कौन हैं 21 साल की अनुप्रिया नागर? ज्यूरिख की नौकरी छोड़ अपनी बचत के पैसों से बनाई 'हनुमान अंश'
भारतीय सिनेमा के इतिहास में अक्सर बड़े बजट, दिग्गज सितारों और करोड़ों रुपये के प्रमोशन के दम पर फिल्में हिट होती हैं। लेकिन कभी-कभी श्रद्धा, विश्वास और लगन से बनी एक छोटी सी फिल्म बॉक्स ऑफिस के सारे समीकरण बिगाड़ देती है। ऐसी ही एक मिसाल बनकर उभरी है फिल्म 'हनुमान अंश' और इसे पर्दे पर लाने वाली 21 साल की सह-निर्मात्री अनुप्रिया नागर।
युके में पढ़ाई के दौरान की गई पार्ट-टाइम नौकरियों की पाई-पाई जोड़कर बनाई गई एक छोटे बजट की फिल्म जब 100 करोड़ रुपये के क्लब में शामिल हो जाए, तो इसे किसी चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता।
ज्यूरिख का कॉर्पोरेट करियर छोड़ भारत लौटीं
यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन करने वाली अनुप्रिया नागर के पास एक शानदार करियर विकल्प था। उन्हें स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में एक अच्छी नौकरी मिल चुकी थी। लेकिन उनके मन में कुछ और ही चल रहा था। यूके में रहने के दौरान ही अनुप्रिया को एक विदेशी नागरिक के जरिए महान संत नीम करोली बाबा के बारे में पता चला।
हिंदुस्तान टाइम्स संग बात करते हुए अनुप्रिया ने कहा, एक भारतीय युवा होने के नाते मुझे इस बात पर दुख और शर्मिंदगी महसूस हुई कि मुझे अपने देश के इतने बड़े संत के बारे में किसी विदेशी से जानना पड़ा। मेरी बस एक ही इच्छा थी कि बाबा जी की कहानियों और विचारों को आज की युवा पीढ़ी तक उनकी अपनी भाषा और कहानियों के जरिए पहुंचाया जाए।
इसी संकल्प के साथ अनुप्रिया 2025 में भारत लौट आईं और फिल्म 'हनुमान अंश' से सह-निर्मात्री के रूप में जुड़ गईं। अनुप्रिया के पास फिल्म निर्माण का कोई पूर्व अनुभव नहीं था। लेकिन जब प्रोजेक्ट को अचानक पैसों की जरूरत पड़ी, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी तीन साल की पार्ट-टाइम नौकरियों से बचाई पूरी पूंजी इस फिल्म में लगा दी।
शुरुआत में परिवार का चिंतित होना स्वाभाविक था। उनके पिता ने इंडस्ट्री के माहौल और अनुभव की कमी को लेकर सतर्क भी किया। लेकिन जब अनुप्रिया ने उन्हें नीम करोली बाबा पर बनने वाली फिल्म का विचार और कहानी सुनाई, तो परिवार का पूरा सहयोग मिला।
30 स्क्रीन्स से 1500+ स्क्रीन्स का हैरत अंगेज सफर
'हनुमान अंश' की बॉक्स ऑफिस यात्रा किसी फिल्मी पटकथा जैसी रही है। फिल्म को देशभर में 300 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया था। आठवें दिन तक दर्शक संख्या घटने के कारण फिल्म सिमटकर महज 30 स्क्रीन्स पर रह गई। माउथ पब्लिसिटी और जन-विश्वास के दम पर फिल्म ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि इसे 1,500 से अधिक स्क्रीन्स पर दोबारा प्रदर्शित करना पड़ा।
भारत में तहलका मचाने के बाद अब यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रिलीज हो रही है और 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। अनुप्रिया का मानना है कि उनके लिए असली सफलता पैसों का आंकड़ा नहीं, बल्कि थिएटर्स में उमड़ रही लोगों की वह भीड़ है जो बाबा जी के दर्शन और संदेश के लिए आ रही है।
2 करोड़ का बजट और सादगी का जादू
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और प्रामाणिकता है। महज 2 करोड़ रुपये के मामूली बजट में तैयार इस फिल्म ने साबित कर दिया कि अगर कहानी में सच्चाई हो तो बड़े-बड़े वीएफएक्स और सेट फीके पड़ जाते हैं। अनुप्रिया के मुताबिक, अगर इसे 10 करोड़ में बनाया जाता तो शायद इसकी रॉनस और सादगी खो जाती।

