिंग में परोसा गया कमजोर रोमांस
वर्ष 2012 में आई कॉकटेल ने दोस्ती, प्यार और कमिटमेंट के बीच फंसे युवाओं की कहानी दिखाने की कोशिश की थी। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, लेकिन उसकी स्क्रिप्ट को लेकर कई सवाल उठे थे। अब 14 साल बाद निर्देशक होमी अडजानिया उसी दुनिया में लौटे हैं। कॉकटेल 2 भी उन्हीं भावनाओं, उन्हीं रिश्तों और उन्हीं उलझनों का नया संस्करण बनकर सामने आती है, लेकिन कहानी की कमियां पहले भाग जैसी ही हैं।
फिल्म की कहानी कुणाल (शाहिद कपूर) और दिया (रश्मिका मंदाना) के रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में हैं, लेकिन शादी के बंधन में बंधने को लेकर सहज नहीं हैं। छुट्टियां बिताने के लिए दोनों इटली पहुंचते हैं, जहां उनकी मुलाकात दिया की दोस्त एली (कृति सेनन) से होती है। यहीं से कहानी एक ऐसे प्रेम त्रिकोण की ओर बढ़ती है, जिसे दर्शकों ने हिंदी सिनेमा में पहले भी कई बार देखा है।
समस्या कहानी के विचार में नहीं, बल्कि उसके प्रस्तुतीकरण में है। दिया अपने प्यार की परीक्षा लेने के लिए एली से कहती है कि वह कुणाल को आकर्षित करने की कोशिश करे। यहीं से फिल्म की विश्वसनीयता डगमगाने लगती है। सवाल उठता है कि अगर दिया को अपने रिश्ते पर भरोसा है तो उसे इस तरह के नाटक की जरूरत क्यों पड़ती है? और अगर भरोसा नहीं है तो वह इतने लंबे समय से इस रिश्ते में क्यों है?
फिल्म आगे बढ़ती है और एली सचमुच कुणाल से प्यार करने लगती है। लेकिन दर्शकों को यह कभी समझ नहीं आता कि आखिर कुणाल एली की ओर आकर्षित क्यों हो रहा है। न तो कोई मजबूत परिस्थिति दिखाई गई है और न ही ऐसा भावनात्मक विकास, जो इस बदलाव को स्वाभाविक बनाए। यही वजह है कि कहानी के बड़े मोड़ भी असर पैदा नहीं कर पाते।
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि फिल्म अपने ही बनाए नियमों पर कायम नहीं रहती। जब एली, कुणाल और दिया के बीच खड़ी हो जाती है तो दिया का व्यवहार कई बार अविश्वसनीय लगता है। वह एली को अपने जीवन में बने रहने क्यों देती है? वह कुणाल से स्पष्ट बातचीत क्यों नहीं करती? ऐसे कई सवाल फिल्म के दौरान लगातार दर्शकों के मन में घूमते रहते हैं। दुर्भाग्य से इनके जवाब फिल्म के पास नहीं हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी विजुअल अपील है। हर फ्रेम किसी फैशन मैगजीन के कवर की तरह सजाया गया है। इटली की खूबसूरत लोकेशन, रंग-बिरंगे कॉस्ट्यूम, स्टाइलिश कैरेक्टर और शानदार प्रोडक्शन डिजाइन आंखों को लगातार आकर्षित करते हैं। संथाना कृष्णन रविचंद्रन की सिनेमाटोग्राफी फिल्म को बेहद खूबसूरत बनाती है। कई दृश्य ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ उनकी विजुअल क्वालिटी के लिए याद रखा जा सकता है।
लेकिन अच्छी दिखने वाली फिल्म और अच्छी फिल्म होने में फर्क होता है। कॉकटेल 2 इस फर्क को बार-बार साबित करती है।
लव रंजन द्वारा लिखी गई कहानी में कोई नया आयाम नहीं है। प्रेम त्रिकोण पर बनी दर्जनों फिल्मों की याद यहां आती है। कुछ संवाद जरूर असर छोड़ते हैं और कुछ रोमांटिक दृश्य भी अच्छे बन पड़े हैं, लेकिन वे पूरी फिल्म को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। किरदारों की भावनाएं कागज पर जितनी गहरी दिखाई देती हैं, पर्दे पर उतनी महसूस नहीं होतीं।
