यात्रा संस्मरण : मेरी दक्षिण की यात्रा

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डॉ. मधु संधु  
 
कम्प्यूटर में माय पिक्चर्स का स्लाइड शो खोले बैठी हूं। बीच-बीच में मल्टी मीडिया भी चला लेती हूं। सब बहुत अच्छा लग रहा है। पिछली यात्रा की एक-एक स्मृति जीवंत हो रही है। मन का उत्साह फूट-फूट पड़ता है। मुझे केरल जाना है, तमिलनाडू, दिल्ली जाना है, राजधानी दिल्ली से फ्लाइट है। नेट पर एक-एक शहर का टेम्परेचर देखती हूं। पैकेज के अनुसार होटलों के नाम पढ़ती हूं। दर्शनीय स्थलों का विवरण समझती हूं। घर की धारावाहिक उबाऊ दिनचर्या से छुटकारे तथा घूमने की कल्पना और एडवेंचर ने चिंतन को थोड़ा स्वप्निल बना दिया है।
शुक्रवार शाम 4 बजे चली गाड़ी अगली सुबह दिल्ली पहुंची। वहां से साढ़े 8 की फ्लाइट है, जिसे एक बजे कोचीन पहुंचना है। यानी कोई साढ़े चार घंटे लम्बा सफर। बादलों की इतनी मोटी परतें। हवाई जहाज में बैठकर ही पता चलता है, कि उल्टे-सीधे बादल एक समान ही होते हैं। बर्फ के पहाड़ों से सफेद, धुंए से स्लेटी और काले।
 
जब अमृतसर में घर के टैरेस से नीले-स्लेटी की बजाय लाल जहाज दिखाई देने लगे, तो अनुमान था, कि डोमेस्टिक फ्लाइट के इंटरनेशनल होते ही निजी कंपनियों के जहाज आ रहे होंगे- किंगफिशर, जेट एयरवेज वगैरह, पर हवाई अड्डे पर तो लाल रंग का ही आधिपत्य दिखाई दिया। जगह-जगह खड़े लाल रंग के जहाज और लाल सीढ़ियां।
 
कोचीन की गर्मी ने जैसे ही ऊपर के कोट, स्वैटर उतरवाए, तो सामान के नग बढ़ने लगे। आधा घंटा चैक-आउट में लग ही गया। दस-एक मिनट बाद बेल्ट चली। सामान उतारकर, ट्रॉली में रखा। निकलते ही ट्रैवल एजेंट, नाम की तख्ती लिए इंतजार करता मिल गया। होटल 'सी-लार्ड' हवाई अड्डे से तीस किलो मीटर दूर था- यानी कुल मिलाकर उत्तर भारत से दक्षिण भारत पहुंचने का कोई चौबीस घंटे लम्बा सफर। अगर सीधी फ्लाइट होती, तो शायद 6-7 घंटे ही लगते। ट्रेवल एजेंट ने एक टैक्सी वाले से कुछ विमर्श किया और हम उसमें आ बैठे। होटल तक पहुंचने में ज्यादा समय ही लगा होगा। होटल के रिसेप्शन पर 6 देशों का समय बता रही घड़ियां लगी थी। होटल का कमरा इतना खूबसूरत और स्वच्छ-सुगन्धित, कि उसे देखते ही थकान दूर होने लगी। आश्चर्य कि जनवरी में भी यहां ए.सी. चल रहे थे। अरब महासागर की महारानी कोचीन के बैक वाटरज के सामने ही होटल- 'सी-लार्ड' था। मरीन ड्राइव की भीड़ भरी सड़क थी। थोड़ा आराम करने के बाद शाम को हम मरीन ड्राइव के समुद्री किनारे पहुंचे, तो नौकाएं आ-जा रही थी। हम भी एक नौका में बैठ गए। इस यात्रा का यह प्रथम नौका विहार था। शाम धुंधला चुकी थी, ठंडी और तेज हवाएं चल रही थी। बन्दरगाह के इस एक घण्टे के नौका बिहार में हमने अनेक जहाज देखे, रिफाइनरी, शिप यार्ड, जहाज फैक्टरी, ठाठें मार रहा समुद्र देखा, पानी में फैले हुए जाल और बाहर बिकती मछलियां देखी। पंजाब की जानलेवा सर्दी बहुत पीछे छूट चुकी थी। गर्मियों के हल्के फुल्के कपड़ों में समुद्री हवाएं काफी सुहानी लग रही थी।
 
अगले दिन रविवार हम सबसे पहले डच पैलेस देखने गए, जो हमारे होटल से कोई आठ किलोमीटर दूर था। 1447 से लेकर कोई अठारवीं शताब्दी तक के वर्मा शासकों की प्रतिमाएं और हथियार यहां देखने को मिले। यहां से पीछे की सड़क ज्युइश पैलेस को जाती थी। ध्यान, गाड़ी के ऊपर बंधे सामान में भी बार-बार अटक रहा था, पर विश्वास, मोबाइल और पास में पड़ी टिकटों का सहारा था। सारा बाजार तरह-तरह के सामान की दुकानों से सजा था। जिसकी तरफ विदेशी यात्री आकर्ष‍ित भी हो रहे थे। यहां हमें एक बहुत बड़ी दुकान ऐसी भी दिखाई दी, जिसमें इस प्रदेश की सौगातें- काली मिर्च, इलायची, तरह- तरह के मसाले और दवाइयां ही नहीं, पानी के जहाज, मछली पकड़ने के जाल वगैरह भी पड़े थे। ज्यूइश चर्च में बच्चे को पेट से बांधे अंग्रेज युवती बड़ी भली लग रही थी। मुड़-मुड़ कर देखने से खुद को रोक पाना मुश्किल लग रहा था।
 
कोई डेढ़ बजे हमारा पांच घण्टे का मुनार का लम्बा पहाड़ी सफर शुरू हुआ। हर तरफ टाटा के चाय बागान, गहरी खाइयां, मारथन रेस की तरह दौड़ रहे चोटियों पर खड़े पहाड़ी रबड़ व नारियल के पेड़ थे और जगह-जगह चिमनियों से उठ रहा धुंआ था। ड्राइवर का प्रयास यही था, कि रात होने से पहले गंतव्य तक पहुंच जाएं, अन्यथा रात होते ही यहां के घने जंगलों से हाथी निकल कर नुकसान पहुंचा सकते हैं। होटल आबादी से बहुत दूर था। डिनर के बाद जैसे ही होटल से बाहर निकले, उनका एक कर्मचारी हमारे साथ हो लिया- कहीं जाइएगा नहीं, रात को यहां हाथी आते हैं। और जब तक हम अंदर नहीं आ गए, वह हमारे साथ ही रहा। इस लॉस पाम होटल की विशेषता इसकी इंटीरियर सजावट थी। छत पर पार्क था जिसमें रूफ टॉप रेस्टोरेंट और झूला था।

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