गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023
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Written By BBC Hindi
पुनः संशोधित शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022 (07:49 IST)

गुजरात और हिमाचल के नतीजों के 2024 के चुनावों के लिए क्या मायने हैं?

दिलनवाज़ पाशा, बीबीसी संवाददाता
"युवा भाजपा की विकास की राजनीति चाहते हैं। युवा ना जातिवाद के बहकावे में आते हैं ना परिवारवाद के। युवाओं का दिल सिर्फ़ विज़न और विकास से जीता जा सकता है। भाजपा के पास विज़न भी है और विकास के लिए प्रतिबद्धता भी।"
 
"महामारी के घोर संकट के बीच बिहार में चुनाव हुए थे तब जनता ने भाजपा को भरपूर प्यार दिया। देश विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ रहा है, ऐसे समय में भी देश की जनता का भरोसा सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा पर है।"
 
गुजरात में रिकॉर्ड तोड़ जीत के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं और आम जनता को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बातें कहीं।
 
गुजरात चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर साबित किया है कि वो भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा हैं और उन मतदाताओं को खींचने की उन जैसी अपील, अभी किसी और नेता में नहीं हैं।
 
गुजरात चुनाव में बीजेपी ने 182 में से 156 सीटों पर जीत हासिल की है। प्रदेश में सबसे ज़्यादा नुक़सान कांग्रेस को हुआ है। पार्टी 17 के आंकड़े पर सिमट गई है।
 
आम आदमी पार्टी ने यहां अपना खाता खोल लिया है। उसका वोट प्रतिशत बढ़ा है और उसने पांच सीटों पर जीत दर्ज की है। पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 99 सीटें मिली थी, कांग्रेस ने 77 सीटों पर जीत हासिल की थी।
 
मोदी ने शुरू की 2024 की तैयारी?
विश्लेषक मानते हैं कि गुजरात की जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में साल 2024 के चुनाव की तैयारियों की झलक थी।
 
राजनीतिक विश्लेषक अदिति फडनीस कहती हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज से ही साल 2024 का चुनाव अभियान शुरू कर दिया है। जिस तरह से उन्होंने कार्यकर्ताओं से बात की और उनकी सराहना की और अभिनंदन किया उससे साफ़ लगता है कि 2024 में क्या होने जा रहा है और मोदी किस तरह अभी से ही लामबंदी कर रहे हैं।"
 
भारतीय लोकतंत्र में सत्ता संभाल रहे नेता हमेशा ही एंटी-इन्कम्बेंसी के डर में रहते हैं। लेकिन बीजेपी ने गुजरात में 27 सालों की सरकार के बाद अगले पांच और साल के लिए रिकॉर्ड तोड़ बहुमत हासिल करके ये साबित कर दिया है कि अभी भारत में बीजेपी ही सबसे बड़ी राजनीतिक ताक़त है और वो अगले कुछ और सालों तक सत्ता में रहने का ना सिर्फ़ इरादा रखती है बल्कि तैयार भी है।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार 12 साल गुजरात में सत्ता संभालने के बाद दिल्ली आए थे और पिछले 8 साल से भारत के प्रधानमंत्री हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी ने कई चुनाव जीते हैं। कोरोना महामारी के बाद बीजेपी ने सबसे अहम राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से चुनाव जीता है। इसके अलावा असम, गुजरात और गोवा में भी सरकार बनाई है।
 
गुजरात के चुनाव को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शासन पर जनमतसंग्रह बना लिया था। उन्होंने अपने नाम पर वोट मांगे और एक तरह से वो गुजरात को अपने पर्यायवाची के रूप में पेश करते रहे हैं।
 
गुजरात में बीजेपी की प्रचंड जीत को भारतीय राजनीति में ब्रांड मोदी के और भी मज़बूत होने के रूप में भी देखा जा रहा है।
 
ऐसे में अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या गुजरात और हिमाचल प्रदेश के नतीजों का आने वाले 2024 लोकसभा चुनावों पर असर हो सकता है? क्या इन नतीजों की वजह से विपक्षी दलों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है?
 
