सिंहस्थ में दान: क्या, क्यों और कैसे

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पौराणिक मान्यता के अनुसार चारों युग के धार्मिक कृत्य प्रमुख रूप से अलग-अलग कहे गए हैं। सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलयुग में दान को प्रमुख बताया गया है। वैदिक ग्रंथों में दान की महिमा कही गई है। इस युग में गोदान, रथ, अश्व, ऊंट, और दासियों का दान किया जाता था।



ऋग्वेद में कहा गया है- जो गायों या दक्षिणा का दान करता है, वह स्वर्ग में उच्च स्थान प्राप्त करता है। सुपात्र को ही दान देना चाहिए। जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा है- दानं परं किं च सुपात्र दत्तम्‌- श्रेष्ठदान वहीं है जो सुपात्र को दिया जाए। पुराने मनीषियों ने कहा है कि धन की तीन गति होती है-दान, भोग और नाश। जो व्यक्ति न दान करता है, न भोग करता है उसका धन तीसरी गति को प्राप्त हो जाता है-नष्ट हो जाता है।
 
इतिहास और पुराण ग्रंथों में दान देने वाले देवताओं, दानवों, ऋषि-महर्षियों, और राजा की प्रशंसा में बहुत कुछ कहा गया है। धर्मराज युधिष्ठिर, महर्षि दधीचि, महारथी कर्ण और महाराज शिवि के दान की प्रशंसा में पुराणों में बहुत कुछ कहा गया। 
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