आम बजट का खास असर कितना होगा?

पुनः संशोधित गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018 (14:37 IST)
जैसी कि इस बार के बजट के बारे में एक आशंका थी वह एक फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने
सही साबित कर दी। उन्होंने अपने बजट को किसानों के नाम समर्पित दिया। बजट के बाद की चर्चा
में खुद प्रधानमंत्री से लेकर सरकार के प्रतिनिधियों, भाजपा के प्रवक्ताओं और मीडिया में सरकार से भी ज्यादा सरकारी भोंपू इस बजट को गांव, खेती और किसानी के लिए एक ऐतिहासिक बजट बता
सकते हैं। वहीं टीवी चर्चा में उद्योग और शेयर बाजार वाले इसे 'किसान समर्थक' बताकर निराशा
जताएंगे। यही बस एक कारण है कि इस बार जेटली जी ने अपना दिल और झोली किसान के लिए
खोल दी है लेकिन बाकी को बजट से लाभ के नाम पर 'पकौड़ा कारोबार' और 'भीख मांगने के जॉब' में
उतरने को प्रेरित कर दिया है।


कुछ समय तक अर्थव्यवस्था की हर रिपोर्ट, हर खबर किसान की बुरी हालत बता रही थी। पहले दो साल सूखा, फिर नोटबंदी और अब फसलों के दाम में गिरावट से किसान की कमर टूट चुकी है। हजारों की संख्या में जो 'पकौड़ा कारोबार' और 'भीख मांगने का जॉब' भी न पा सके, उन्होंने सल्फास या ऐसा कोई सस्ता कीटनाशक खाकर अपनी जान दे दी। संभव है कि जेटली के इस बजट से उनकी आत्मा को शांति पहुंचेगी और उनके घर वाले मोदी के सरकारी विकास के नए बिजनेस मॉडल से अपनी जान बचाने की कोशिश करें।



पिछले चार साल से किसानों की समस्याओं के नाम पर मोदी सरकार के कान पर जूं नहीं रेंग रही थी लेकिन पिछले कुछ महीनों में हालात बदल गए। देशभर से किसान असंतोष और आंदोलन के समाचार आए और देशभर के किसान संगठनों ने एक मंच पर इकट्ठे होकर दिल्ली में अभूतपूर्व 'किसान मुक्ति संसद' में अपना शक्ति प्रदर्शन किया।

गुजरात के चुनाव परिणामों ने बीजेपी को समझा दिया है कि किसानों की नाराजगी मोल लेना महंगा पड़ सकता है। संघ परिवार का भी यही मानना रहा है कि अब अगर सरकार को अगला चुनाव जीतना है तो यह किसानों को रिझाने का अंतिम मौका है। अब सवाल यह है कि इस बजट में किसान समर्थक घोषणाएं हैं वे किस सीमा तक व्यवहारिक होंगी? वे सच्ची होंगी या बनावटी? किसान की
झोली में न सिर्फ अच्छे-अच्छे डायलॉग ही गिरे वरन बजट की काफी बड़ी राशि भी देने का वादा किया गया? अभी भी किसान के हाथ में सिर्फ झुनझुना ही है या कुछ और भी?

समस्या नई नहीं है कि किसान को अपनी मेहनत का दाम नहीं मिल रहा है। कहने को तो सरकार हर साल दो बार न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन देश के छह प्रतिशत किसानों को ही यह भाव नसीब हो पाता है। ऐसा क्यों है क्या इस बारे में कभी सोचा गया? क्यों अधिकांश किसानों को मंडी में मजबूरी में अपनी फसल इस न्यूनतम से भी सस्ते भावों में बेचनी पड़ती है।

जानकारों का अनुमान है कि इस साल खरीफ की फसल में ही किसानों को सरकारी भाव से नीचे बेचने पर 32 हजार करोड़ रुपए का घाटा हुआ। जिसे सरकारी दाम मिल रहा है, वह भी सरकारी लूट से अछूता नहीं है क्योंकि सरकारी रेट में कोई बचत नहीं है। चुनाव से पहले प्रधानमंत्री ने देश के किसानों को वादा किया था कि वे उन्हें लागत का डेढ़ गुना दाम दिलवाएंगे। बजट से पहले तक तो वे ऐसा नहीं कर पाए लेकिन अब उन्हें ऐसा नहीं करना पड़ा। क्योंकि यह बजट सरकार के लिए अपना वादा निभाने
का अंतिम मौका है।

