इस तरह जानिए शुभ मुहूर्त क्या है...

अनिरुद्ध जोशी|
किसी भी कार्य का प्रारंभ करने के लिए लग्न और मुहूर्त को देखा जाता है। जानिए वह कौन-सा वार, तिथि, माह, वर्ष लग्न, मुहूर्त आदि शुभ है जिसमें मंगल कार्यों की शुरुआत की जाती है।
'श्रेष्ठ दिन'
दिन और रात में दिन श्रेष्ठ है। वैदिक नियम अनुसार हर तरह का मंगल कार्य दिन में ही किया जाना चाहिए। अंतिम संस्कार और उसके बाद के क्रियाकर्म भी दिन में ही किए जाते हैं।

'श्रेष्ठ मुहूर्त'
दिन-रात के 30 मुहूर्तों में ब्रह्म मुहूर्त ही श्रेष्ठ होता है। पुराने समय में जब बिजली नहीं होती थी तो लोग जल्दी सो जाते थे और ब्रह्म मुहूर्त में उठकर कार्य करने लगते थे। जबसे बिजली का अविष्कार हुआ तब से व्यक्ति की दिनचर्या ही बदल गई। ब्रह्म मुहूर्त में उठने के कई शास्त्रों में बताए गए हैं।
'मुहूर्तों के नाम'
एक मुहूर्त 2 घड़ी अर्थात 48 मिनट के बराबर होता है। 24 घंटे में 1440 मिनट होते हैं। मुहूर्त सुबह 6 बजे से शुरू होता है:- रुद्र, आहि, मित्र, पितॄ, वसु, वाराह, विश्वेदेवा, विधि, सतमुखी, पुरुहूत, वाहिनी, नक्तनकरा, वरुण, अर्यमा, भग,गिरीश, अजपाद, अहिर, बुध्न्य, पुष्य, अश्विनी, यम, अग्नि, विधातॄ, क्ण्ड, अदिति जीव/अमृत, विष्णु, युमिगद्युति, ब्रह्म और समुद्रम।

'श्रेष्ठ वार'
सात वारों में रवि, मंगल और गुरु श्रेष्ठ है। इनमें भी गुरुको सर्वश्रेष्ठ इसलिए माना गया है क्योंकि गुरु की दिशा ईशान है और ईशान में ही देवताओं का वास होता है।
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'श्रेष्ठ चौघड़िया'
दिन और राज के मिलाकर 7 चौघडि़या होते हैं जो वार अनुसार दिन और रात में बदलते रहते हैं। ये चौघड़िया है- शुभ, लाभ, अमृत, चर, काल, रोग, उद्वेग। शुभ, और लाभ चौघड़िया को ही श्रेष्ठ माना गया है उसमें भी शुभ चौघड़िया सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसका स्वामी गुरु है। अमृत का चंद्रमा और लाभ का बुध है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। समयानुसार चौघड़िया को तीन भागों में बांटा जाता है शुभ, मध्यम और अशुभ चौघड़िया।
शुभ चौघडिया: शुभ (स्वामी गुरु), अमृत (स्वामी चंद्रमा), लाभ (स्वामी बुध)
मध्यम चौघडिया: चर (स्वामी शुक्र)
अशुभ चौघड़िया: उद्बेग (स्वामी सूर्य), काल (स्वामी शनि), रोग (स्वामी मंगल)

'श्रेष्ठ पक्ष'
महीने में 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं। कृष्ण और शुक्ल पक्षों के दो मास में शुक्ल पक्ष श्रेष्ठ है। चंद्र के बढ़ने को शुक्ल और घटने को कृष्ण पक्ष कहते हैं। शुक्ल की पूर्णिमा और कृष्ण की अमावस्या होती है। दोनों पक्षों में शुक्ल पक्ष को ही शुभ कार्यों के श्रेष्ठ माना जाता है।
'श्रेष्ठ एकादशी'
प्रत्येक पक्ष में एक एकादशी होती है इस मान में में दो एकादशी। प्रत्येक वर्ष 24 और अधिकमास हो तो 26 एकादशियां होती हैं। प्रत्येक एकादशी का अपना अलग ही लाभ और महत्व है। उनमें भी कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी श्रेष्ठ है। प्रदोष को भी श्रेष्ठ माना गया है।

'श्रेष्ठ माह'
मासों में चैत्र, वैशाख, कार्तिक, ज्येष्ठ, श्रावण, अश्विनी, मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन श्रेष्ठ माने गए हैं उनमें भी चैत्र और कार्तिक सर्वश्रेष्ठ है। हिन्दू मास के नाम:- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
'श्रेष्ठ पंचमी'
प्रत्येक माह में पंचमी आती है। उसमें माघ मास के शुक्ल पक्ष की बसंत पंचमी श्रेष्ठ है। सावन माह की नाग पंचमी भी श्रेष्ठ है।

'श्रेष्ठ अयन'
छह माह का दक्षिणायन और छह का उत्तरायण होता है। दक्षिणायन और उत्तरायण मिलाकर एक वर्ष माना गया है। सूर्य जब दक्षिणायन होता है तो देव सो जाते हैं और
उत्तरायण होता है तो देव उठ जाते हैं। अत: उत्तरायण श्रेष्ठ है।
'श्रेष्ठ संक्रांति'
सूर्य की 12 संक्रांतियों में मकर संक्रांति ही श्रेष्ठ है। सूर्यदेव जब धनु राशि से मकर पर पहुंचते हैं तो
मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। 12 संक्रांतियों में से चार- मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति महत्वपूर्ण हैं।

'श्रेष्ठ ऋ‍तु'
छह ऋतुओं में वसंत और शरद ऋतु ही श्रेष्ठ है। 1. बसंत ऋतु, 2.ग्रीष्म ऋतु, 3.वर्षा ऋतु, 4.शरद ऋतु, 5.हेमन्त ऋतु, 6.शिशिर ऋतु।
'श्रेष्ठ नक्षत्र'
27 होते हैं उनमें कार्तिक मास में पड़ने वाला पुष्य नक्षत्र श्रेष्ठ है। इसके अलावा अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रावण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, रेवती नक्षत्र शुभ माने गए हैं।

मुहूर्त दो तरह के होते हैं शुभ मुहूर्त और अशुभ मुहूर्त। शुभ को ग्राह्य समय और अशुभ को अग्राह्‍य समय कहते हैं। शुभ मुहूर्त में रुद्र, श्‍वेत, मित्र, सारभट, सावित्र, वैराज, विश्वावसु, अभिजित, रोहिण, बल, विजय, र्नेत, वरुण सौम्य और भग ये 15 मुहूर्त है।
रवि के दिन 14वां, सोमवार के दिन 12वां, मंगलवार के दिन 10वां, बुधवार के दिन 8वां, गुरु के दिन 6टा, शुक्रवार के दिन 4था और शनिवार के दिन दूसरा मुहूर्त कुलिक शुभ कार्यों में वर्जित हैं।

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