जप के प्रकार और कौन से जप से क्या होता है जानिए

श्रीगुरु से मंत्रदीक्षा लेकर साधन मंत्र का आरंभ करें। जिनके लिए सुभीता हो, वे किसी एकांत पवित्र स्थान में, नदी किनारे अथवा शिवालय में जप करें। जिनके ऐसी सुभीता न हो वे अपने घर में ही जप के लिए कोई रम्य स्थान बना लें। इस स्‍थान में देवताओं, तीर्थों और साधु-महात्माओं के चित्र रखें। उन्हें फूलमाला चढ़ाएं, धूप दें। स्वयं स्नान करके भस्म-चंदन लगाकर चैलाजिन कुशोत्तर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कंधे पर उपवस्त्र धारण किए, इष्टदेव और गुरु का स्मरण करते हुए आसन पर बैठें। जो नित्य कर्म करने वाले हैं वे पहले संध्या-वंदन कर लें, तब प्रात:काल में सूर्यनारायण को नमस्कार करें, पश्चात देवपूजन करके नित्य पाठ कर लें।

जो संध्या आदि करना नहीं जानते, वे पहले गंगा, नर्मदा आदि नामों से शरीर पर जल-मार्जन करें, तब एकाग्रचित्त हो सूर्य ध्यान करके नमस्कार करें, अनंतर अपने इष्टदेव का ध्यान करके गुरुमंत्र से सब उपचार उन्हें अर्पण करें। फिर स्तोत्र-पाठादि करके आसन पर बैठें। आसन स्वस्तिक, पद्म अथवा सिद्ध इनमें से कोई भी हो। दृष्टि को नासाग्र करके प्राणायाम करें। अनंतर थोड़ी देर सावकाश पूरक और रेचक करें। इसके बाद माला हाथ में लेकर जप आरंभ करें। मेरु-मणि का उल्लंघन न करें। अपनी सुविधा देखकर जप संख्या निश्चित कर लें और रोज उतनी संख्‍या पूरी करें और वह जप अपने इष्टदेव को अर्पण करें। इसके पश्चात अपने इष्टदेव के पुराण और उपदेश से कुछ पढ़ लें।
श्रीराम के भक्त हों तो श्री अध्यात्म रामायण, श्रीराम गीता और श्रीराम चरित मानस। श्रीकृष्ण के भक्त हों तो श्रीभागवत और श्रीगीता पढ़ें। अनंतर तीर्थप्रसाद लेकर उठें। इस क्रम से श्रद्धापूर्वक कोई साधना करे तो वह कृतार्थ हो जाएगा। यह सब तर्क से नहीं, करके देखने से ही कोई जान सकता है। उसका चित्त आनंद से भर जाएगा। पाप, ताप, दैन्य सब नष्ट हो जाएगा। ईश्वर रूप में चिर विश्रांति प्राप्त होगी। संपूर्ण तत्वज्ञान स्फुरित होने लगेगा और शक्ति भी प्राप्त होगी। प्रत्येक देवता के सहस्र नाम हैं, प्रत्येक के अपने उपदेश हैं, भक्त इनका उपयोग करें। प्रात:काल गीता आदि से कोई श्लोक पढ़कर दिनभर उसका मनन करें। सायंकाल में पंचोपचार पूजा आदि होने के बाद जप करके सहस्र नाम में से कोई नाम ध्यान में लाकर उसके अर्थ का विचार करते हुए सो जाएं। इससे शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है।

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