नाभि-चक्र स्वास्थ्य की धुरी

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-रवि कुमार निर्म

शरीर के संतुलन को सही बनाए रखने के साथ अंग प्रत्यंगों में सामंजस्य एवं नाड़ियों के कार्य-संचालन व नियंत्रण में नाभि मंडल की भूमिका महत्वपूर्ण है। जब यह स्वाभाविक स्थिति में रहता है, तो शरीर रूपी मशीन का प्रत्येक पुर्जा अपना कार्य ठीक तरह से करता है। नस-नाड़ियों में प्रवाहित होती जीवनी शक्ति शरीर को स्वस्थ एवं कार्यक्षम बनाए रखती है। व्यक्ति स्वास्थ्य की तरंगों से अनुप्राणित होकर अपना प्रत्येक कार्य आशा, उत्साह, उमंग से करते हुए जीवन की चुनौतियों को स्वीकार कर उनसे जूझने का हौसला बनाए रखता है। इसके विपरीत नाभि चक्र में आई थोड़ी-सी भी विकृति ध्यान न देने पर शरीर की प्रमुख प्रणालियों को अस्त-व्यस्त कर रोग उत्पन्न कर देती है।

शरीर को रोगमुक्त एवं स्वास्थ्य को उन्नत बनाए रखने के लिए व्यक्ति के शरीर में नाभि चक्र का सही स्थिति में होना पहली आवश्यकता है। नाभि अपने स्थान से एक चावल भर भी टली हुई हो तो शरीर में अव्यवस्था उत्पन्न कर अपनी विकृति रोग की शक्ल में व्यक्त करती है। आधुनिक चिकित्सक नाभि की विकृति से उत्पन्न दोषों का उपचार करने में असहाय होते हैं, क्योंकि वे नाभि के स्थानच्युत होने की ओर ध्यान नहीं देते। परिणामतः शरीर के अनेक रोगों विशेषकर पाचन प्रणाली से संबंधित विकारों में औषधि, उपचार पद्धतियाँ बहुत कारगर नहीं हो पातीं। औषधि उपचार से रोग के तीव्र लक्षण भले ही दब जाएँ, शरीर से रोगमुक्त नहीं हो पाता। कुछ दिनों बाद विकृति परिवर्तित लक्षणों के साथ किसी और नामधारी रोग की शक्ल धारण कर व्यक्ति को कष्ट देती रहती है। महँगी दवाएँ भोजन की तरह रोगी की दैनिक आवश्यकता बन जाती हैं। रोग तो दूर होता नहीं, उल्टे औषधियों के दुष्प्रभाव शरीर में नित्य नई परेशानियाँ खड़ी करते रहते हैं। इस तरह व्यक्ति रोग के दुष्चक्र में फँस जाता है।
ऐसे अनेक रोगियों का परीक्षण करने पर उनका नाभि-मंडल विकृत अवस्था में पाया गया है। जब नाभि चक्र व्यवस्थित कर दिया गया तो रोग तो शीघ्रता से दूर हुआ ही, स्वास्थ्य भी उन्नत हो गया।

 

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