चांद मेरा दिल रिव्यू: प्यार की मिठास से ज्यादा रिश्तों की कड़वी सच्चाई
चांद मेरा दिल शुरुआत में खुद को एक इंटेंस लव स्टोरी की तरह पेश करती है। फिल्म के ट्रेलर, पोस्टर और प्रचार देखकर यही लगता है कि यह दो प्रेमियों की गहरी और जुनूनी मोहब्बत की कहानी होगी। लेकिन फिल्म मुश्किल से आधे घंटे बाद ही उस ट्रैक से हट जाती है और एक बिल्कुल अलग दिशा पकड़ लेती है। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत भी है और सबसे बड़ा जोखिम भी।
असल में चांद मेरा दिल प्यार से ज्यादा रिश्तों की अपरिपक्वता पर बात करती है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जिसे प्यार करने की जल्दी है, लेकिन रिश्ते निभाने का धैर्य नहीं। फिल्म सवाल उठाती है कि क्या आज की जनरेशन प्यार को सिर्फ एक इमोशनल मोमेंट समझती है? क्या रिश्तों में समझौता, धैर्य और जिम्मेदारी अब पुराने शब्द बन चुके हैं?
फिल्म की कहानी अराव (लक्ष्य) और चांदनी (अनन्या पांडे) के इर्द-गिर्द घूमती है। हैदराबाद के कॉलेज में पढ़ते-पढ़ते दोनों प्यार में पड़ जाते हैं। रिश्ता तेजी से आगे बढ़ता है और चांदनी प्रेग्नेंट हो जाती है। वह अबॉर्शन के लिए तैयार नहीं होती। परिवार दोनों का साथ छोड़ देता है और 21 साल की उम्र में दोनों शादी कर लेते हैं। यहीं से फिल्म का असली संघर्ष शुरू होता है।
कम उम्र में शादी, बच्चा, पढ़ाई, नौकरी और घर खर्च जैसी जिम्मेदारियां दोनों को धीरे-धीरे भीतर से तोड़ने लगती हैं। फिल्म बहुत ईमानदारी से दिखाती है कि रोमांस के बाद असली जिंदगी कितनी कठिन हो सकती है। प्यार में कही गई बड़ी-बड़ी बातें जब किराए, बिल और करियर के दबाव के सामने आती हैं, तब रिश्तों की असली परीक्षा शुरू होती है।
फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा यही है कि यह यंग पैरेंट्स की परेशानियों को सिर्फ सतही तरीके से नहीं दिखाती, बल्कि उनके मानसिक दबाव को महसूस करवाती है। अराव का फ्रस्टेशन, उसकी बेचैनी और जिम्मेदारियों के नीचे दबता आत्मविश्वास कई जगह वास्तविक लगता है। वहीं चांदनी का भावनात्मक टूटना भी कहानी को संवेदनशील बनाता है।
हालांकि फिल्म का लेखन यहां थोड़ी लड़खड़ाहट दिखाता है। अराव और चांदनी की लव स्टोरी को बहुत जल्दी निपटा दिया गया है। दर्शक जब तक उनके प्यार में पूरी तरह डूबें, फिल्म सीधे संघर्ष और अलगाव की तरफ बढ़ जाती है। अगर शुरुआती रोमांस को थोड़ा और समय दिया जाता तो बाद की जुदाई ज्यादा गहराई से असर करती।
सबसे ज्यादा खटकने वाली बात चांदनी का तलाक लेने वाला फैसला बनता है। माना कि अराव गुस्से और दबाव में सीमाएं पार करता है, गलत बातें कहता है और थोड़ा फिजिकल भी हो जाता है, लेकिन फिल्म उस मोड़ को पूरी तरह भावनात्मक वजन नहीं दे पाती। दर्शक कई जगह सोचते रह जाते हैं कि क्या अराव की गलती इतनी बड़ी थी कि रिश्ता खत्म कर दिया जाए? यहां लेखक विवेक सोनी और स्क्रीनप्ले राइटर तुषार परांजपे को उस संघर्ष को और गहराई से लिखना चाहिए था।
