बीजिंग ओलिंपिक की मशाल को दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत माला माउंट एवरेस्ट पर ले जाने की चीन की महत्वाकांक्षा आखिरकार पूरी हो गई। यह चीन के लिए यादगार लम्हा होने के साथ-साथ मशाल रिले के लिए भी अविस्मरणीय उपलब्धि है।
इस साल अगस्त में होने वाले ओलिंपिक खेलों के शुरू होने से तीन महीने पहले 31 सदस्यीय मशालवाहक पर्वतारोही दल ने गुरुवार को ओलिंपिक ज्योति को लालटेन के जरिये एवरेस्ट की 29 हजार 30 फिट ऊँची चोटी पर ले जाकर मशाल को प्रज्वलित किया।
इसके साथ ही लाल वेशधारी पर्वतारोहियों की भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा और वे खुशी से झूम उठे। मशालवाहक दल में शामिल बीजिंग में पढ़ने वाले छात्र हुआंग चुंगी ने तिब्बती महिला पर्वतारोही सीरेन वांगमू को मशाल ज्योति सौंपी जिसने उसे मंजिल तक पहुंचाया।
इतिहास में यह पहली बार है जब ओलिंपिक खेलों की मशाल को एवरेस्ट पर ले जाया गया है। दुनिया में जगह-जगह विरोध प्रदर्शनों के कड़वे अनुभवों की गवाह रही ओलिंपिक मशाल का 'विश्व की छत' पर पहुँचना चीन के लिए सपना सच होने जैसा है।
शून्य से 30 डिग्री नीचे तापमान के बीच छह घंटे तक मुश्किल चढ़ाई करके यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने के बाद मशाल वाहकों ने उत्साह के साथ 'बीजिंग आपका स्वागत करता है' और तिब्बती भाषा के शुभकामना संदेश 'ताशी देलेक' के नारे लगाए।
इससे पहले मौसम की खराबी की वजह से मशाल को एवरेस्ट पर ले जाने के काम में खलल पड़ा था। भारी बर्फबारी की वजह से निर्धारित रास्ते बंद हो जाने के साथ-साथ मशालवाहक पर्वतारोहियों के शिविर भी नष्ट हो गए थे।
मशालवाहक दल में 22 तिब्बतियों समेत 31 सदस्य थे, जिन्हें बंद हुए रास्तों को फिर से खोलने और क्षतिग्रस्त हुए शिविरों की मरम्मत के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी थी।
बुधवार को साफ मौसम के बीच पर्वतारोहियों ने 7790 मीटर ऊँचाई पर स्थित अपने शिविर को समेटकर आखिरी पड़ाव यानी एवरेस्ट की तरफ कदम बढ़ाए थे। मशाल को एवरेस्ट पर पहुँचाने की मुहिम के दौरान सुरक्षा के भी कड़े बंदोबस्त किए गए थे।
मशाल को एवरेस्ट के अंतिम पड़ाव पर ले जाने के दौरान ओलिंपिक आयोजकों ने मुख्य मशाल रिले को भी रोक दिया था। एवरेस्ट पर ले जाई गई मशाल ज्योति को संभवतः जून के मध्य में ल्हासा से गुजरने के दौरान मुख्य रिले की मशाल में समाहित कर दिया जाएगा।
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