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मायावती से दलितों का मोहभंग
-रामदत्त त्रिपाठी, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने दोहराया है की दलित महापुरुषों के सम्मान में बनवाए गए स्मारक पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र होंगे और उससे होने वाली आय से दलित बस्तियों का विकास होगा।

BBC
लेकिन दलित समुदाय के लोग अपने जीवन स्तर में सुधार और सत्ता में भागीदारी दिलाने की दिशा में कदम न उठाए जाने से काफ़ी मायूस हो रहे हैं।

मायावती पिछले दो वर्षों से राजधानी लखनऊ में दलित महापुरुषों, अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम और खुद के नाम पर कई हजार करोड़ रुपयों की लागत से स्मारक, मूर्तियाँ, संग्रहालय और पार्क बनवाकर यह कह रही हैं कि इनसे दलितों का स्वाभिमान बढ़ेगा और लोग प्रेरणा लेंगे।

उनका कहना है स्मारक समाज के 'वैचारिक सशक्तीकरण का एक माध्यम हैं' और उन्होंने जो स्मारक बनवाए हैं, वे प्रकाश स्तंभों के सामान आने वाली शताब्दियों तक समाज को प्रेरणा और दिशा प्रदान करते रहेंगे।

एक अनुमान के अनुसार इन स्मारकों के लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण की लगभग पाँच सौ एकड़ जमीन इस्तेमाल की जा रही है, जिसकी कीमत करीब पाँच हजार करोड़ है।

खर्च : अधिकारियों के अनुसार करीब ढाई हजार करोड़ रुपए पुराने अंबेडकर स्मारक, पुस्तकालय, स्टेडियम और एक पुरानी कालोनी को तोड़ने में लग गए।

फिर नगर विकास, आवास, संस्कृति, सिंचाई, पर्यटन और लोक निर्माण जैसे विभागों से कई हजार करोड़ रुपए नए निर्माण कार्य पर खर्च हुए। पिछले हफ्ते इन स्मारकों का उद्‍घाटन करते हुए मायावती ने कहा था कि स्मारकों का विरोध करने वाले लोग संकीर्ण जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं।

मायावती का तर्क है की इन 'स्मारकों संग्रहालयों, मूर्तियों और पार्कों पर खर्च किया गया धन उससे कहीं कम और नाम मात्र का है, जो देश की राजधानी दिल्ली के राजघाट पर स्थित समाधियों की जमीन की ही अकेले कीमत है।

लेकिन लखनऊ में ही उनके स्वजातीय दलित समुदाय में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि सरकार उनकी मूलभूत जरूरतों की अनदेखी करके पत्थर के स्मारक बनवा रही हैं, जिनका उनके जीवन में कोई उपयोग नहीं है।

नाराजगी : मुख्यमंत्री आवास और अम्बेडकर स्मारक से मात्र दो तीन किलोमीटर की दूरी पर है चमरई गाँव। यहाँ रैदास बिरादरी के लोग रहते हैं। करीब 70 साल के बुजुर्ग रामसेवक एक हाथ में लाठी थामे थे और दूसरे हाथ में प्लास्टिक के एक डब्बे में पानी लिए थे।

रामसेवक ने बताया कि वह शौच के लिए सड़क पर जा रहे हैं क्योंकि उनके घर में शौचालय नही है। गाँव के अंदर जाने पर लोगों ने बताया कि वे सभी लोग बाहर खुले में ही शौच जाते हैं। एक दलित लड़की उर्मिला ने कहा कि इस गाँव में पीने के साफ पानी का भी इंतजाम नहीं है।

गाँव वालों ने मुझे एक पुराना कुआँ दिखाया जिसका पानी वह लोग पीते हैं। साफ पानी के लिए लोगों को दूर जाना पड़ता है। गाँव के लोगों का कहना है कि पास में जो अस्पताल है, वहाँ डाक्टर घूस माँगते हैं।