निर्देशक होमी अडजानिया रोमांस और भावनाओं का वह जादू नहीं रच पाए हैं, जिसकी उनसे उम्मीद थी। फिल्म का पहला हाफ हल्का-फुल्का और रोमांटिक है, लेकिन मनोरंजक नहीं बन पाता। वहीं दूसरा हाफ जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाता है। कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे किसी हाई-वोल्टेज टीवी फैमिली ड्रामा से उठाकर फिल्म में रख दिए गए हों। खासतौर पर वह दृश्य, जिसमें हैंगओवर से जूझ रहे कुणाल को लेकर दिया और एली आमने-सामने होती हैं, फिल्म को अनजाने में हास्यास्पद बना देता है।
अभिनय की बात करें तो शाहिद कपूर निराश करते हैं। उनके किरदार में भावनात्मक गहराई की कमी तो है ही, साथ ही कई जगह उनका अभिनय जरूरत से ज्यादा नाटकीय महसूस होता है। क्लाइमैक्स को छोड़ दें तो वे अपने किरदार के संघर्ष को प्रभावी ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते।
रश्मिका मंदाना का स्क्रीन प्रेजेंस आकर्षक है, लेकिन हिंदी उच्चारण की समस्या कई महत्वपूर्ण संवादों का असर कम कर देती है। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि उनके किरदार को पर्याप्त विस्तार नहीं दिया गया। दिया कहानी का केंद्र होने के बावजूद कई बार अधूरी और अस्पष्ट लगती है।
फिल्म की असली विजेता कृति सेनन हैं। एली के किरदार में सबसे ज्यादा परतें हैं और कृति ने उन्हें पूरी ऊर्जा के साथ निभाया है। कभी आत्मविश्वासी, कभी भावुक, कभी स्वार्थी और कभी असुरक्षित, उन्होंने अपने किरदार के हर रंग को खुलकर जिया है। कई मौकों पर वे शाहिद और रश्मिका दोनों पर भारी पड़ती हैं। फिल्म खत्म होने के बाद अगर कोई किरदार सबसे ज्यादा याद रहता है तो वह एली ही है।
प्रीतम का संगीत सुनने में अच्छा है, लेकिन कॉकटेल के गानों जैसी यादगार छाप नहीं छोड़ता। कुछ ट्रैक कहानी को गति देते हैं, मगर कोई भी गीत ऐसा नहीं है जो फिल्म की पहचान बन सके। हालांकि क्लाइमैक्स के कुछ संवाद प्रभावशाली हैं और फिल्म को थोड़ा भावनात्मक वजन देते हैं।
कॉकटेल 2 एक ऐसी फिल्म है जो देखने में बेहद खूबसूरत है, लेकिन महसूस करने में बेहद खाली। इसके पास शानदार लोकेशन हैं, ग्लैमरस सितारे हैं, खूबसूरत फ्रेम हैं, अच्छे संवादों की झलक भी है, लेकिन एक मजबूत कहानी नहीं है। और जब प्रेम कहानी में भावनाओं की सच्चाई ही गायब हो जाए, तब रोमांस सिर्फ सजावट बनकर रह जाता है।
यह कॉकटेल दिखने में जितना रंगीन है, स्वाद में उतना ही फीका। फिल्म का नशा चढ़ने से पहले ही उतर जाता है और दर्शक थिएटर से बाहर निकलते समय सिर्फ यही सोचते रह जाते हैं कि इतनी खूबसूरत फिल्म के पास आखिर एक बेहतर कहानी क्यों नहीं थी।
- COCKTAIL 2 (2026)
- निर्देशक: होमी अडजानिया
- गीतकार: अमिताभ भट्टाचार्य
- संगीतकार: प्रीतम
- कलाकार: शाहिद कपूर, कृति सेनन, रश्मिका मंदाना
- निर्माता: दिनेश विजन, लव रंजन, प्रमिता आर विजन, अंकुर गर्ग
- केवल वयस्कों के लिए * 2 घंटे 29 मिनट 19 सेकंड
- रेटिंग : 2/5
