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संपूर्ण बहिष्कार से कम कुछ नहीं
-स्वरूप बाजपेय
दक्षिण अफ्रीका का क्रिकेट ही नहीं, खेलों से संपूर्ण बहिष्कार एक वक्त में हो चुका है। क्रिकेट में बिल लॉरी की कप्तानी में आखिरी बार कोई क्रिकेट टीम (ऑस्ट्रेलिया) 1969-70 में दक्षिण अफ्रीका गई थी और उसके बाद लगभग दो दशकों तक अफ्रीकी टीम क्रिकेट बिरादरी से बहिष्कृत रही थी।

तब पाकिस्तान देश सरीखा 'आतंकवादी' जुनून तो कम से कम दक्षिण अफ्रीकी गोरों के सिर पर सवार नहीं था, वह रंगभेद था। अब तो हद ही हो गई है, वर्तमान सदी में पाकिस्तान में फैली अशांति, असंतोष एवं आतंकी घटनाओं के चलते ऑस्ट्रेलिया, वेस्टइंडीज या इंग्लैंड की टीमें तो पाकिस्तान जाने से कतराती रही हैं।

हम अर्थात श्रीलंका, बांग्लादेश और विशेषकर भारतीय टीम ही एशियाई दोस्ताना निभाती चली आ रही थी। भारतीय टीम ही वह टीम है जो एक क्रिकेट सत्र में पाकिस्तान जाती और फिर अगले सत्र में पाकिस्तान टीम की मेजबानी करती रही है। इसी सत्र में हमने वहाँ जाने से मना किया था।

नवंबर में मुंबई में घटी आतंकी घटनाएँ इसका कारण रही थीं। और श्रीलंकाई टीम बन गई जाकर बलि का बकरा, जब अन्य टीमों ने पाकिस्तान जाने से इंकार किया था। जरूरत अब सिर्फ इसी बात की है कि भारतीय क्रिकेट के आईपीएल, आईसीएल संस्करणों से पाकिस्तान के क्रिकेट नाम खारिज किए जाने चाहिए। इससे भी आगे जाकर खेल जगत को 'संपूर्ण बहिष्कार' की ही बात करना चाहिए जैसा कि दक्षिण अफ्रीका के साथ किया गया था।
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