मज़बूत होता ब्रांड मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में 30 से अधिक रैलियां की। बार-बार गुजरात को अपने आप से जोड़ा। उन्होंने गुजरात अस्मिता की बात की और मतदाताओं से ख़ुद पर और बीजेपी पर भरोसा करने का आह्वान किया।
 
गुजरात में जीत के बाद संबोधन करते हुए मोदी ने बार-बार इस भरोसे का ज़िक्र किया। गुजरात चुनाव के नतीजों का एक सबसे बड़ा संकेत यही है कि ब्रांड मोदी अभी और भी मज़बूत हो रहा है।
 
मोदी ने कहा, "मैं बड़े-बड़े एक्सपर्ट को भी ये याद दिलाना चाहता हूं कि गुजरात के इस चुनाव में भाजपा का आह्वान था 'विकसित गुजरात से विकसित भारत का निर्माण', गुजरात के नतीजों ने सिद्ध किया है कि सामान्य मानवी में विकसित भारत के लिए कितनी प्रबल आकांक्षा है, संदेश साफ़ है, जब देश के सामने कोई चुनौती होती है तो देश की जनता का भरोसा भाजपा पर होता है।"
 
मोदी ने कहा, "जब देश पर कोई संकट आता है, तब देश की जनता का भरोसा भाजपा पर होता है। जब देश बड़े लक्ष्य तय करता है, तो उनकी प्राप्ति के लिए देशवासियों का भरोसा भाजपा पर होता है। जब देश की आकांक्षाएं चरम पर होती हैं तब भी उनकी पूर्ति के लिए देश की जनता का भरोसा भाजपा पर ही होता है।"
 
विश्लेषक मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता के बीच भरोसा पैदा किया है और समय के साथ इस भरोसे और अपनी ब्रैंड इमेज को बढ़ाया है।
 
राजनीतिक विश्लेषक और दिल्ली की जामिया यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मुजीबुर्रहमान कहते हैं, "इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे बड़ा राजनीतिक ब्रांड हैं और विपक्ष या बीजेपी में ऐसा कोई चेहरा नज़र नहीं आता जो उनकी जगह ले सके।"
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहचान एक हिंदुत्ववादी नेता की बनाई है। लेकिन उन्होंने अपने आप को हिंदुत्व तक ही सीमित नहीं रखा है बल्कि वो आर्थिक विकास का मुद्दा भी उठाते रहे हैं जो मतदाताओं को उनकी तरफ़ खींचता है।
 
प्रोफ़ैसर मुजीबुर्रहमान कहते हैं, "आने वाले चुनाव में भी बीजेपी ब्रांड मोदी को ही आधार बनाकर चुनाव लड़ेगी। ये सवाल भी उठता रहता है कि बीजेपी में मोदी के बाद कौन। ऐसे सवाल तब भी उठे थे जब कांग्रेस नेहरू के प्रभाव में थी, तब कहा जाता था कि नेहरू के बाद कौन।
 
अब यही सवाल किया जाता है कि बीजेपी के बाद कौन। लेकिन जब बीजेपी साल 1990 के दौर में संघर्ष कर रही थी तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि बीजेपी से कोई मोदी जैसा नेता निकलेगा जो क़द में इतना बड़ा हो जाएगा।
 
फ़िलहाल ऐसा कोई चेहरा नज़र नहीं आता जो ब्रांड मोदी की जगह ले सके। अभी बीजेपी में जो सक्रिय लोग हैं उनमें ऐसा कोई नहीं लगता जो मोदी की जगह ले सके। मोदी से पहले बीजेपी में अरुण जेटली, सुषमा स्वराज जैसे नेता बड़ा चेहरा थे, लेकिन मोदी इन सबसे बहुत आगे निकल गए।"
 
सिर्फ़ हिंदुत्व ही नहीं है बीजेपी की रणनीति
गुजरात चुनाव के दौरान बीजेपी ने हिंदुत्व की अपनी रणनीति पर ज़ोर दिया। बीजेपी के स्टार प्रचारकों के निशाने पर अल्पसंख्यक मुसलमान रहे।
 
विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी हिंदुत्व की अपनी विचारधारा को प्रकट तो करती है, लेकिन सिर्फ़ हिंदुत्व के नाम पर ही वोट नहीं मांगती है, बल्कि अपने मुद्दों के ज़रिए भी वह लोगों को अपनी तरफ़ खींच रही है।
 
राजनीतिक मामलों की जानकार और वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडनीस कहती हैं, "ये कहना ग़लत है कि बीजेपी सिर्फ़ हिंदुत्व की रणनीति पर चुनाव लड़ रही है। बीजेपी बिजली-पानी जैसे मूलभूत मुद्दे भी उठा रही है।
 
सबसे अधिक कामयाब वही योजनाएं हैं जो इन मुद्दों के इर्द-गिर्द हैं। एक लाभार्थी वर्ग है जो बीजेपी के साथ कनेक्टेड महसूस करता है। बीजेपी को सिर्फ़ हिंदुत्व के दम पर नहीं बल्कि काम के दम पर भी कामयाबी मिली है।"
 
