हिंदी सिनेमा में एक दौर ऐसा भी था जब निर्माता केसी बोकाड़िया का नाम बड़े सितारों और मसाला फिल्मों की गारंटी माना जाता था। अस्सी और नब्बे के दशक में उन्होंने ऐसी कई फिल्में बनाईं जिनमें बड़े सितारे, जोरदार ड्रामा और सिंगल स्क्रीन दर्शकों को पसंद आने वाला फॉर्मूला मौजूद होता था। उस समय धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, सलमान खान, जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर जैसे कलाकारों के साथ काम करना किसी निर्माता की पहचान बन जाता था और केसी बोकाड़िया उन चुनिंदा निर्माताओं में शामिल थे जिन्होंने लंबे समय तक बॉलीवुड के व्यावसायिक सिनेमा पर अपनी पकड़ बनाए रखी।
लेकिन वक्त बदला। दर्शकों की पसंद बदल गई। मल्टीप्लेक्स कल्चर आया, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने कहानियों का स्वाद बदल दिया और वही पुराने फार्मूले धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे। इसी बदलते दौर में केसी बोकाड़िया भी कहीं पीछे छूट गए। लंबे अंतराल के बाद उन्होंने फिल्म तीसरी बेगम के जरिए वापसी की कोशिश की, लेकिन यह वापसी वैसी नहीं रही जिसकी शायद उन्हें उम्मीद थी। 22 मई को रिलीज हुई यह फिल्म सिनेमाघरों में बेहद कम दर्शक जुटा पाई और लगभग खामोशी में रिलीज होकर सिमटती नजर आई।
पुराने अंदाज की कहानी, नए दौर का दर्शक
तीसरी बेगम एक सोशल ड्रामा है, जिसमें एक हिंदू लड़की पूजा दीक्षित की कहानी दिखाई गई है। पूजा एक मुस्लिम युवक बब्बन खान के प्यार में फंस जाती है। निकाह के बाद उसका नाम नगमा रखा जाता है, लेकिन शादी के बाद उसे पता चलता है कि बब्बन पहले से दो शादियां कर चुका है। उसकी पहली पत्नी शबाना मुस्लिम परिवार से है, जबकि दूसरी पत्नी तबस्सुम पहले नीतू सिंह नाम की राजपूत लड़की थी, जिसे शादी के बाद धर्म बदलना पड़ा।
फिल्म की कहानी धर्म परिवर्तन, धोखे और महिलाओं की पीड़ा जैसे संवेदनशील मुद्दों को छूने की कोशिश करती है। पूजा अपने हालात से निकलना चाहती है और तबस्सुम उसकी मदद करने का वादा करती है क्योंकि वह खुद भी उसी दर्द से गुजर चुकी होती है। कहानी में यूसुफ नाम का किरदार भी है, जो बब्बन और उसके परिवार के खिलाफ आवाज उठाता है, लेकिन उसकी बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता।
मुद्दा बड़ा था, लेकिन असर कमजोर रह गया
फिल्म जिस विषय को उठाती है, वह आज के सामाजिक और राजनीतिक माहौल में काफी चर्चा वाला मुद्दा माना जा सकता है। लेकिन समस्या यह है कि फिल्म की प्रस्तुति दर्शकों को बांध नहीं पाती।
केसी बोकाड़िया की पटकथा और संवाद भी पुराने ढर्रे से बाहर नहीं निकल पाते। शायद यही वजह रही कि दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव बनने के बजाय फिल्म कई जगह बिखरी हुई महसूस होती है। आज का दर्शक जहां तेज रफ्तार और वास्तविकता के करीब कंटेंट देखना पसंद करता है, वहां तीसरी बेगम पुराने जमाने की फिल्म जैसी लगती है। फिल्म में कायनात अरोड़ा, मुग्धा गोडसे और रचना श्याम जैसे कलाकारों ने अभिनय किया है।
तीसरी बेगम सिर्फ एक फिल्म की असफलता नहीं, बल्कि बॉलीवुड के बदलते दौर की कहानी भी कहती है। यह दिखाती है कि सिर्फ पुराने अनुभव या पुराने फॉर्मूले अब दर्शकों को थिएटर तक नहीं ला सकते। आज दर्शक नई सोच, मजबूत लेखन और अलग प्रस्तुति चाहता है।
केसी बोकाड़िया जैसे निर्माता जिन्होंने कभी बड़े पर्दे पर राज किया, उनके लिए यह दौर शायद सबसे कठिन है। क्योंकि अब सिर्फ स्टार पावर या विवादित विषय काफी नहीं होते, कंटेंट में ताजगी और गहराई भी जरूरी हो गई है।