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'सतलुज' को ओटीटी से हटाने पर भड़कीं नीरू बाजवा, बोलीं- जनता को सच जानने का अधिकार
पंजाबी एक्टर-सिंगर दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को रिलीज के महज 48 घंटे के भीतर ही भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 से अचानक हटा दिया गया। इसके बाद से कई सेलेब्स इस फिल्म के सपोर्ट में आगे आ रहे हैं। वहीं सिनेमाई स्वतंत्रता पर एक नई बहस छिड़ गई है।
फिल्म को अचानक हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ के समर्थन में पंजाब और बॉलीवुड इंडस्ट्री के कई सितारे उतर आए हैं। दिलजीत की को-एक्ट्रेस और पंजाबी सिनेमा की क्वीन नीरू बाजवा ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर एक लंबा-चौड़ा और बेहद तीखा पोस्ट साझा कर अपनी भड़ास निकाली है।
नीरू बाजवा ने लिखा, मैंने 'सतलुज' देखी, भावनाएं जरूर आहत हुईं। लेकिन एक फिल्म सिर्फ एंटरटेनमेंट से कहीं ज्यादा होती है। यह इसे बनाने वालों की आवाज, उनका पैशन, उनकी सच्चाई और सालों की कड़ी मेहनत है। बिना किसी जवाबदेही के किसी के पास भी इसे चुप कराने की ताकत नहीं होनी चाहिए।
नीरू ने दर्शकों के अधिकारों की वकालत करते हुए आगे लिखा, चाहे लोग फिल्म को सपोर्ट करें या उसकी आलोचना करें, यह पूरी तरह से उनका निजी फैसला होना चाहिए। जनता से उनकी पसंद का अधिकार छीनना सरासर गलत है। अगर 'सतलुज' को रोका गया है, तो जनता को सच जानने का हक है। हमें खामोशी नहीं, बल्कि साफ-साफ वजह पता होनी चाहिए। पारदर्शिता कोई प्रिविलेज (विशेषाधिकार) नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।
नीरू बाजवा ने पंजाबियों की आवाज बुलंद करते हुए आखिर में कहा, एक पंजाबी होने के नाते, जब हमारी कहानियां हमसे छिपाई जाती हैं, तो हमें सवाल पूछने का पूरा हक है। हम कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं मांग रहे, हम बस सच, निष्पक्षता और किसी फिल्म को देखकर अपनी राय बनाने की आजादी चाहते हैं।
कौन थे जसवंत सिंह खालरा
इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं जसवंत सिंह खालरा, जिनका किरदार फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने निभाया है। खालरा पंजाब के एक मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जिन्होंने 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान हजारों अज्ञात शवों के अवैध रूप से किए गए अंतिम संस्कार और पुलिसिया ज्यादतियों का पर्दाफाश किया था। साल 1995 में उनका अचानक अपहरण कर लिया गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई, जिसके लिए कई पुलिस अधिकारियों को सजा भी हुई थी।
फिल्म के डायरेक्टर हनी त्रेहन के मुताबिक, यह फिल्म पूरी तरह से अदालती दस्तावेजों और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। फिल्म के हटने पर खुद दिलजीत दोसांझ ने भी निराशा व्यक्त की, लेकिन साथ ही संतोष जताया कि दो दिनों के भीतर ही सही, पर यह कहानी जनता तक पहुंच गई।
इस फिल्म का सफर शुरुआत से ही विवादों और संघर्षों से भरा रहा है। फिल्म 'सतलुज' मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और 1990 के दशक में पंजाब के संवेदनशील हालातों पर आधारित है। जब मेकर्स ने इसे थिएटर में रिलीज करने के लिए सेंसर बोर्ड के पास भेजा, तो बोर्ड ने इस पर करीब 127 कट्स लगाने और फिल्म का नाम बदलने का आदेश दे दिया था।
सेंसर बोर्ड के इन कट्स को मानने से इनकार करते हुए मेकर्स ने इसे सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर 3 जुलाई को बिना किसी कट के रिलीज कर दिया। मगर यह खुशी ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। आईटी नियम 2021 और 'राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों' का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने ZEE5 को इसे तुरंत हटाने का निर्देश दिया, जिसके बाद 5 जुलाई को फिल्म को भारत में 'पॉज' कर दिया गया।
