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हम रोज क्या खा रहे हैं, यही सबसे बड़ा सवाल है...: 'द इंडिया स्टोरी' के निर्देशक चेतन डीके बोले- फिल्म देखकर लोगों की नींद उड़ गई
24 जुलाई को रिलीज होने जा रही फिल्म 'द इंडिया स्टोरी' एक सोशल कोर्टरूम ड्रामा है, जो भारत की सबसे गंभीर लेकिन अक्सर नजरअंदाज कर दी जाने वाली समस्याओं में से एक, खाद्य पदार्थों में मिलावट और खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल, को बड़े पर्दे पर लाती है। एक साधारण परिवार की भावनात्मक कहानी कैसे न्याय की लड़ाई में बदल जाती है, यही इस फिल्म का मूल आधार है।
इस महत्वाकांक्षी फिल्म के जरिए निर्देशक चेतन डीके निर्देशन की दुनिया में अपनी शुरुआत कर रहे हैं। अपनी बारीक तैयारी, गहन रिसर्च और यथार्थवादी कहानी कहने के लिए पहचाने जाने वाले चेतन मानते हैं कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के सामने जरूरी सवाल खड़े करने की ताकत भी रखता है। उनका कहना है कि 'द इंडिया स्टोरी' केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक आईना है, जो देश को बिना किसी फिल्टर के खुद को देखने के लिए प्रेरित करती है। पेश हैं उनसे हुई खास बातचीत के प्रमुख अंश।
'The India Story' जैसा टाइटल सुनते ही लोगों के मन में राजनीतिक या राष्ट्रवादी फिल्म की छवि बन जाती है। आपने इसी नाम को क्यों चुना? क्या आपके लिए 'India Story' का मतलब देश की उपलब्धियां हैं या उसकी उन सच्चाइयों से सामना कराना भी है, जिन पर हम अक्सर बात नहीं करना चाहते?
नहीं, यह फिल्म किसी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ नहीं है। यह हर भारतीय और हर भारतीय परिवार के लिए बनाई गई फिल्म है। इसलिए हमने इसका नाम 'द इंडिया स्टोरी' रखा।
इस फिल्म के जरिए आप क्या कहना चाहते हैं?
मेरी एक परिचित की छह साल की बेटी की कैंसर से मृत्यु हो गई थी। इतनी कम उम्र में कैंसर होना बेहद चौंकाने वाली बात थी। डॉक्टरों ने बताया कि मिलावटी खाद्य पदार्थ और उनमें मौजूद हानिकारक तत्व इसकी एक बड़ी वजह थे। आज दूध, पनीर, चावल, शहद और हमारी रोजमर्रा की कई चीजों में मिलावट हो रही है। कुछ चीजें तो पूरी तरह नकली हैं। भारत में जितना दूध पैदा होता है, उससे कहीं ज्यादा दूध बाजार में उपलब्ध है, तो सवाल उठता है कि बाकी दूध कहां से आता है। यहां तक कि मां के दूध में भी पेस्टिसाइड मिलने की बातें सामने आई हैं।
पंजाब के भटिंडा में एक ट्रेन को लोग 'कैंसर ट्रेन' के नाम से जानते हैं, क्योंकि वहां प्रदूषण और रसायनों के असर से बड़ी संख्या इस ट्रेन में रोजाना यात्रा करने वाले कैंसर का शिकार हो गए। केरल के एक गांव में 1976 से काजू के बागानों पर रसायनों का छिड़काव किया गया, जिसके बाद वहां कई विकलांग बच्चों का जन्म हुआ। हमारी फिल्म ऐसे ही कई वास्तविक और गंभीर मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है।
आज सोशल मीडिया के दौर में जागरूकता फैलाने के हजारों तरीके हैं। फिर भी आपने इस विषय को दो-तीन मिनट की वीडियो या डॉक्यूमेंट्री की बजाय एक कमर्शियल फीचर फिल्म के रूप में क्यों चुना?
डॉक्यूमेंट्री वह प्रभाव नहीं छोड़ पाती जो एक फीचर फिल्म छोड़ सकती है। डॉक्यूमेंट्री में कहानी और भावनाओं का वही स्तर पैदा करना मुश्किल होता है। जब तक दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ता नहीं, तब तक संदेश भी उतना असरदार नहीं बनता। इसलिए हमने इस विषय को एक कमर्शियल फिल्म के रूप में प्रस्तुत किया, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह बात पहुंच सके।
द इंडिया स्टोरी की शूटिंग: चेतन डीके फिल्म के कलाकारों काजल अग्रवाल और श्रेयस तलपदे से एक दृश्य की चर्चा करते हुए
फिल्म सामाजिक मुद्दे पर है, लेकिन दर्शक टिकट मनोरंजन के लिए खरीदता है। क्या शूटिंग या एडिटिंग के दौरान कभी लगा कि संदेश ज्यादा हो जाएगा और मनोरंजन कम हो जाएगा? यह संतुलन कैसे बनाया?
यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि लोग सिर्फ मनोरंजन के लिए ही फिल्म देखते हैं। भारत में ब्लॉकबस्टर फिल्में भी कुल आबादी का बहुत छोटा हिस्सा ही थिएटर में जाकर देखता है। हमारी फिल्म सामाजिक मुद्दा जरूर उठाती है, लेकिन इसके केंद्र में एक मजबूत और रोमांचक कहानी भी है, जिससे दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ेंगे।
अगर दर्शक थिएटर से निकलने के बाद सिर्फ इतना करें कि फल-सब्जी खरीदते समय सवाल पूछें या पैकेट का लेबल पढ़ना शुरू कर दें, तो क्या आप मानेंगे कि फिल्म सफल हो गई? या आपका लक्ष्य इससे भी बड़ा है?
जिन लोगों ने यह फिल्म देखी है, वे हैरान रह गए। उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि वे रोज अपने लंच और डिनर में कितनी खतरनाक चीजें खा रहे हैं। मेरे एक परिचित ने फिल्म देखने के बाद मुझे फोन किया और कहा कि वे रात दो बजे तक सो नहीं पाए। अगर फिल्म लोगों को सोचने और अपने खाने को लेकर जागरूक बनने के लिए प्रेरित करती है, तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी।
फिल्म में काजल अग्रवाल और श्रेयस तलपदे जैसे कलाकार हैं। क्या उन्हें इस फिल्म के लिए राजी करना मुश्किल था?
जब मैंने काजल अग्रवाल को फिल्म का विषय समझाया और अपनी 450 पन्नों की रिसर्च दिखाई, तो वे तुरंत इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो गईं। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने करियर में कई फिल्में की हैं, लेकिन इस तरह का विषय पहली बार कर रही हैं। उनका मानना था कि इस फिल्म के जरिए वे भारतीय परिवारों के लिए कुछ सार्थक कर सकती हैं और एक जागरूकता फैलाने वाली फिल्म का हिस्सा बनना चाहती हैं।
वहीं, श्रेयस तलपदे फिल्म की कहानी और रिसर्च देखकर हैरान रह गए। उनका पहला सवाल था, "क्या सचमुच ऐसा भी होता है?" जब उन्होंने पूरा विषय समझा तो उन्हें कंटेंट बेहद प्रभावशाली लगा और उन्होंने तुरंत फिल्म करने के लिए हामी भर दी।
