कभी उसे भी महसूसने दें 'अपना घर'


वो आज अत्यंत प्रसन्न नज़र आई। पूछने पर बोली-'आज 'अपना' घर जीकर आई हूं।'

मेरी आंखों में तैर आये प्रश्न-भाव को महसूस करते हुए उसने अपनी बात को यूं स्पष्ट किया-'अरे,आज मां-पिताजी के घर गई थी।वहां सब कुछ आज भी उतना ही अपना है,जितना विवाह के पहले था। वही आज़ादी,वही उन्मुक्तता,वही निर्भयता,वही स्नेहिल सुहानापन।'
उसके स्वर में ह्रदय का सारा उछाह उमड़ आया था,जिसने मेरा मन भी भिगो दिया।

लगा कि सच ही तो कह रही है वह। एक लड़की के लिए माता-पिता का घर किसी राजमहल से कम नहीं होता। राजमहल से मेरा आशय सम्पन्नता से कदापि नहीं है क्योंकि सभी अभिभावक अमीर नहीं होते।

राजमहल इसलिए क्योंकि यहां एक बेटी वो सारा सुख,स्नेह,अपनापन और अधिकार महसूस करती है, जो दूसरे परिवार (पतिगृह) में उसे या तो उपलब्ध नहीं होता अथवा अल्प मात्रा में मिलता है, वो भी इस टिप्पणी के साथ कि 'दूसरे घरों में तो महिलाओं को इतना भी नहीं मिलता।'
सच में लड़कियों के जीवन की यह त्रासदी कमोबेश रूप में लगभग घरों की कहानी है।जब कोई माँ अपनी बेटी से यह कहती है कि अभी तो मौज कर लो,ससुराल में ये नहीं चलेगा या यह कि सारा काम सीख लो अन्यथा ससुराल में रोना पड़ेगा,तो उसका सीधा आशय यह होता है कि वो माँ भी अपने ससुराल में गलत व्यवहार को भोग चुकी है।

मुझे यह देखकर बहुत कष्ट होता है कि जिस देश के धर्मग्रंथों में नारी को पूज्य माना गया है,वहां के वासी नारी के प्रति अपने आचरण में इतने हीन हैं।
वैदिक काल से नारी अपने हर रूप में सम्मान व श्रद्धा की पात्र मानी गई।उसने अपने ज्ञान,विवेक,कर्म व
संवेदना से सदा स्वयं की योग्यता को सिद्ध भी किया।

आप भारतीय आद्य परम्परा का अवलोकन तो कीजिए। गार्गी,मैत्रैयी,मांडवी,सावित्री,अनुसूया, रज़िया सुल्तान,रानी लक्ष्मीबाई से लेकर सरोजिनी नायडू,नीरजा भनोत, बछेंद्री पॉल इंदिरा गांधी,मेधा पाटकर,किरण बेदी,कल्पना चावला,अमृता प्रीतम, पी.टी.उषा,लता मंगेशकर,महाश्वेता देवी,अंजलि वेदभागवत ,झुम्पा लाहिड़ी, मिताली राज आदि अनगिनत नाम हैं,जो अपनी क्षमता का भरपूर प्रदर्शन करने के कारण 'नाम' से आगे बढ़कर 'हस्ती' बन गए हैं और जिनकी उपलब्धियां हम सभी भारतीयों के लिए गर्व का विषय है।
निष्कर्ष
यह कि महिलाओं ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्वयं को सिद्ध किया है।प्राचीन से लेकर अर्वाचीन युग तक ये स्वयंसिद्धाएँ अपने देवी-रूप को सार्थक करती आईं हैं।

फिर इन्हें सम्मान देने में इतनी कृपणता क्यों?

नारी शक्ति का उज्ज्वल इतिहास और वर्तमान होते हुए भी कदम दर कदम साथ-साथ नारी-दमन के कलंकित अध्याय भी चलते गए हैं। हम 21 वीं सदी में आकर तमाम प्रगति करने के बावजूद एक अर्द्धसामंती दबाव झेलते समाज में जी रहे हैं।
प्रायः परिवारों में 'मुखिया' का स्थान अघोषित रूप से पुरुषों के लिए आरक्षित माना जाता है। लड़के अपने पिता को प्रत्येक निर्णय लेते हुए देखते हैं।मां
को या तो मौन रहते हुए अथवा पिता द्वारा मौन कराते हुए देखते हैं। उन्हें महसूस होता है कि या तो मां,पिता के समकक्ष
बुद्धिमती नहीं है अथवा वह निसर्गतः ही अल्प अधिकारसम्पन्न है।

अनुकरण के प्राकृतिक सिद्धांत के अनुसार वे भी विवाहोपरांत अपनी पत्नी के साथ 'स्वामी' जैसा व्यवहार करते हैं। उसे 'देह' या 'दासी' की कूपमंडूकता में आबद्ध करने का कुत्सित प्रयास करते हैं।वे उसे 'सहचरी' के समान धरातल पर रख ही नहीं पाते।

यदि कोई नारी इन संकीर्णताओं का विरोध करे,तो घर को रणक्षेत्र बनने में देर नहीं लगती क्योंकि पुरुष को उसके विरोध में 'अपने स्वाभिमान पर चोट' , घर की मर्यादा भंग' 'लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन' आदि आदि दुनिया भर की तमाम अनैतिकता नज़र आने लगती है।वह अपने समग्र पौरूष को उसके विरोध के लिए झोंक देता है। नतीजतन नारी या तो पुनः पुरुषनिर्मित श्रृंखलाओं में आबद्ध हो जाती है या फिर घर से आज़ाद हो जाती है। पहली स्थिति में उसका जीवन नर्क बन जाता है और दूसरी में घर बिखर जाता है।दोनों ही स्थितियां आदर्श नहीं हैं।

वस्तुतः आवश्यकता संस्कार व सोच की सच्ची समृद्धि को अमल में लाने की है। पुरुष, नारी को स्वयं से एक पायदान नीचे ना समझते हुए समकक्ष ही माने,देह से परे इंसान समझे,उसकी योग्यता व क्षमता को समुचित मान दे और निर्णयों में उसकी भागीदारी सहर्ष स्वीकार करे ताकि उसे इस घर में भी 'अपना घर' की स्नेहसनी अनुभूति हो।

यदि ऐसा हुआ,तो आने वाली संतति भी उन्हीं संस्कारों की बेल आगे पल्लवित करेगी और नारियों के जीवन से 'घुटन' शब्द सदा के लिए तिरोहित हो जाएगा।
दूसरी ओर स्वयं नारियां भी इस तथ्य को समझें कि उनकी लड़ाई पुरुष मात्र से नहीं है वरन् उस जड़ मानसिकता से भी है, जिसने न केवल उन्हें दासवत् बनाया बल्कि दास बने रहने के गौरव और अलौकिक आनंद का दर्शन भी गढ़ा।

मेरे विचार से बेहतर तो यही होगा कि अब तक के जीवन की पाठशाला में पढ़े गए रूढ़िग्रस्त व संकीर्ण पाठों को स्त्री-पुरुष दोनों ही विस्मृत कर सोच की व्यापकता और तत्सम्बन्धी विस्तृत कर्मभूमि में प्रवेश करें। अपनी-अपनी हैसियत में एक स्वतः सम्पूर्ण व्यक्तित्व बनकर ही भविष्य को उस सार्थकता से विभूषित किया जा सकता है, जिसकी इच्छा कल्याण के देवता-शिवजी-ने अखिल विश्व की कल्पना अर्द्धनारीश्वर के रूप में करके अभिव्यक्त की थी।


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