कुसुमा देवी को शिकायत है कि मुख्यमंत्री मायावती पास के अंबेडकर स्मारक और चौराहों का निरीक्षण करने अक्सर आती हैं, लेकिन कभी उनका हालचाल जानने की कोशिश नहीं की।

सच्चाई : गाँव वाले तो चाहकर भी मायावती से नहीं मिल सकते, चूँकि उनके घर के बाहर की सड़क पर सख्त पहरा है और इस बार वह जनता दर्शन के लिए भी लोगों को अपने बंगले नहीं आने देती। गाँव वालों का कहना है कि मायावती अफसरों को भेजती हैं, लेकिन वे उन्हें सच्चाई नहीं बताते।

पहले ये लोग मानते थे कि मायावती दलितों और ग़रीबों कि हितैषी हैं, लेकिन अब उनकी राय बदल रही है। कुसुमा देवी और उसके पड़ोसियों का कहना है कि मायावती के राज में भी केवल बड़े लोगों की सुनवाई होती है।

इन लोगों को भी शिकायत है कि मायावती अपनी तिजोरी भरने में लगी हैं और उन्हें दलित या ग़रीब लोगों की परवाह नही है। पहले दलित समुदाय के लोग मायावती को देवी की तरह पूजते थे। अब मायावाती ने चौराहों पर अपनी मूर्तियाँ लगवा दी हैं कि लोग उन्हें आदर से पूजें, लेकिन अब लोगों की श्रद्धा ख़त्म होती जा रही है।

तौर-तरीका : गाँव के लोगों का कहना था कि वह बाहर सड़क से ही अंबेडकर पार्क के अंदर लगे हाथी और मूर्तियाँ देख लेते हैं। अंदर जाकर पास से देखने का मन नहीं होता। दो साल के इस कार्यकाल में दलित बुद्धिजीवी और अधिकारी भी मायावती के तौर तरीकों से खुश नहीं हैं।

दलित समुदाय में इस बात को लेकर खासा असंतोष है कि माया सरकार में जिन एक लाख बारह हजार सफाईकर्मियों की भर्तियाँ हुईं, उनमें उनको पर्याप्त हिस्सा नहीं मिला और इसमें सवर्णों का फायदा हुआ और जमकर घूसखोरी हुई।

अब सरकार ने पाँच लाख तक के ठेकों में दलित समुदाय के लिए आरक्षण की घोषणा कि है, लेकिन इसका लाभ उठाने वाले लोग अभी दलित समुदाय में कम हैं।

गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान इलाहाबाद में दलित मामलों के विशेषज्ञ बद्री नारायण का कहना है कि दलितों में अब पहले से अधिक चेतना आ गई है।

चेतना : उन्होंने कहा कि पहले वह इन पार्कों में जाकर खुश हो लेता था। लेकिन दलित समुदाय अब केवल जातीय स्वाभिमान, भावनात्मक और प्रतीकात्मक कार्यों से संतुष्ट नहीं होता। वह अपने जीवन स्तर में सुधार और सता में भागीदारी चाहता है, जबकि मायावती ने इस कार्यकाल में इस ओर कुछ खास काम नहीं किया।

सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के लोग आम तौर पर शिकायत करते मिलते हैं कि सरकार में उनकी सुनवाई नहीं है और अफसरशाही हावी है। एक दलित अधिकारी का कहना है कि अब मायावती अपनी पूँजी यानी दलित वोट बैंक भी गँवा रही हैं। आम आदमी तो क्या कभी उनके खास माने जाने वाले बड़े-बड़े दलित अधिकारी और नेता भी उनसे नहीं मिल सकते।

इन लोगों का कहना है कि हाल के लोकसभा चुनाव में बड़ा झटका खाने के बाद भी मायावती का मूर्ति प्रेम नहीं गया और समाज की बेहतरी के लिए वे कोई ठोस कदम नहीं उठा रही हैं।
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