वास्तु के नाम पर न करें अनावश्यक तोड़फोड़

वास्तु का नाम सामने आते ही हर किसी के जहन में तोड़फोड़ घूमने लगती है। इसलिए, क्योंकि अधिकतर वास्तुशास्त्री बिना तोड़-फोड़ के कोई समाधान दे ही नहीं पाते हैं। पर ऐसा नहीं है। वास्तु दोषों को बिना तोड़-फोड़ के भी दूर करना पूरी तरह से संभव है। बस इसके लिए सबसे पहले यह तय होना चाहिए कि आपको अपने घर, आफिस इत्यादि का वास्तु परीक्षण किसी समस्या के समाधान की खातिर करवाना है या फिर कोई लक्ष्य पूरा करने के लिए। नया भवन तैयार करवाने से पहले भी वास्तु सलाह ली जा जाए तो ज्यादा बेहतर रहती है।


 
पारंपरिक वास्तु में वास्तुशास्त्री बस घर के वास्तु दोषों को उत्तर दिशा के आधार पर बता कर तोड़-फोड़ करने की सलाह दे डालते हैं। पर ऐसा करना ठीक नहीं है। वास्तुदोषों को तलाश करने का सही तरीका यही है, कि सबसे पहले हम अपनी समस्याओं या फिर लक्ष्यों को निर्धारित करें। फिर उन वास्तु दोषों को तलाशा जाए, जिनसे समस्या को हल करने या फिर लक्ष्य को प्राप्त करने के लक्षण मिलते हों।
 
‘रेमेडियल वास्तुशास्त्र’ तकनीक में वास्तु दोषों को दूर करने की खातिर अनावश्यक तोड़-फोड़ नहीं की जाती है। सिवाए बहुत ही विकट परिस्थिति में एक प्रतिशत, जब कोई और समाधान नजर न आए या फिर वास्तुदोष बहुत भयानक हो। वास्तु दोषों को दूर करने के लिए बहुत ही साधारण उपायों को सुझाया जाता है।
आपकी जानकारी के लिए घर के मुख्य द्वार तथा अन्य उन दरवाजों का बहुत ही महत्व माना जाता है, जो भीतर की ऊर्जा को बाहर की ऊर्जा से मिलाते हैं। 
 
‘रेमेडियल वास्तुशास्त्र’ तकनीक में दरवाजों का असर देखने के लिए निर्मित हिस्से को 32 बराबर भागों में बांटा जाता है। इसके लिए उत्तर की डिग्री को प्राप्त कर एंग्युलर बंटवारा किया जाता है। अर्थात जितनी डिग्री पर उत्तर होगा उसमें अपनी ओर से कुछ जोड़ना या घटाना नहीं है। उदाहरण के लिए पारंपारिक वास्तुशास्त्री यूं तो उत्तर के द्वारों को बहुत ही महत्व देते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। उत्तर दिशा को 8 बराबर हिस्सों में बांटा जाए, तो वे सभी द्वार कहलाएंगें और उनमें से मात्र दो ही द्वार उच्च श्रेणी के हैं। जबकि बाकी किसी न किसी प्रकार की तकलीफ देते रहेंगे। ऐसा भी नहीं है कि अगर तकलीफ देने वाले द्वार हैं तो उन्हें तोड़ दिया जाए, बल्कि मेटल की पत्ती या तार या फिर रंगीन टेप लगा कर उनका उपचार किया जा सकता है और वे अपना दुष्प्रभाव छोड़ देते हैं। ठीक इसी प्रकार के समधान पश्चिम, दक्षिण और पूर्व के द्वारों के लिए भी अपनाए जा सकते हैं।
 
इसी तरह से सही मायने में वास्तु का अर्थ पंचतत्वों का संतुलन होता है। जरा बारीकी में जाएं तो जिस प्रकार मानव शरीर में पंचतत्व अपनी अहम भूमिका निभाते हैं ठीक उसी प्रकार किसी भी भवन में वास्तु दोषों का कारण भी पंचतत्वों का असंतुलन ही होता है। इसी असंतुलन को दूर करते ही वास्तु दोष स्वयं ही दूर हो जाते हैं और भवन में रहने वालों को खुशहाल जिंदगी जीने का मौका देने लगते हैं।
 
पंचतत्वों को संतुलित करने के लिए भवन के क्रियाकलाप अर्थात व्यक्ति कहां सो रहा है, गैस का चूल्हा कहां है, टायलेट कहां हैं आदि को जांचा जाता है और उनका रिजल्ट देखा जाता है। अक्सर क्रिया कलाप को बदल पाना संभव नहीं होता है तो उनके साधारण उपाय किए जाते हैं। इनमें रंगों का अपना बहुत ही महत्व है। एक भवन में रंगों का उतना ही महत्व है जितना शरीर में दिल का। उदाहरण के लिए आग पर अगर पानी डाल दिया जाए तो वह बुझ जाएगी और ठीक इसी प्रकार अगर भवन में किसी स्थान पर लाल की आवश्यकता है और वहां नीला कर दिया जाएगा तो भवन में अग्नि तत्व की कमी का परिणाम यह होगा कि भवन में रहने वाले हादसों, सरकारी कार्रवाई का शिकार होते रहेंगें और पैसों की कमी हमेशा सताती रहेगी। ठीक इसी प्रकार एक भवन में बाकी रंग भी इसी तरह के प्रभाव छोड़ते हैं। अगर आप नया भवन बना रहे हैं और अगर किसी वास्तुशास्त्री से सलाह न भी ली है, तो कम से कम न्यूट्रल रंगों- क्रम या फिर आफ व्हाइट- को अपनाते हुए वास्तु दोषों के प्रभाव को कुछ हद तक तो अपने से दूर रख सकते हैं।

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