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स्वतंत्र इंडिया, परतंत्र भारत
स्व-तंत्र बड़ा ही खूबसूरत शब्द है। जिसने स्व का तंत्र पाया, वह है स्वतंत्र। क्या है स्व का तंत्र? तंत्र है तकनीक या ऐसी कुंजी जो आंतरिक संपदा का द्वार खोले। यह कुंजी कहीं बनी बनाई नहीं मिलती, यह हर एक को अपनी-अपनी गढ़नी पड़ती है। यह रेडीमेड नहीं है, कस्टम मेड है। जिसे यह तंत्र मिल गया, वह जिंदगी के तमाम बंधनों के बीच रहकर आजाद रहता है। वह मानो कीचड़ में रहते हुए खिलने का राज कमल से सीख लेता है। ऐसा निर्भय, निर्गुण, निरामय व्यक्ति है स्वतंत्र।

स्वतंत्रता बहुत बड़ा दायित्व है, फिर वह किसी भी तल पर हो। चाहे राजनैतिक, मानसिक या आत्मिक, स्वतंत्र होने का अर्थ है अपनी पूरी जिम्मेदारी उठाना। जो स्वतंत्र है, वह हारने के लिए स्वतंत्र है और जीतने के लिए भी, वह सुखी होने के लिए स्वतंत्र है और दुखी होने के लिए भी। अपनी दुर्गति के लिए वह किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकता। इसीलिए स्वतंत्र होने के लिए बहुत मजबूत कंधे चाहिए और प्रबल आत्मविश्वास, तभी वह स्वतंत्रता को कंधों पर संभाल सकता है।

इस मामले में यह देश लड़खड़ा गया है और वह आसेतु हिमाचल फैली हुई आबादी को साथ लेकर चल नहीं सका। उसके दो टुकड़े हो गए। इंडिया तो दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता चला गया और भारत अँधेरे में घिसटता रहा, पिछड़ता रहा। लेकिन हम नहीं भूलें कि भारत इंडिया का ही साया है। क्या इंडिया को अपने साये की फिक्र है? यदि नहीं है तो एक दिन साया इतना बड़ा हो जाएगा कि अपना वजूद प्रकट करके रहेगा।

ऐसे में क्यों न इस देश के जो भी खोजी व्यक्तिगत मुक्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं, वे इकट्ठे होकर अपनी आध्यात्मिक पूँजी को एकत्रित करें और इस पूरे देश को ही सामूहिक रूप से स्वतंत्र बना दें? यद्यपि यह स्वतंत्रता अलग किस्म की होगी। यह होगी गरीबों से, गंदगी से, अंधविश्वासों से, भ्रष्टाचार से और उन तमाम अँधेरों से, जो भारत को उपेक्षित साया बनकर जीने को बाध्य कर रहे हैं।

यदि इंडिया के लोग अपनी आर्थिक समृद्धि में मदहोश होकर अपनी मानसिक दरिद्रता को नहीं देख पा रहे हैं तो हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा उन्हें मानसिक तल पर आजाद करेगी। ताकि अपने ही साये के प्रति जड़ हुई उनकी मानसिकता हड़बड़ाकर जाग्रत हो जाए और आंतरिक फासलों को मिटाने की कोशिश करे। तभी हम वेदों का संदेश चरितार्थ कर सकते हैं : उत्तिष्ठ, जाग्रत, प्राप्तवरान्निबोधत।
 
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