वहीं प्रोफ़ेसर मुजीबुर्रहमान कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी ने कई ऐसे मुद्दों पर काम किया है जिससे बीजेपी का आधार वोट और मज़बूत हुआ है। जैसे कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना या अयोध्या मुद्दे का समाधान करना।
 
इस वजह से प्रधानमंत्री ने वैचारिक आधार पर भी लोगों के बीच अपनी जगह बनाई है और वो ऐसे कल्ट फ़ीगर बन चुके हैं कि हिंदुत्ववादी अब उन्हें सावरकर से भी बड़ा मानने लगे हैं। वो अटल बिहारी वाजपेयी से भी बहुत आगे निकल गए हैं। आज उनका अपना बहुत बड़ा प्रशंसक वर्ग है जो और बड़ा हो रहा है। बीजेपी ऐसे में अगला चुनाव भी मोदी के नाम पर ही लडे़गी।"
 
विश्लेषक मानते हैं कि ये बीजेपी सिर्फ़ हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव नहीं जीत रही है। इससे उसे वोट तो मिल रहे हैं, लेकिन इतने नहीं कि इसके दम पर ही सत्ता हासिल करती रहे। हालांकि सवाल ये है कि क्या कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल आम जनता के बीच चुनाव को प्रभावित करने लायक मुद्दों को ले जा पाएंगे?
 
प्रोफ़ेसर रहमान कहते हैं, "चुनाव पर मुद्दों का असर पड़ता है। अगर ऐसा नहीं होता तो हिमाचल में सरकार नहीं बदलती। दिल्ली एमसीडी में भी मुद्दों के आधार पर ही चुनाव हुआ है।
 
लेकिन किन्हीं मुद्दों को जनता के बीच ले जाने के लिए पार्टी की विश्वसनीयता होनी चाहिए। बेरोज़गारी एक बड़ा मुद्दा हो सकता है, लेकिन लोगों के मन में ये सवाल रहेगा कि क्या कांग्रेस या आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर कुछ ठोस कर सकेगी।
 
मुद्दों को जनता के बीच ले जाने के लिए जो स्पष्टता और विश्वसनीयता चाहिए वो अभी नहीं दिखती है। विपक्ष मोदी पर हमला करता है और नाकाम हो जाता है। मोदी अब इन हमलों से निबटने में और इन्हें अपने हित में भुनाने में अभ्यस्त हो चुके हैं। विपक्षी दलों को समझना होगा कि भारतीय वोटर किस आधार पर वोट कर रहा है।"
 
मोदी पर व्यक्तिगत हमलों की नाकामी
विपक्ष के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले करते रहे हैं। गुजरात चुनाव के दौरान भी उन्हें रावण कहा गया। विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष की ये रणनीति बुरी तरह नाकाम हो रही है।
 
प्रोफ़ेसर मुजीबुर्रहमान कहते हैं, "विपक्ष की एक और नाकाम रणनीति ये है कि वो प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत आलोचना करते हैं। लेकिन मोदी ने अपनी छवि और क़द को इतना बड़ा कर लिया है कि वो किसी भी तरह की आलोचना से परे हैं। विपक्ष को उनकी आलोचना करने से विपक्ष का अपना नुक़सान अधिक होता है। मोदी अपने ऊपर होने वाले हमलों का भी अपने हित में इस्तेमाल कर लेते हैं।"
 
विश्लेषक मानते हैं कि यदि विपक्ष को आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी को चुनौती देनी है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने से बचना होगा और चुनाव को आम जनता से जुड़े मुद्दों पर ले जाना होगा।
 
अदिति फडनीस कहती हैं, "निश्चित रूप से विपक्ष को मोदी पर व्यक्तिगत हमला करने की नीति से बचना पड़ेगा। हिमाचल में कांग्रेस के लोगों ने साफ़-साफ़ कहा कि हम मोदी पर सीधा हमला नहीं करेंगे, मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं और उनकी गरिमा को हमें बनाए रखना है, लेकिन मोदी के जो लोग है, जिस तरह के लोगों को वो चुनाव में ला रहे हैं उनसे ज़रूर हम लड़ेंगे। सीधे मोदी पर हमला न करना एक रणनीति है, लेकिन अब देखना यही होगा कि ये रणनीति कितनी आगे बढ़ती है।"
 
बिखरा हुआ विपक्ष
गुजरात में इस बार कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी ने भी चुनाव लड़ा। नतीजा ये हुआ कि दोनों ही दल बुरी तरह हार गए। हालांकि दोनों दलों का कुल मत प्रतिशत भी बीजेपी से कम है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी की बढ़ती ताक़त की एक वजह विखरा हुआ विपक्ष भी है।
 
