शिव योग के मूलत: तीन अंग है- धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग।
FILE
क्या है धारणा :- पतंजलि हते हैं चित्त का देश विशेष में बँध जाना धारणा है। इस अवस्था में मन पूरी तरह स्थिर तथा शांत रहता है। पांचों इंद्रियों को उनके स्थान से हटाकर किसी एक स्थान (भृकुटी) पर लगाना प्रत्याहार है और जब प्रत्याहर में व्यक्ति पारंगत हो जाता है तो धारणा सधने लगती है। कल्पना और विचारों का यथार्थ रूप ले लेना ही धारणा है।
लाभ : जिसे धारणा सिद्ध हो जाती है, कहते हैं कि ऐसा योगी अपनी सोच या संकल्प मात्र से सब कुछ बदल सकता है। ऐसे ही योगी के आशीर्वाद या शाप फलित होते हैं। तब कल्पना करें की आप सेहतमंद और सफल व्यक्ति बनना चाहते हैं। धारणा से मन पूर्णत: एकाग्र रहकर शक्तिशाली बन जाता है।
क्या है ध्यान :- ध्यान का संबंध मौन से है। चुप रहकर, कुछ भी नहीं सोचते हुए, स्वयं के आसपास की गतिविधियों तथा स्वयं के बॉडी मूवमेंट का अवलोकन करते रहने से भी जागरूकता का विकास होता है। आप चाहे तो आँखें बंद करके बैठ जाएँ और श्वास-प्रश्वास को ध्यानपूर्वक महसूस करते रहें। भीतर और बाहर से मौन होना ध्यान की शुरुआत के लिए जरूरी है।
लाभ : ध्यान करने से मन और मस्तिष्क के साथ ही शरीर भी स्वस्थ रहता है और किसी भी प्रकार का अवसाद तथा तनाव नहीं रहता। ध्यान से ही समाधि या जीवन में सफलता पायी जा सकती है।
क्या है समाधि :- समाधि समयातीत है जिसे मोक्ष कहा जाता है। इस मोक्ष को ही जैन धर्म में कैवल्य ज्ञान और बौद्ध धर्म में निर्वाण कहा गया है। योग में इसे समाधि कहा गया है। इसके कई स्तर होते हैं। मोक्ष एक ऐसी दशा है जिसे मनोदशा नहीं कह सकते। समाधि है मन, विचार और शरीर के पार जीने की कला।
'मनुष्य पशु है' शिव कहते हैं 'मनुष्य पशु है'- इस पशुता को समझना ही योग और तंत्र का प्रारम्भ है। योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के 'विज्ञान भैरव तंत्र' और 'शिव संहिता' में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है।
शिव का दर्शन : ज्योतिषियों और पुराणिकों की धारणा से सर्वथा भिन्न है भगवान शंकर का दर्शन और जीवन। उनके इस दर्शन और जीवन को जो समझता है वही महायोगी के मर्म, कर्म और मार्ग को भी समझता है।
शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वह सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जीयो, वर्तमान में जीयो अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।