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Alpha Review: फर्स्ट हाफ में ताबड़तोड़ ट्विस्ट, सेकंड हाफ में बिखरती कहानी... आलिया भट्ट की फिल्म कितनी दमदार है?
वाईआरएफ स्पाई यूनिवर्स में अब तक टाइगर, कबीर और पठान जैसे जासूसों का दबदबा रहा है। अब इसी दुनिया में दुर्गा और सीता के रूप में दो महिला किरदारों की एंट्री होती है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या इस कहानी को स्पाई यूनिवर्स का हिस्सा बनाना जरूरी था? फिल्म देखने के बाद जवाब मिलता है, शायद नहीं। 'ऐल्फा' अपने दम पर भी एक अलग और प्रभावी एक्शन थ्रिलर बन सकती थी। स्पाई यूनिवर्स से इसका जुड़ाव कहानी में कोई ऐसा अतिरिक्त रोमांच नहीं जोड़ता, जिसके बिना फिल्म अधूरी लगती।
फिल्म का सबसे दिलचस्प विचार इसके नाम में छिपा है। ग्रीक भाषा के पहले अल्फाबेट 'ऐल्फा' का इस्तेमाल यहां एक ऐसे सीरम के लिए किया गया है, जिसे शरीर में इंजेक्ट करते ही इंसान की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। उसके रिफ्लेक्स बाज से भी तेज हो जाते हैं, वह असाधारण ताकत हासिल कर लेता है और माइनस 30 डिग्री तापमान में भी दौड़ सकता है। उदय चोपड़ा ने इसी वैज्ञानिक कल्पना के इर्द-गिर्द कहानी बुनी है।
लेकिन यह कहानी पूरी तरह नई भी नहीं लगती। इसमें पुराने दौर की फिल्मों का खोया-पाया वाला फॉर्मूला भी है और आधुनिक देशभक्ति फिल्मों की तमाम परिचित परतें भी। फर्क सिर्फ इतना है कि इन्हें इतनी तेज रफ्तार में पेश किया गया है कि दर्शकों को सोचने का ज्यादा समय ही नहीं मिलता।
निर्देशक शिव रवैल फिल्म के पहले हाफ को जिस गति से आगे बढ़ाते हैं, वह इसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। एक शानदार एक्शन सीक्वेंस खत्म होता है तो दूसरा शुरू हो जाता है। बीच-बीच में लगातार ट्विस्ट आते रहते हैं। आलिया भट्ट का पहला एक्शन सीन प्रभाव छोड़ता है। बॉबी देओल की एंट्री रोमांच बढ़ाती है। ऐल्फा सीरम के पीछे का रहस्य दिलचस्प लगता है। फिर अचानक आलिया के किरदार के अतीत के दरवाजे खुलते हैं और उसका लगभग इमोशनलेस व्यक्तित्व कहानी में नई दिलचस्पी पैदा करता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इंटरवल से पहले लेखक दर्शकों को लगातार चौंकाते हैं। कई ऐसे राज खुलते हैं जिनके बारे में लगता है कि शायद क्लाइमैक्स तक इंतजार करना पड़ेगा, लेकिन उन्हें इंटरवल से पहले ही सामने रख दिया जाता है। यहीं से फिल्म अपनी सबसे बड़ी समस्या भी पैदा कर देती है। जब लगभग सारे बड़े रहस्य पहले ही सामने आ जाते हैं तो दर्शक सोचने लगता है कि आखिर अब क्लाइमैक्स में बचा क्या है?
