विश्व चैम्पियन विश्वनाथन आनंद ने भारत को शतरंज के मामले में 'पुनर्जागरण' की तरफ बढ़ता हुआ देश करार देते हुए इस खेल को व्यापक रूप से बढ़ावा देने की जरूरत पर जोर दिया है।
आनंद ने टेलीविजन चैनल सीएनएन-आईबीएन को दिए गए साक्षात्कार में कहा कि हम शतरंज खिलाड़ियों और इस खेल के चाहने वालों का एक बड़ा परिवार बना रहे हैं। इस खेल को जनता के खेल के रूप में स्थापित करने की जरूरत है।
मेरा मानना है कि शतरंज का खेल निश्चित रूप से आगे बढ़ रहा है। इस खेल को निरन्तर बढ़ावा देना जरूरी है, मगर इसके लिए कड़ी मेहनत करना जरूरी है। हमें शतरंज को और लोकप्रिय बनाने की हर मुमकिन कोशिश करनी होगी।
भारत द्वारा विश्व शतरंज को 17 ग्रैंड मास्टर दिए जाने का जिक्र करते हुए आनंद ने कहा कि भारतीयों में शतरंज के प्रति खास लगाव और उसे खेलने की विशेष क्षमता है। उन्होंने हालाँकि शतरंज की क्रिकेट से तुलना करने से परहेज किया।
आनंद ने कहा कि भारत में क्रिकेट का खेल लोगों की जिन्दगी का हिस्सा सा बन चुका है। हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा। 38 वर्ष की उम्र में भी शतरंज के प्रति उसी पुराने उत्साह के पीछे छुपी प्रेरणा के बारे में पूछे जाने पर विश्व चैम्पियन ग्रैंड मास्टर ने कहा कि वह इस खेल का लुत्फ लेते हैं और यह देखना चाहते हैं कि वह कितने लम्बे समय तक इसे खेल पाएँगे।
उन्होंने कहा यह मेरे लिये चुनौती है। अगर मैं सर्वोच्च स्तर पर प्रतिद्वंदियों को टक्कर देकर नम्बर एक का ताज बरकरार रख पाया हूँ तो मेरे लिए यह कड़ी मेहनत का नतीजा है। अब देखना यह है कि मेरा यह सुहाना सफर कब तक जारी रहता है।
शतरंज के किस हद तक मानसिक दृढ़ता और मनोविज्ञान का खेल होने के बारे में पूछे जाने पर आनंद ने कहा कि खिलाड़ी की मनःस्थिति ही प्रतिद्वंदी पर दबाव बनाने का प्रमुख हथियार होती है। उन्होंने कहा कि प्रतिद्वंदी को लेकर पसंद और नापसंद जैसे मानसिक कारक भी निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।
आनंद ने कहा निश्चित रूप से इससे खेल पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने में मदद मिलती है। जब मैं किसी व्यक्ति को नापसंद करता हूँ तो मैं उसके खिलाफ कभी गलती नहीं करना चाहता। (वार्ता)
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