अब कौन लिखेगा आवारा मसीहा जैसी जीवनी

साहित्यकार विष्णु प्रभाकर को श्रद्धांजलि

Vishnu Prabhakar
WD
इस उत्तर आधुनिक समय में जब हर कोई जल्द से जल्द प्रसिद्ध और लोकप्रिय होना चाहता है, प्रचार-प्रसार की दुनिया से हर कोई प्रभावित होकर दूधिया रोशनी में आने के लिए लालायित रहता हो तब किसी भी लेखक का लगातार लिखते रहना और चुपचाप लिखते रहना एक भरोसा पैदा करता है कि अभी भी कुछ ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने समय को समझते-बूझते उसे रच रहे हैं।

बिना इसकी चिंता किए कि उन्हें कितना पढ़ा जाएगा और उन्हें कितना समझा जाएगा। और यह भी कि उन्हें कितनी ख्याति मिलेगी। लगता है इस परंपरा के आखिरी साहित्यकार थे जो किसी भी तरह की चकाचौंध से प्रभावित हुए बिना चुपचाप लिखते रहे। उनके निधन से उस परंपरा का आखिरी स्तंभ भी ढह गया है।

उन्हें जो ख्याति आवारा मसीहा से मिली, वैसी उनकी किसी दूसरी कृति से उन्हें नहीं मिली। हालाँकि उन्होंने अर्धनारीश्वर जैसी कृति भी लिखी जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आवारा मसीहा बांग्ला के ख्यात उपन्यासकार शरत बाबू की जीवनी है। अंग्रेजी में जीवनी लिखने की एक लंबी परंपरा है और वहाँ आपको अभिनेता से लेकर निर्देशक, संगीतकार से लेकर नर्तक और लेखक से लेकर गायक तक की कई बेहतरीन जीवनियाँ मिल जाएँगी लेकिन हिंदी में जीवनी लेखन परिदृश्य लगभग उजाड़-सा है।

इसमे आवारा मसीहा एक बेजोड़ जीवनी है। इस उपन्यास को हिंदी में जो प्रेम मिला वैसा बहुत ही कम कृतियों को नसीब होता है। इससे यह निष्कर्ष निकालने में आसानी हो सकती है कि विष्णु प्रभाकर को पाठकों का गहरा प्रेम हासिल हुआ। और यही कारण है कि हिंदी में इसे जो लोकप्रियता हासिल हुई उसी कारण इसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और ऐसा माना जाता है कि इन भाषाओं में भी आवारा मसीहा को खुले दिल से सराहा गया।

गाँधीवादी विचारों से प्रभावित रहे विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखी गई यह जीवनी एक तरफ जहाँ दिग्गज उपन्यासकार शरत बाबू के जीवन और समय को समझने की एक संवेदनशील और गहरी नजर देती है वहीं यह भी दर्शाती है कि एक लेखक दूसरे लेखक को कितनी सहानुभूति और सहृदयता से देखने-समझने की कोशिश करता है।

रवींद्र व्यास|
आवारा मसीहा न केवल एक लेखक के बनने, अपने समय में रहते हुए उससे प्रतिकृत होने और रचने के लिए एक अनिवार्य यातना को एक सहज भाषा में अभिव्यक्त करती है बल्कि इसे पढ़ते हुए हम यह सहज ही अंदाज भी लगा सकते हैं कि इसके लिए प्रभाकरजी ने कितना श्रमसाध्य शोध और अध्ययन किया। उन्होंने लगभग आवारा मसीहा लिखने से पहले लगभग 15-16 सालों तक अध्ययन किया।



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