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धर्मेन्द्र की आखिरी फिल्म, अगस्त्य नंदा का सैनिक अवतार और 1971 की जंग: इक्कीस की पूरी कहानी

Ikkis film
भारतीय सिनेमा में कुछ फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं होतीं, वे इतिहास, भावना और सम्मान का प्रतीक बन जाती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है इक्कीस, जो 1 जनवरी 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। यह फिल्म खास इसलिए भी है क्योंकि महान अभिनेता धर्मेन्द्र की अंतिम फिल्म है और इसलिए भी कि यह 1971 के भारत-पाक युद्ध के एक असली हीरो की कहानी को बड़े पर्दे पर जीवंत करती है।
 
21 साल का वो जवान, जिसने इतिहास बदल दिया
इक्कीस एक बायोग्राफिकल वॉर फिल्म है, जिसका नाम ही इसके नायक की उम्र से जुड़ा है। यह फिल्म सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की कहानी कहती है, जिन्होंने सिर्फ 21 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। अरुण खेत्रपाल भारतीय सेना के उन चुनिंदा वीरों में शामिल हैं जिन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया — वह भी मरणोपरांत।
 
फिल्म की कहानी 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान बसंतर नदी की लड़ाई पर केंद्रित है, जहां अरुण खेत्रपाल ने दुश्मन के टैंकों के सामने डटकर मुकाबला किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया और आखिरी सांस तक अपने टैंक को छोड़ने से मना कर दिया। यही साहस और वीरता उन्हें अमर बना गई।
 
अगस्त्य नंदा निभा रहे हैं अरुण खेत्रपाल का किरदार
फिल्म में अरुण खेत्रपाल की मुख्य भूमिका निभा रहे हैं अगस्त्य नंदा। यह उनके करियर की अब तक की सबसे गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। एक युवा सैनिक की मानसिक मजबूती, डर, जिम्मेदारी और देशभक्ति को पर्दे पर उतारना आसान नहीं है, लेकिन फिल्म से जुड़े सूत्रों के मुताबिक अगस्त्य ने इस किरदार के लिए खास ट्रेनिंग ली है।
 
यह फिल्म अगस्त्य नंदा को सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार कलाकार के रूप में स्थापित कर सकती है, क्योंकि इक्कीस किसी ग्लैमर या मसालेदार कहानी पर नहीं, बल्कि सच्ची शहादत पर आधारित है।

 
धर्मेन्द्र और इक्कीस: एक भावनात्मक जुड़ाव
इस फिल्म का सबसे भावुक पहलू है धर्मेन्द्र का इससे जुड़ना। इक्कीस को धर्मेन्द्र की अंतिम फिल्म माना जा रहा है। उन्होंने अपने करियर में देशभक्ति, युद्ध और बलिदान से जुड़ी कई यादगार फिल्में की हैं, लेकिन इस फिल्म के साथ उनका जुड़ाव खास है।
 
फिल्म में धर्मेन्द्र एक ऐसे किरदार में नजर आते हैं जो कहानी को भावनात्मक गहराई देता है। यह भूमिका भले ही लंबी न हो, लेकिन इसकी मौजूदगी फिल्म की आत्मा को मजबूती देती है। दर्शकों के लिए यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के एक युग को विदाई देने जैसा अनुभव होगा।
 
निर्देशक श्रीराम राघवन का नजरिया
इक्कीस का निर्देशन कर रहे हैं श्रीराम राघवन, जो अपनी गंभीर, यथार्थवादी और रिसर्च-आधारित फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने इस फिल्म को किसी ग्लोरिफाइड युद्ध कथा की तरह नहीं, बल्कि एक मानवीय कहानी के रूप में पेश किया है।
 
श्रीराम राघवन के मुताबिक, अरुण खेत्रपाल की कहानी सिर्फ युद्ध की नहीं, बल्कि एक ऐसे युवक की है जो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्व था। उन्होंने यह भी कहा कि धर्मेन्द्र जैसे अभिनेता का इस फिल्म का हिस्सा होना उनके लिए सम्मान की बात है, क्योंकि धर्मेन्द्र भारतीय सिनेमा में ईमानदार अभिनय की मिसाल हैं।
 
क्यों खास है फिल्म इक्कीस?
इक्कीस कई वजहों से खास है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि आज की आजादी और सुरक्षा कितनी बड़ी कुर्बानियों से मिली है। यह फिल्म न सिर्फ इतिहास को सम्मान देती है, बल्कि नई पीढ़ी को यह समझाने की कोशिश करती है कि देशभक्ति सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और बलिदान है।
 
धर्मेन्द्र की विदाई, अगस्त्य नंदा की गंभीर भूमिका, श्रीराम राघवन का संवेदनशील निर्देशन और 1971 युद्ध की सच्ची कहानी, ये सब मिलकर इक्कीस को सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि श्रद्धांजलि बना देते हैं।
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