18 साल की उम्र में शादी, फिर बने सिनेमा के सम्राट, जानिए पृथ्वीराज कपूर की कहानी
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज कपूर को भारतीय सिनेमा की ऐसी महान शख्सियत के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रौबदार भाव-भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने प्रेमियों के दिलों पर राज किया।
3 नवंबर 1906 को पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) के लायलपुर शहर में जन्मे पृथ्वीराज कपूर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लायलपुर और लाहौर में पूरी की। उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस उपनिरीक्षक थे। बाद में उनका तबादला पेशावर हो गया। पृथ्वीराज कपूर ने आगे की पढ़ाई पेशावर के एडवर्ड कॉलेज से की। उन्होंने कानून की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी क्योंकि उस समय तक उनका रुझान थिएटर की ओर हो गया था।
महज 18 वर्ष की उम्र में पृथ्वीराज कपूर का विवाह हो गया। वर्ष 1928 में अपनी चाची से आर्थिक सहायता लेकर पृथ्वीराज कपूर अपने सपनों के शहर मुंबई पहुंचे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1928 में इंपीरियल फिल्म कंपनी से जुड़कर की। वर्ष 1930 में बी. पी. मिश्रा की फिल्म सिनेमा गर्ल में उन्होंने अभिनय किया। इसके बाद एंडरसन की थिएटर कंपनी के शेक्सपियर नाटकों में भी उन्होंने अभिनय किया।
लगभग दो वर्षों के संघर्ष के बाद वर्ष 1931 में प्रदर्शित पहली सवाक फिल्म आलमआरा में उन्हें सहायक अभिनेता के रूप में काम करने का अवसर मिला। वर्ष 1933 में वे कोलकाता के प्रसिद्ध न्यू थिएटर से जुड़े। वर्ष 1933 में प्रदर्शित फिल्म राजरानी और वर्ष 1934 में देवकी बोस की फिल्म सीता की सफलता के बाद उन्होंने बतौर अभिनेता अपनी पहचान बना ली।इसके बाद उन्होंने न्यू थिएटर की कई फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें मंजिल और प्रेसिडेंट शामिल हैं।
वर्ष 1937 में फिल्म विद्यापति में उनके अभिनय को दर्शकों ने काफी सराहा। वर्ष 1938 में वे चंदूलाल शाह के रंजीत मूवीटोन से जुड़े। वर्ष 1940 की फिल्म पागल में उन्होंने पहली बार एंटी-हीरो की भूमिका निभाई। वर्ष 1941 में फिल्म सिकंदर की सफलता के बाद वे कामयाबी के शिखर पर पहुंच गए।
वर्ष 1944 में उन्होंने अपनी खुद की थिएटर कंपनी “पृथ्वी थिएटर” की स्थापना की। इस थिएटर में उन्होंने आधुनिक और शहरी विचारधारा को अपनाया, जो उस समय के पारसी और पारंपरिक थिएटरों से बिल्कुल अलग थी। धीरे-धीरे दर्शकों का ध्यान थिएटर से हटने लगा, क्योंकि उस समय फिल्मों का क्रेज अधिक था। इसके बावजूद पृथ्वी थिएटर ने 16 वर्षों में 2662 शो किए, जिनमें से लगभग सभी में पृथ्वीराज कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई। वे बीमारी की हालत में भी मंच पर प्रदर्शन करते थे।
पृथ्वी थिएटर के प्रसिद्ध नाटकों में दीवार, पठान, गद्दार और पैसा शामिल हैं। उन्होंने अपने थिएटर के माध्यम से कई प्रतिभाओं को अवसर दिया, जिनमें रामानंद सागर और शंकर-जयकिशन जैसे नाम शामिल हैं। 1960 के दशक में उन्होंने फिल्मों में काम करना कम कर दिया। वर्ष 1960 की फिल्म मुगल-ए-आजम में उनके सामने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, इसके बावजूद उन्होंने अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान खींचा।
वर्ष 1965 की फिल्म आसमान महल में उन्होंने एक और यादगार भूमिका निभाई। वर्ष 1968 की फिल्म तीन बहुरानियां में उन्होंने परिवार के मुखिया की भूमिका निभाई, जो अपनी बहुओं को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इसके साथ ही उन्होंने अपने पौत्र रणधीर कपूर की फिल्म कल आज और कल में भी अभिनय किया। वर्ष 1969 में उन्होंने एक पंजाबी फिल्म नानक नाम जहां है में भी काम किया, जिसकी सफलता ने पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री को नई पहचान दी।
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।भारतीय सिनेमा के इस महान अभिनेता ने 29 मई 1972 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
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