विदेशी लोग भारत में ही क्यों आध्यात्म की तलाश करने आते हैं?

अनिरुद्ध जोशी|
प्राचीनकाल से ही यूनानी, रोमन और अरबी लोग भारत में ज्ञान, और में आते रहे हैं।भारत में हिन्दूकुश पर्वतमाला दो संस्कृतियों का मिलन स्थल था। यहां प्राचीनकाल में कई गुरुकुल और आश्रम हुआ करते थे। अध्यात्म, चमत्कार और सिद्धियों के बारे में भारत की ख्याती दूर-दूर तक फैली थी। उपनिषद् और गीता पूर्णत: एक आध्यात्मिक पुस्तक है जोकि मनुष्य को सच्चे ज्ञान के मार्ग को बताती है। जिन्होंने भी इन्हें गंभीरता से पढ़ा और समझा है वही समझ सकता है कि सच्चा मार्ग क्या है।
और दर्शन दुनिया के अन्य धर्म और दर्शन से बिल्कुल अलग है। यह हरे-भरे फलों से लदे सुव्य‍वस्थित जंगल की तरह है। आत्मा की खोज तभी हो सकती है जबकि हम उसके स्वतंत्र अस्तित्व को मानते हैं, पुनर्जन्म को मानते हैं और जबकि हम ईश्वर के होने या नहीं होने के प्रति संदेश से भरे हैं। हमें इस अस्तित्व को और खुद को समझना है तो निश्चित ही एक ऐसे सच्चे ज्ञान की जरूरत होती है, जोकि हमें यह न बताए कि हमें क्या करना है और क्या नहीं, हमें किसे मानना है और किसे नहीं। बल्कि जो हमें यह बताए कि हम खुद को और इस अस्तित्व को कैसे जाने और यह कि हम कौन, क्यों और क्या हैं।

पश्‍चिमी धर्म आपको रेडिमेड उत्तर देते हैं। वहां सब कुछ निर्धारित कर दिया गया है कि ईश्वर एक ही है और और उसके ये संदेशवाहक हैं। कोई पूर्वजन्म नहीं होता है। प्रलय होगी और फिर सभी के साथ न्याय होगा। लेकिन भारतीय धर्म और दर्शन में ये सब नहीं के समान है। यहां मोक्ष को जानने और समझने का एक मार्ग है। यह बहुत मुश्किल से समझने में आता है कि हम एक मनुष्य हैं और हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि 'मैं कौन हूं', क्या मेरा अस्तित्व है, मरने के बाद भी क्या में रहूंगा? मनुष्य जन्म आपको कैसे मिला है यह जानना और इसके महत्व को तभी समझा जा सकता है जबकि हम दूसरों के द्वारा बताए गए उत्तर से मुक्त होकर खुद इसकी तलाश करें। पश्‍चिमी धर्मों ने लोगों के भीतर के प्रश्नों को लगभग मार दिया है। ऐसी कई वजहे हैं जबकि लोग अपने अपने कुओं से बाहर निकलकर अध्यात्म की तलाश में भारत आते हैं।

सबसे बेहतर वातावरण : प्राचीनकाल से ही भारतीय लोग साधना या ध्यान करने के लिए हिमालय की शरण में जाते रहे हैं। हिमालय की वादियों में रहने वालों को कभी दमा, टीबी, गठिया, संधिवात, कुष्ठ, चर्मरोग, आमवात, अस्थिरोग और नेत्र रोग जैसी बीमारी नहीं होती। हिमालय क्षेत्र के राज्य जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, अरुणाचय आदि क्षेत्रों के लोगों का स्वास्थ्य अन्य प्रांतों के लोगों की अपेक्षा बेहतर होता है। इसे ध्यान और योग के माध्यम से और बेहतर करके यहां की औसत आयु सीमा बढ़ाई जा सकती है। तिब्बत के लोग निरोगी रहकर कम से कम 100 वर्ष तो जीवित रहते ही हैं।