दुर्भाग्य से यही आशंका सच साबित होती है।
दूसरे हाफ में कहानी धीरे-धीरे अपनी पकड़ खोने लगती है। लेखक कई घटनाओं को इतनी आसानी से घटित मान लेते हैं कि उन पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। ऐसा महसूस होता है मानो स्क्रिप्ट को समेटने की जल्दबाजी में तर्क पीछे छूट गए हों। पहले हाफ वाले चौंकाने वाले मोड़ यहां गायब हैं। ट्विस्ट कमजोर पड़ जाते हैं और क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म हांफने लगती है।
असल समस्या निर्देशन में नहीं, लेखन में है। शिव रवैल ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है कि कमजोर स्क्रिप्ट को स्टाइल, गति और शानदार प्रेजेंटेशन से संभाला जाए। कई जगह वे इसमें सफल भी होते हैं। फिल्म की रफ्तार लंबे समय तक बनी रहती है और स्क्रीन पर विजुअल एनर्जी कम नहीं होती। लेकिन जब कहानी ही कमजोर पड़ने लगे तो निर्देशक और कलाकार भी उसे पूरी तरह बचा नहीं पाते।
आलिया भट्ट इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती हैं। उन्होंने सिर्फ एक्शन नहीं किया बल्कि अपने किरदार का एटीट्यूड भी पूरी मजबूती से जिया है। जब वह कहती हैं "शेर तो सिर्फ खूंखार होने की एक्टिंग करता है, असली शिकार तो शेरनी करती है", तो यह संवाद सिर्फ सुनाई नहीं देता, उनके व्यक्तित्व में दिखाई भी देता है। एक्शन सीक्वेंस में उन्होंने जबरदस्त मेहनत की है और स्क्रीन पर पूरा आत्मविश्वास दिखता है।
हालांकि बॉबी देओल के साथ उनके कुछ फाइट सीक्वेंस इतने विश्वसनीय नहीं लगते। ताकत के अंतर को देखते हुए कई मुकाबले सिनेमाई लिबर्टी ज्यादा महसूस होते हैं।
शरवरी अपने किरदार में प्रभाव नहीं छोड़ पातीं। उनके हिस्से में ऐसा कोई दमदार पल नहीं आता जो दर्शकों के साथ लंबे समय तक रह जाए। कई जगह महसूस होता है कि इस भूमिका में ज्यादा प्रभावशाली अभिनेत्री होती तो फिल्म को और मजबूती मिल सकती थी।
बॉबी देओल ने एक बार फिर अपने अभिनय से प्रभावित किया है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस शानदार है, लेकिन जिस तरह उनके किरदार को अंत में लिखा गया है, वह निराश करता है। अनिल कपूर हमेशा की तरह अपने अनुभव का असर छोड़ते हैं। वहीं ऋतिक रोशन का कैमियो दर्शकों के लिए सरप्राइज जरूर है, लेकिन उसे कहीं ज्यादा प्रभावशाली तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता था। उनके किरदार का इस्तेमाल इसलिए किया गया है कि ऐल्फा मूवी वायआरएफ यूनिवर्स का हिस्सा लगे।
तकनीकी पक्ष फिल्म को मजबूत बनाता है। क्रेग मैक्रे और सुनील रोड्रिग्ज ने स्टाइलिश और हाई-ऑक्टेन एक्शन डिजाइन किया है। खास बात यह है कि दोनों अभिनेत्रियों से बेहतरीन स्टंट्स करवाए गए हैं। आरिफ शेख की एडिटिंग फिल्म की गति बनाए रखती है। बैकग्राउंड स्कोर हर बड़े दृश्य का प्रभाव कई गुना बढ़ा देता है। हालांकि फिल्म में गानों की मौजूदगी कई बार रफ्तार तोड़ती है। यदि इन्हें पूरी तरह हटा दिया जाता तो फिल्म और ज्यादा प्रभावशाली बन सकती थी।
'ऐल्फा' ऐसी फिल्म है जो अपने पहले हाफ में दर्शकों को सीट से बांधे रखती है, लेकिन दूसरे हाफ में वही पकड़ धीरे-धीरे ढीली पड़ जाती है। शानदार एक्शन, तेज रफ्तार निर्देशन और आलिया भट्ट का दमदार प्रदर्शन इसे देखने लायक जरूर बनाते हैं, लेकिन कमजोर क्लाइमैक्स और अविश्वसनीय लेखन इसे यादगार बनने से रोक देते हैं। सिनेमाघर से लौटते समय आपके म में यही सवाल रह जाता है कि इतनी शानदार शुरुआत के बाद आखिर फिल्म मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते क्यों बिखर गई?
- ALPHA (2026)
- निर्देशक: शिव रवैल
- गीतकार: कुमार, अन्विता दत्त, कौसर मुनीर, रोहांश एंड अबीर
- संगीतकार: रोहांश एंड अबीर
- कलाकार: आलिया भट्ट, शरवरी, अनिल कपूर, बॉबी देओल
- निर्माता: आदित्य चोपड़ा
- सेंसर सर्टिफिकेट: यूए (16 प्लस) * 2 घंटे 20 मिनट 48 सेकंड
- रेटिंग : 2.5/5
