सिंहासन बत्तीसी : बीसवीं पुतली ज्ञानवती की कहानी

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ज्योतिषी को हतप्रभ देख विक्रम ने कहा, 'हे ज्योतिषी महाराज, आपके ज्ञान में कोई कमी नहीं है, लेकिन आपका ज्ञान तब तक अधूरा रहेगा, जब तक आप अपने ज्ञान की डींगें हांकेंगे और जब-तब उसकी जांच करते रहेंगे।

मैंने आपकी बातें सुन लीं थीं और मैं ही जंगल में लकड़हारे के वेश में आपसे मिला था। मैंने आपकी विद्वता की जांच के लिए अपने पांवों पर खाल चढ़ा ली थी, ताकि कमल की आकृति ढंक जाए। आपने जब कमल की आकृति नहीं देखी तो आपका विश्वास ही अपनी विद्या से उठ गया। यह अच्छी बात नहीं हैं।'

ज्योतिषी समझ गया, राजा क्या कहना चाहते हैं। उसने तय कर लिया कि वह सच्चे ज्ञान की जांच के भौंडे तरीकों से बचेगा तथा बड़बोलेपन से परहेज करेगा
(समाप्त)



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