जब हम पश्चिमी ग्रंथों को पढ़ते हैं तो उसमें एक बात स्पष्ट हो जाती है कि स्वर्ग में सेवफल, फल और फुलों से लदे वृक्ष हैं। सुंदर-सुंदर स्त्रियां हैं, जंगल है और खासकर यह कि वहां देवता लोग रहते हैं। अब निश्चित ही बर्फिले और रेगिस्तान के लोगों के लिए यह कल्पना उचित ही जान पड़ती है। ऐेसे में सभी यहां आना चाहते होंगे। भारत के हिमालयी राज्य कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल, सिक्किम और अरुणाचल की स्थिति ऐसी ही है।

सिर्फ भारत में ही है उचित वातावरण और स्थान : भारत में ध्यान, योग और अध्यात्म विद्या सीखने के लिए अन्य देशों की अपेक्षा उचित वातावरण है। यहां एक ओर जहां हिमालय है, तो वहीं दूसरे छोर पर समुद्र। एक ओर जहां रेगिस्तान है, तो दूसरे छोर पर घने जंगल और ऊंचे-ऊंचे पहाड़। इसके अलावा कई प्राचीन आश्रम, गुफाएं और पहाड़ हैं, जहां जाकर तपस्या की जा सकती है या ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। अध्यात्म की इसी तलाश के लिए हजारों विदेशी यहां आकर भारत के वातावरण से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

भारत में बहुत सारी प्राचीन गुफाएं हैं, जैसे बाघ की गुफाएं, अजंता-एलोरा की गुफाएं, एलीफेंटा की गुफाएं और भीमबेटका की गुफाएं। अखंड भारत की बात करें तो अफगानिस्तान के बामियान की गुफाओं को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। भीमबेटका में 750 गुफाएं हैं जिनमें 500 गुफाओं में शैलचित्र बने हैं। यहां की सबसे प्राचीन चित्रकारी को कुछ इतिहासकार 35,000 वर्ष पुरानी मानते हैं, तो कुछ 12,000 साल पुरानी।

मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित पुरा-पाषाणिक भीमबेटका की गुफाएं भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ये विंध्य पर्वतमालाओं से घिरी हुई हैं। भीमबेटका मध्यभारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विंध्याचल की पहाड़ियों के निचले हिस्से पर स्थित है। पूर्व पाषाणकाल से मध्य पाषाणकाल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा।

देव स्थान : प्राचीन काल में हिमालय में ही देवता रहते थे। यहीं पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्थान था और यहीं पर नंदनकानन वन में इंद्र का राज्य था। इंद्र के राज्य के पास ही गंधर्वों और यक्षों का भी राज्य था। स्वर्ग की स्थिति दो जगह बताई गई है: पहली हिमालय में और दूसरी कैलाश पर्वत के कई योजन ऊपर।

मुण्डकोपनिषद् के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है। इनका केंद्र हिमालय की वादियों में उत्तराखंड में स्थित है। इसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुंच पाते हैं। अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माएं यहां प्रवेश कर जाती हैं। जब भी पृथ्वी पर संकट आता है, नेक और श्रेष्ठ व्यक्तियों की सहायता करने के लिए वे पृथ्वी पर भी आती हैं।

भौगोलिक दृष्टि से उसे उत्तराखंड से लेकर कैलाश पर्वत तक बिखरा हुआ माना जा सकता है। हालांकि उत्तराखंड की चार धाम यात्रा इसी हिमालयय के आसपास होती है़, जिसमें केदार, बद्री, गंगोत्री और यमुनोत्री आदि शामिल है। आध्यात्मिक शोधों के लिए, साधनाओं सूक्ष्म शरीरों को विशिष्ट स्थिति में बनाए रखने के लिए यह स्थान विशेष रूप से उपयुक्त है। इतिहास पुराणों के अवलोकन से प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र को देवभूमि कहा गया और स्वर्गवत माना गया है। यहां प्राचीन काल में देवी और देवता साक्षात रहते थे।

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