दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में डॉ. सत्येंद्र तनेजा स्मृति फेस्टिवल की शुरुआत नाटक 'बरबाद' से हुई। यह नाटक अमेरिकी लेखिका लिन नॉटेज के पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त Ruined का रूपांतरण है, जिसे फैसल अल्काजी ने निर्देशित और सुशांत अग्रवाल ने रूपांतरित किया।
नाटक का कथ्य छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचल में बिजली बाई के ठेके पर घटित होता है, जहां शराब और जिस्मफरोशी का कारोबार चलता है। यहां आईं औरतें—कोयल, पूनम, जुग्नू और अन्य—अपनी-अपनी तबाह दास्तानों के साथ जी रही हैं। कोयल बर्बर बलात्कार से अपंग हो चुकी है, पूनम अपनी बच्ची की मौत का दर्द ढो रही है, और बिजली ख़ुद भी हिंसा की शिकार रही है।
विडंबना यह है कि बार-बार शोषित ये औरतें अंततः जिस्म बेचकर ही गुज़ारा करने को मजबूर हैं। नाटक का पार्श्व नक्सली गतिविधियों और सुरक्षा बलों की मुठभेड़ों से जुड़ा है। मगर असल सवाल औरत के वजूद का है—हर लड़ाई, हर युद्ध, हर गुटबाज़ी अंततः औरतों पर ही भारी पड़ती है। वे दोनों तरफ़ से हिंसा और शोषण का शिकार बनती हैं। यही इस नाटक का सबसे बड़ा बयान है।
मंचन में बिजली (राधिका एम. अल्काज़ी) का किरदार सबसे प्रभावशाली रहा। उनके संवाद और अभिव्यक्ति ने चरित्र को स्टीरियोटाइप होने से बचाया। दीपक, कोयल, पूनम, जुग्नू, भीमा और कमांडेंट कोठारी जैसे पात्र दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ते हैं। मंच सज्जा, लिबास और प्रकाश योजना ने वातावरण को सजीव बनाया।
नाटक का अंत पूनम की लहूलुहान मौत से होता है, जो दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती है। यह प्रस्तुति किसी आंदोलन की तरह नहीं, बल्कि एक रियल एकाउंट की तरह है— जैसे अफ़्रीका के कांगो में हिंसा की शिकार औरतों की कहानियां। प्रतीकात्मक रूप से दीपक का किरदार यह उम्मीद जगाता है कि औरतों को केवल जिस्म नहीं, बल्कि सम्मान और प्रेम से जीने का हक़ भी मिल सकता है।
फैसल अल्काज़ी ने बताया कि इस नाटक को मंच तक लाने में दस साल लगे। कोरोना महामारी और अन्य बाधाओं के बावजूद उन्होंने इसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में ढालने की कोशिश की। छत्तीसगढ़ी भाषा, स्थानीय संदर्भ और बाज़ारू बोलियों ने इसे और प्रामाणिक बनाया।
फेस्टिवल की शुरुआत में मानसी तनेजा और अरविंद गौड़ ने डॉ. सत्येंद्र तनेजा को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। उनकी पत्नी शशि तनेजा ने भी भावुक होकर कहा कि सत्येंद्र जी का पूरा जीवन रंगमंच को समर्पित रहा।