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'खामोश कातिल' की उड़ान थमी
- सुशील दोषी

एक न एक दिन तो यह होना ही था। नई दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान पर जम्बो की उड़ान आखिर थम गई। अनिल कुंबले ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा क्या की, क्रिकेटप्रेमी देश भारत में स्तब्धता छा गई। कार्यकाल गुजरने के बाद ही कलाकार की श्रेष्ठता बखान करने की परंपरा वाले इस देश में अब पता नहीं कितनी टिप्पणियाँ लिखी जाएँगी।

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132 टेस्ट में 619 टेस्ट विकेटों का अनोखा कीर्तिमान रचने वाले भारतीय टेस्ट क्रिकेट के इस महानतम योद्धा के ऊपर हमारे कुछ 'बुद्धिमान' पूर्व खिलाड़ी व समालोचक रिटायर होने के लिए दबाव बना रहे थे। जब जम्बो ने अपनी उड़ान स्वयं थाम ली है, तो ये ही लोग कह रहे हैं कि अभी उन्हें कुछ और समय तक खेलना चाहिए था।

गेंदबाज के साथ कभी न्याय नहीं होता है, इसीलिए कपिल देव से लेकर इयान बॉथम तक यही कहते हैं कि क्रिकेट बल्लेबाजों का खेल है। शतक बनाने वाले का जो गुणगान होता है, वह एक पारी में 5 विकेट झपटने वाले का नहीं होता। जबकि सत्य यह है कि बल्लेबाज मैच बचाते हैं, जबकि गेंदबाज मैच जिताते हैं।

एक टेस्ट मैच की 2 पारियों में 20 विकेट लिए बिना आप मैच कैसे जीतेंगे? और अनिल कुंबले ने जितने मैच भारत को अकेले अपने ही दम पर जिताए हैं, उतने किसी अन्य खिलाड़ी ने नहीं। इनमें आप सचिन तेंडुलकर, कपिलदेव को भी शामिल कर सकते हैं। इसके बावजूद जो सितारा हैसियत सचिन तेंडुलकर, राहुल द्रविड़ या धोनी को हासिल हुई, उससे अनिल कुंबले वंचित रहे।

पर इन सब बातों से बेअसर रहकर 'खामोश कातिल' अनिल कुंबले ने अपना निर्मम काम जारी रखा। वह काम था दुनियाभर के श्रेष्ठतम बल्लेबाजों की रातों की नींद व दिन का चैन छीन लेना। जिम लेकर के बाद टेस्ट क्रिकेट इतिहास के वे दूसरे ऐसे गेंदबाज बने, जिन्होंने एक पारी में सभी 10 विकेट हासिल किए हों। यह चमत्कार उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ फिरोजशाह कोटला मैदान पर ही दिखाया था और यहीं पर अब उन्होंने संन्यास लेने की घोषणा भी कर दी।

मुझे याद है जब उन्होंने भारतीय स्पिन गेंदबाजी की कमान संभाली थी, कई पूर्व टेस्ट खिलाड़ी उनका उपहास उड़ाते थे। 'यह तो ऐसा स्पिनर है, जो गेंद को स्पिन ही नहीं करता' - वे व्यंग्य करते थे। पर अनिल कुंबले ने लेग ब्रेक, गुगली, टॉप स्पिन व 'फ्लिपर' का ऐसा मायाजाल बुना कि विश्व के श्रेष्ठतम बल्लेबाज उनसे खौफ खाते रहे। उन्होंने अपने जवाब में ही प्रश्न डाल दिया कि गेंद को स्पिन करना ज्यादा जरूरी है या विकेट लेना। वक्त के साथ ही व्यंग्य करने वाले खिसिया गए।

उनकी फिलासफी बस यही थी कि बल्लेबाजों पर निरंतर हमला करना चाहिए। उसे बस राहत की साँस नहीं लेने देना है। अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में भी कई उतार-चढ़ाव से गुजरे अनिल कुंबले ने हमेशा एक अनुशासित सिपाही की भूमिका निभाई। व्यक्तिगत जिंदगी को अपने खेल संसार व खबरों से अलग रखा। कुंबले भले ही प्रसन्ना की तरह गेंद को फ्लाइट न कराते हों, भले ही बिशन बेदी की कलात्मकता न दिखाते हों पर चन्द्रशेखर की तरह 'मैच विनर' बनने की ललक हमेशा दिखाते रहे।

दुनिया किसी 'कातिल' को प्यार से याद रखना नहीं चाहती। अनिल कुंबले इसका अपवाद हैं। इस 'खामोश कातिल' को ही क्रिकेट की दुनिया अपने मन में हमेशा सँजोकर रखेगी, क्योंकि यह 'खामोश कातिल' मैदान पर भले ही बल्लेबाजों का अंत करता हो, बाहर शरीफ आदमी ही रहा है। वह तो भारतीय क्रिकेट के स्वाभिमान का प्रतीक भी है। (लेखक हिन्दक्रिकेकमेंट्रजानेमानहस्ताक्षहैं)
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