- शराफत खान अनिल कुंबले के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा के बाद एक ऐसे अध्याय का समापन हुआ, जो न केवल भारतीय क्रिकेट बल्कि विश्व क्रिकेट का भी अहम हिस्सा रहा है।अनिल कुंबले सिर्फ एक गेंदबाज ही नहीं बल्कि वे विश्व क्रिकेट में स्पिन गेंदबाजी की एक परंपरा हैं। शेन वॉर्न और मुथैया मुरलीधरन के साथ कुंबले ने स्पिन गेंदबाजी को उस ऊँचाई पर पहुँचाया है, जिसका ख्वाब हर क्रिकेटर देखता है।कुंबले ने वॉर्न और मुरली के साथ ऐसी तिकड़ी बनाई, जिसकी मिसाल सदियों तक दी जाएगी। इन तीनों गेंदबाजों ने मिलकर टेस्ट क्रिकेट में दो हजार से ज्यादा विकेट लिए हैं और अभी मुरली खेल में बने हुए हैं। क्रिकेट को बल्लेबाजों का खेल कहा जाता है, लेकिन कुंबले, मुरली और वॉर्न की प्रतिभा और उपलब्धि देखकर स्पिन गेंदबाज बनने के कई युवा खिलाड़ी तलबगार हैं।कुंबले की उपलब्धियों के जिक्र में फिरोजशाह कोटला मैदान पर एक पारी में 10 विकेट लेने के रिकॉर्ड की चर्चा सबसे पहले होती है। कुंबले का टेस्ट रिकॉर्ड उनके महान गेंदबाज होने का प्रमाण है। 132 टेस्ट में 619 विकेट लेना हँसी खेल नहीं है। 35 बार पारी में पाँच विकेट और 8 बार मैच में दस विकेट लेने के आँकड़े उनकी क्षमता का परिचायक हैं। कुंबले ने मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी में अगस्त 1990 में इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर में अपना पहला टेस्ट खेला। ड्रॉ रहे इस टेस्ट में कुंबले ने तीन विकेट चटकाए थे। एलन लैंब उनका पहला शिकार रहे।कुंबले ऐसे चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने कप्तान रहते हुए अपने क्रिकेट करियर को अलविदा कहा। वे इमरान खान के बाद ऐसा करने वाले संभवत: दूसरे एशियाई क्रिकेटर हैं।कुंबले ने कई बार मजबूत लग रही विपक्षी टीम को जोरदार झटके दिए हैं। कुंबले का रिकॉर्ड रहा है कि वे अपने पहले स्पैल से अधिक घातक दूसरे और तीसरे स्पैल में रहे हैं। अजहर तो कुंबले को निचले क्रम के बल्लेबाजों का काल कहते थे। कुंबले ने कई बार निचले क्रम के बल्लेबाजों को अपने कातिल स्पैल का शिकार बनाया है।कुंबले कलाई के जादूगर नहीं हैं, लेकिन फिर भी अपनी सीधी गेंदों से वे बल्लेबाज को चकमा देने की कला खूब जानते हैं। ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज मार्क वॉ ने 90 के दशक में एक बार लेग स्पिन पर बात करते हुए कहा था- वर्तमान में खेल रहे तीनों लेग स्पिनर (शेन वॉर्न, अनिल कुंबले और मुश्ताक अहमद) में वॉर्न और मुश्ताक श्रेष्ठ हैं। वास्तव में कुंबले को तो मैं स्पिनर ही नहीं मानता। वॉ ने शायद इसलिए ऐसा कहा हो, क्योंकि कुंबले कलाई से गेंद नहीं घुमाते, बल्कि अपनी लाइन और लेंग्थ से कमाल दिखाते हैं। वे वॉर्न की तरह फ्लिपर तो नहीं मार सकते, लेकिन अपनी गेंद को तेजी से अंदर लाकर बल्लेबाज को पगबाधा या बोल्ड करने की काबिलियत रखते हैं। साथ ही वे बीच-बीच में गुगली का बेहतरीन इस्तेमाल करते हैं। कुंबले का रिकॉर्ड मार्क वॉ जैसे आलोचकों के लिए करारा तमाचा है। कुंबले 18 साल तक भारतीय टीम का हिस्सा रहे हैं, लेकिन इस दौरान एक बार भी टीम ने उन्हें पिछले प्रदर्शन के आधार पर ढोया नहीं है, बल्कि हर बार उन्होंने प्रदर्शन करके खुद को साबित किया है। |
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