अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद जिम्बाब्वे मसले पर गुरुवार को भी किसी फैसले पर नहीं पहुँच पाई और इस पर बने गतिरोध के कारण क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था के कार्यकारी बोर्ड की शुक्रवार को फिर बैठक होगी।
आईसीसी के एक शीर्ष अधिकारी ने बीसीसीआई की अगुआई में एशियाई गुट जिम्बाब्वे का पक्ष ले रहे हैं, जबकि इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका राजनीतिक संकट के कारण उसे आईसीसी से बाहर करने के लिए दबाव बना रहे हैं।
आईसीसी के सभी पूर्णकालिक दस देशों की सहमति न बन पाने के कारण कार्यकारी बोर्ड की बैठक एक दिन के लिए बढ़ा दी गई है।
दक्षिण अफ्रीका ने जिम्बाब्वे के साथ द्विपक्षीय संबंध समाप्त कर दिए हैं। इसके बाद इंग्लैंड ने भी रॉबर्ट मुगाबे के फिर जिम्बाब्वे का राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उसका अनुसरण किया।
बीसीसीआई सचिव निरंजन शाह पहले ही साफ कर चुके हैं कि भारत जिम्बाब्वे को बाहर करने के किसी भी कदम का समर्थन नहीं करेगा। भारत के फैसले का पाकिस्तान और श्रीलंका ने भी समर्थन किया है।
इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका को अपना प्रस्ताव पारित करवाने के लिए दो तिहाई बहुमत दस सदस्यों में से सात मत चाहिए। यह पता नहीं चला है कि जिम्बाब्वे को मत देने की अनुमति दी जाएगी या नहीं।
यदि जिम्बाब्वे इस संकट से बचकर आईसीसी का पूर्णकालिक सदस्य बना रहता है तो इंग्लैंड अगले साल होने वाले ट्वेंटी-20 विश्व कप की मेजबानी गँवा सकता है, क्योंकि ब्रिटिश सरकार संभवतः जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों को वीजा नहीं देगी।
जिम्बाब्वे हालाँकि टेस्ट क्रिकेट से फिलहाल निलंबित है, लेकिन उसकी टीम एकदिवसीय टूर्नामेंट में लगातार भाग ले रही है।
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