सरकार या तो मध्य प्रदेश सरकार की तर्ज पर भावांतर भुगतान योजना शुरू करेगी या फिर 'मार्केट एश्योरेंस स्कीम' (एमएएस) जैसी योजना लाएगी। इस तरह की योजनाओं के तहत सरकार गेहूं और धान के अलावा बाकी फसलों की खरीद भी कर सकेगी। जब भी किसी फसल का भाव सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य से नीचे गिरेगा, तब सरकार बाजार में दखल देकर फसल की खरीद करेगी, ताकि किसान को घाटा न उठाना पड़े। यहां तक बात अच्छी है लेकिन अब सवाल उठता है कि खरीद का पैसा कौन सी सरकार देगी?

केंद्र सरकार ने कुछ महीने पहले ही राज्यों को इस तरह की योजना का एक प्रारूप भेजा था, उसके मुताबिक इस अतिरिक्त खरीद का सिर्फ 30 प्रतिशत बोझ केंद्र सरकार उठाएगी, बाकी खर्चा राज्य सरकार को करना होगा। लेकिन मुसीबत यह है कि अधिकतर राज्य सरकारों के खजाने खाली ही रहते हैं। अब तो सरकार ने फल-सब्जी उत्पादकों को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने का फैसला
किया है।

भावांतर भुगतान योजना का मूल सिद्धांत यह है कि अगर किसान को न्यूनतम सरकारी दाम नहीं
मिलता है तो नुकसान की भरपाई राज्य सरकार करेगी। लेकिन मध्य प्रदेश का अनुभव बताता है कि इस स्कीम से किसान को फायदा नहीं हुआ, बल्कि इसके बहाने बिचौलियों और व्यापारियों की चांदी हुई।

जैसे ही यह योजना शुरू हुई, व्यापारियों ने उन फसलों का रेट गिरा दिया और जिस दिन इस योजना का समापन हुआ, उसके अगले दिन दाम चढ़ गया। ठगी गई सरकार, ठगा गया किसान। वहीं, इस योजना में किसान के लिए इतनी कागजी कार्रवाई की अनिवार्यता थी कि सिर्फ एक-तिहाई किसान ही अपना नाम रजिस्टर करवा पाए।

साथ ही, हर किसान के लिए अधिकतम फसल उत्पादन की सीमा लगा दी गई थी, जो कई फसलों में सामान्य उपज से भी कम थी। नतीजा यह हुआ कि किसान को सामान्य से कम दाम मिले और समय पर मुआवजा भी नहीं मिला। लेकिन जेटली ऐसी ही योजनाएं ला रहे हैं, देखें अब किसानों के नाम पर क्या होता है?

अगर सरकार किसानों की अवस्था और अपने वादे के बारे में जरा भी गंभीर है, तो फसलों का वाजिब
दाम दिलवाने के कई प्रयास साथ करने होंगे। सरकारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य को कम से कम लागत का ड्योढ़ा करना होगा। यह सभी कृषि उत्पाद के लिए घोषित करना पड़ेगा। अन्न, दलहन, तिलहन आदि के अलावा फल-सब्जी, वन उपज, दूध और अंडा सब का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित
किया जाए।

इतना ही नहीं, सरकार इस दाम पर फसलों की खरीदी सुनिश्चित करने के लिए हर ब्लॉक में फसल
खरीद केंद्र बनाए और इस खरीद का दाम केंद्र सरकार दे। यह भी निश्चित किया जाए कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीची बोली मंडी में ना लगे और अगर इससे व्यापारी को घाटा हो, तो उसे भी
सरकार भुगतान करे।

बेहतर होगा कि सरकार अपनी आयात-निर्यात नीति में संशोधन करे। जब फसल ज्यादा हो, तो निर्यात की खुली छूट और गंभीर किल्लत होने पर ही आयात किया जाए। अगर इस बजट में सरकार इन प्रस्तावों को लागू करने का साहस दिखाती है, तो ही किसानों को राहत मिलेगी और सरकार को किसान का समर्थन भी मिलेगा।

लेकिन सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह की योजनाओं का लाभ सीमांत और छोटे किसानों को भी मिले तभी किसानों का भला संभव हो सकेगा।

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