1. मनोरंजन
  2. बॉलीवुड
  3. फिल्म समीक्षा
  4. 120 bahadur movie review rezang la war farhan akhtar

120 बहादुर रिव्यू: क्या ये फिल्म उन 120 हीरो के शौर्य के साथ न्याय कर पाई?

120 Bahadur review
भारतीय सेना की बहादुरी के किस्से वर्षों से हमारे इतिहास का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। जब-जब देश पर संकट आया है, हमारे सैनिकों ने सीमित संसाधनों, कठिन परिस्थितियों और दुश्मनों की विशाल संख्या के बावजूद पीछे हटने से इनकार किया है। इसी शौर्य और अदम्य जज्बे को सिनेमा ने समय-समय पर बड़े पर्दे पर उतारा है, ताकि नई पीढ़ी इन गाथाओं से परिचित हो सके। इसी कड़ी में ‘120 बहादुर’ एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जो रेजांग ला के अमर युद्ध को फिर से जीवंत करने की कोशिश करता है।
 
फिल्म की कहानी छ: जीवित बचे सैनिकों में से एक की यादों के माध्यम से आगे बढ़ती है, जो रेजांग ला की इस ऐतिहासिक लड़ाई में जीवित लौट पाए थे। यह फिल्म मेजर शैतान सिंह भाटी और 120 अहीर जवानों के साहस का सिनेमाई चित्रण करती है, जिन्होंने पोस्ट खाली करने से सख्त मना कर दिया था और ‘आखिरी गोली, आखिरी सिपाही’ तक डटे रहने का फैसला किया था।
 
18 नवंबर 1962… लद्दाख के रेजांग ला में समुद्र तल से 18,000 फीट की ऊंचाई पर, 120 भारतीय सैनिकों ने लगभग 3,000 चीनी सैनिकों के लगातार हमलों का सामना किया। यह लड़ाई भारतीय सेना के इतिहास की सबसे साहसी टक्करों में से एक मानी जाती है। मेजर शैतान सिंह, जिन्होंने अंतिम क्षण तक अपने जवानों का नेतृत्व किया, उन्हें उनके अद्भुत साहस के लिए मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 
फिल्म का विषय जितना दमदार है, उसका सिनेमाई प्रस्तुतिकरण उतना ही कमजोर प्रतीत होता है। राजीव मेनन द्वारा लिखित और रजनीश घई द्वारा निर्देशित यह फिल्म अपने विषय की महत्ता को पर्दे पर पूरी तरह उतारने में चूक जाती है। रेजांग ला जैसी ऐतिहासिक लड़ाई को पेश करते समय जिस स्पष्टता, विस्तृत बैकग्राउंड और भावनात्मक गहराई की आवश्यकता थी, वह फिल्म में नजर नहीं आती।
 
निर्देशक मानो यह मानकर चलते हैं कि दर्शक इस घटना के हर पहलू से पहले से परिचित हैं। फिल्म में इस युद्ध से पहले की स्थिति, रेजांग ला का महत्व, भारतीय और चीनी सेना की रणनीति,  इन सभी बातों को विस्तार से दिखाया जाना जरूरी था। जानकारी की इस कमी के कारण दर्शक पूरी तरह भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते।
 
फिल्म का शुरुआती लगभग सवा घंटा कल्पना पर आधारित दृश्यों में व्यतीत होता है, जिसमें सैनिकों की निजी बातें, परिवार की यादें और हल्की-फुल्की बातचीत दिखाई गई है। ये दृश्य न तो कहानी को मजबूत बनाते हैं और न पात्रों के साथ गहरी कनेक्टिविटी विकसित कर पाते हैं।
 
इंटरवल के करीब 10-15 मिनट बाद वह बहुप्रतीक्षित युद्ध शुरू होता है, जिसकी ओर फिल्म धीरे-धीरे बढ़ती है, लेकिन युद्ध दृश्यों में भी स्पष्ट समझ और रोमांच की कमी महसूस होती है। बैकग्राउंड, रणनीति और युद्ध की तीव्रता को बेहतर ढंग से दिखाया जा सकता था।


 
फिल्म की सबसे बड़ी कमी है, स्टारकास्ट। फरहान अख्तर जैसे बड़े कलाकार के अलावा फिल्म में कोई पहचानने योग्य चेहरा नहीं है और दुर्भाग्य से स्वयं फरहान भी मेजर शैतान सिंह जैसी ऐतिहासिक और गहन भूमिका में उतने प्रभावी नहीं दिखते। उनके अभिनय में वह तीव्रता और भावनात्मकता दिखाई नहीं देती जिसकी इस किरदार को जरूरत थी।
 
राशि खन्ना छोटे रोल में ठीक हैं। आजिंक्य देव, एजाज खान, विवान भटेना जैसे कलाकार भी औसत प्रदर्शन देते हैं और कोई खास छाप नहीं छोड़ पाते।
 
फिल्म का तकनीकी पक्ष इसकी सबसे बड़ी ताकत है। सिनेमाटोग्राफी बेहद खूबसूरत है और असली लोकेशन पर शूटिंग ने फिल्म के माहौल को वास्तविकता से जोड़ दिया है। बर्फीली चोटियां, ऊंचाई, और कठोर वातावरण फिल्म को विजुअली आकर्षक बनाते हैं।
 
‘120 बहादुर’ एक अद्भुत, प्रेरणादायक और गौरवशाली विषय को पर्दे पर लाती है, लेकिन इसकी स्क्रिप्ट, भावनात्मक गहराई और निर्देशन उस स्तर तक नहीं पहुंच पाते जहाँ यह फिल्म इन 120 वीरों के शौर्य के साथ न्याय कर सके। तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत है, लेकिन कुल मिलाकर यह एक औसत अनुभव बनकर रह जाती है।
  • 120 Bahadur (2025) 
  • निर्देशक: रजनीश घई 
  • गीत: जावेद अख्तर 
  • संगीत: अमित त्रिवेदी, सलीम-सुलैमान, अमजद नदीम आमिर 
  • कलाकार: फरहान अख्तर, राशि खन्ना, विवान भटेना, आजिंक्य देव, एजाज खान 
  • सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 17 मिनट 
  • रेटिंग: 2/5 
ये भी पढ़ें
मिस यूनिवर्स 2025 की बनीं मेक्सिको की फातिमा बॉश, इस सवाल का जवाब देकर जीता ताज