गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023
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Written By भाषा

क्या 2009 राहुल का साल होगा?

बीते वर्ष धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने वाले कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी को लेकर लोगों के मन में सवाल है कि नए साल में होने वाले लोकसभा चुनाव में क्या कांग्रेस का यह युवराज और बड़ी भूमिका निभाएगा।

यह एक ऐसा सवाल है जिस पर कांग्रेस खेमे और उससे बाहर काफी चर्चा हो रही है। तीन प्रदेशों में जीत और जम्मू-कश्मीर में सरकार का हिस्सा बनने से उत्साहित कांग्रेस ने राहुल को पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बाद तीसरा स्तंभ करार दिया है।

पार्टी प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी कहते हैं कि हम प्रगतिशील, ऊर्जावान और सुशासन दे सकने वाली तीसरी पीढ़ी के नेताओं के साथ खड़े हैं।

लेकिन पार्टी राहुल को पेश करने के बारे में जल्दबाजी में नहीं दिखाई देती। सोनिया गाँधी ने स्वतंत्रता दिवस पर इस सवाल का जवाब दिया था कि अगर संप्रग सत्ता में वापसी करती है तो निश्चित तौर पर मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री होंगे।

असल में वर्ष 2008 की शुरुआत में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने वरिष्ठ नेता अर्जुनसिंह के उस वक्तव्य को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि राहुल को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने में कोई हर्ज नहीं है। तब पार्टी नेताओं ने यह जता दिया था कि मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं तो यह विचार पसंद नहीं किया जाएगा।

राहुल को सितंबर 2007 में कांग्रेस महासचिव और भारतीय राष्ट्रीय छात्रसंघ तथा भारतीय युवक कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया था।

राहुल ने छात्र संगठन और युवक कांग्रेस के कामकाज के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया शुरू की थी। पंजाब में छात्र संगठन और पंजाब में युवक कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव कराए गए। इसका अनुसरण देश के अन्य हिस्सों में भी किया जाना है।
इसके बाद भी यही मॉडल मूल पार्टी में आता दिखाई नहीं देता।

38 वर्षीय राहुल ने संरक्षणवाद, धन, वंशवाद और नाते-रिश्तेदारों को युवाओं को राजनीति में आने से रोकने वाला हानिकारक कारण करार दिया था।

उन्होंने उत्तराखंड में एक बैठक में खुद को ऐसा व्यक्ति बताया जिसे प्रधानमंत्री रहे उसके पिता, दादी और दादी के पिता से फायदा मिला।

वर्ष 2008 राहुल के लिए निर्णायक साबित हुआ, क्योंकि वे खुद के बल पर आगे आए और राजनेता के तौर पर परिपक्वता दिखाते हुए उन्होंने अपने आलोचकों के इस दावे को गलत साबित किया कि भारतीय राजनीति के कोलाहल में वे अपने पैर नहीं जमा सकेंगे।

राहुल को न सिर्फ छात्र संगठन और युवक कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया, बल्कि वे कांग्रेस की कई समितियों का सदस्य भी बने। इनमें भविष्य की चुनौतियों से जुड़ीं समिति प्रचार समिति और चुनावी घोषणा पत्र समिति प्रमुख है।

कांग्रेस के अंदरूनी लोगों का कहना है कि समितियों की बैठकों में उन्हें युवा नेता राहुल से काफी मूल्यवान सुझाव मिलते हैं और राजनीति पर उनकी पैनी नजर दिखाई देती है। इससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि वे पार्टी या सरकार में बड़े काम पूरे करने के लिए तैयार हैं।

कांग्रेस नेताओं ने रेखांकित किया कि वर्ष 2008 में पहली बार राहुल ने उत्तरप्रदेश के अमेठी,रायबरेली से बाहर गंभीरता से देखा। हाल में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने तीन-दो से जीत दर्ज की है। वीरप्पा मोइली जैसे पार्टी के अनुभवी नेताओं ने इस जीत का श्रेय अमेठी के सांसद राहुल को दिया।

मोइली ने उन्हें सितारा तथा एक और पार्टी महासचिव पृथ्वीराज चव्हाण ने उन्हें पार्टी का तीसरा स्तंभ करार दिया।
आलोचक कहते हैं कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चापलूसी के साथ देश के पहले राजनीतिक परिवार कहे जाने वाले घर के सदस्यों की तारीफ कर रहे हैं।

केंद्रीय मंत्री अर्जुनसिंह ने इसकी शुरुआत की थी जब उन्होंने कहा था कि राहुल को देश का प्रधानमंत्री बनाने में कुछ गलत नहीं र्हैं, पर कांग्रेस इससे प्रभावित नहीं हुई। अब अधिक नेता खुलकर यह कहने लगे हैं।

पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह कहते हैं कि राहुल प्रधानमंत्री पद संभालने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेस में लीक से हटकर बोलने के लिए नहीं जाने जाते। लिहाजा उनकी टिप्पणी को पार्टी में व्यापक सहमति मिली है।