इसी तरह क्लाइमैक्स भी थोड़ा ज्यादा प्रभावी हो सकता था। फिल्म जिस भावनात्मक ऊंचाई तक पहुंचने की कोशिश करती है, वहां अंत पूरी तरह वैसा असर नहीं छोड़ पाता जिसकी उम्मीद बन चुकी होती है।
लेकिन लेखन की इन कमियों के बावजूद चांद मेरा दिल दर्शकों को बांधे रखती है और इसका सबसे बड़ा श्रेय निर्देशक विवेक सोनी को जाता है। मीनाक्षी सुंदरेश्वर और आप जैसा कोई जैसी फिल्मों से अपनी संवेदनशील समझ दिखा चुके विवेक यहां भी रिश्तों के भावनात्मक उतार-चढ़ाव को महसूस करवाने में सफल रहते हैं।
बतौर निर्देशक उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे सिर्फ कहानी नहीं सुनाते, एक एहसास पैदा करते हैं। फिल्म के कई दृश्य बेहद खूबसूरती से फिल्माए गए हैं। खासकर कॉलेज लाइफ, युवा शादीशुदा जोड़े की असहजता, कम उम्र का बचपना और धीरे-धीरे आती मैच्योरिटी को उन्होंने बहुत बारीकी से पकड़ा है। हैदराबाद को भी फिल्म में बेहद खूबसूरत तरीके से इस्तेमाल किया गया है। शहर सिर्फ बैकड्रॉप नहीं लगता, बल्कि कहानी का हिस्सा महसूस होता है।
फिल्म का संगीत इसकी आत्मा बनकर उभरता है। अमिताभ भट्टाचार्य के गीत और सचिन-जिगर का संगीत कई जगह संवादों से ज्यादा असर छोड़ता है। गानों के बोल सिर्फ सुनाई नहीं देते, किरदारों की भावनाओं का विस्तार लगते हैं। बैकग्राउंड स्कोर भी लगातार कहानी के भावनात्मक तापमान को बनाए रखता है।
संवाद भी फिल्म की बड़ी ताकत हैं। “मोहब्बत की ताकत मोमेंट्स में नहीं बल्कि सफर में है” जैसे डायलॉग लंबे समय तक याद रहते हैं और फिल्म के मूल भाव को सामने लाते हैं।
अभिनय की बात करें तो लक्ष्य ने अपने करियर के शुरुआती दौर में बेहद चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया है। कहीं-कहीं अनुभव की कमी जरूर नजर आती है, लेकिन उन्होंने अराव के संघर्ष, गुस्से और टूटन को ईमानदारी से निभाया है। यह रोल आसान नहीं था और लक्ष्य इसमें काफी हद तक सफल रहते हैं।
अनन्या पांडे भी इस बार सिर्फ ग्लैमरस मौजूदगी तक सीमित नहीं रहतीं। भावनात्मक दृश्यों में उन्होंने अच्छा काम किया है और कई जगह चुप्पी के जरिए भी अपने किरदार की पीड़ा महसूस करवाई है। दोनों कलाकारों की केमिस्ट्री फिल्म को विश्वसनीय बनाती है।
तकनीकी रूप से भी फिल्म मजबूत है। सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड स्कोर और एडिटिंग मिलकर फिल्म को एक स्मूद फ्लो देते हैं।
कुल मिलाकर चांद मेरा दिल परफेक्ट फिल्म नहीं है। इसका लेखन कई जगह कमजोर पड़ता है और कुछ भावनात्मक फैसले पूरी तरह विश्वसनीय नहीं लगते। लेकिन इसके बावजूद यह फिल्म रिश्तों के दर्द, प्यार की अधूरी समझ और कम उम्र की जिम्मेदारियों को जिस संवेदनशीलता से दिखाती है, वह इसे देखने लायक बनाता है। विवेक सोनी का निर्देशन, संगीत और कलाकारों का अभिनय फिल्म को भावनात्मक रूप से जोड़े रखता है। यह ऐसी फिल्म है जो खत्म होने के बाद भी रिश्तों और प्यार को लेकर कुछ सवाल मन में छोड़ जाती है।