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आगामी आम चुनावों से पहले विपक्ष एकजुट हो सकता है। अदिति फडनीस कहती हैं, "नीतीश कुमार ने इस बात का बीड़ा लिया है कि वो विपक्ष को एकजुट करेंगे। नीतीश ने कहा है कि प्रधानमंत्री की बात बाद में होगी, लेकिन सबसे पहले ज़रूरी ये है कि भाजपा के हर उम्मीदवार के ख़िलाफ़ विपक्ष का एक उम्मीदवार हो।
 
अगर वन टू वन चुनाव होगा, इसका क्या नतीजा होगा ये कहा नहीं जा सकता है। लेकिन अभी कांग्रेस ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, बाकी राजनीतिक दल भी कांग्रेस की तरफ़ देख रहे हैं कि अगर कांग्रेस फ़ैसला करे तो हम भी अपना फ़ैसला करें। लेकिन इस दिशा में कोई निर्णय नहीं हुआ है। कांग्रेस अभी अपनी अंदरूनी लड़ाई से जूझ रही है, ऐसे में विपक्ष कितना एकजुट होता है ये अभी आगे ही पता चलेगा।"
 
वहीं प्रोफ़ेसर रहमान मानते हैं कि मौजूदा हाल में विपक्ष बिखरा हुआ है और भविष्य में भी उसके एकजुट होने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही है।
 
प्रोफ़ेसर मुजीबुर्रहमान कहते हैं, "बीजेपी के लिए सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि अभी भी विपक्ष ना एकजुट हुआ है और शायद आगे हो भी नहीं सके। जिस तरह से 1989 में वीपी सिंह ने विपक्ष को एकजुट किया था उस तरह से विपक्ष बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट नहीं हो पा रहा है।
 
ना साल 2014 में विपक्ष एकजुट था, ना 2019 में हुआ और साल 2024 में भी विपक्ष के एकजुट होने की अभी कोई संभावना नज़र नहीं आ रही है। क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने मतभेद हैं जिसकी वजह से विपक्ष के एकजुट होने की संभावना कम ही नज़र आती है।
 
जिस तरह लंबे समय तक कांग्रेस और इंदिरा गांधी को बिखरे हुए विपक्ष का फ़ायदा मिला, अब ठीक वैसा ही फ़ायदा बीजेपी को मिलता दिख रहा है।"
 
विपक्षी दलों ने एकजुटता बनाने के प्रयास तो किए हैं, लेकिन इन प्रयासों को कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली है। इसकी वजह बताते हुए प्रोफ़ेसर रहमान कहते है, "विपक्ष अभी बिखरा हुआ है। एकजुट होकर लड़ने के जो फ़ायदे होते हैं वो समझ अभी विपक्ष में नहीं बनी है।
 
एकजुटता बनाने के लिए हर दल को किसी ना किसी तरह का त्याग करना होगा, अभी विपक्षी दल इस त्याग के लिए तैयार नहीं हैं। हर पार्टी अपनी क्षेत्रीय ज़मीन को बचाना चाहती है और अपने नेता को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है।"
 
2024 के लिए क्या हैं संकेत?
हिमाचल प्रदेश, गुजरात और दिल्ली के एमसीडी चुनावों के नतीजों का एक सबसे बड़ा संकेत ये है कि इन नतीजों ने तीनों पार्टियों को संतोष करने के लिए कुछ ना कुछ दिया है। गुजरात में बीजेपी ने रिकॉर्ड तोड़ जीत हासिल की है, हिमाचल में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की है और दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने बीजेपी को एमसीडी से बाहर किया है।
 
प्रोफ़ेसर रहमान कहते हैं, "जहां तक 2024 का सवाल है, तो इन नतीजों से बहुत ठोस रूप से ये पता नहीं चलता है कि अगले आम चुनाव में क्या होगा। लेकिन गुजरात में जो नतीजे आए हैं उनसे बीजेपी की एक पार्टी के रूप में ताक़त एक बार फिर स्थापित हुई है।
 
गुजरात के नतीजे इतने बड़े होने की एक वजह ये भी है कि कांग्रेस ने एक तरह से बीजेपी को वॉकओवर दिया है। कांग्रेस ने ख़ामोशी से चुनाव लड़ने की रणनीति अपनाई जो बहुत बुरी तरह से नाकाम रही है। सवाल यही है कि क्या आगे भी कांग्रेस बीजेपी को वॉकओवर देगी या अपनी रणनीति बदलेगी?"
 
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